आनन्द-सृंखला
मृत्यु तुल्य कष्ट,परंतु मृत्यु तो एक उत्सव है कष्ट नही होना चाहिए , समाज के गति के सापेक्ष यदि तुम्हारे मन और आत्मा की गति न हो तो तुम्हे कष्ट नही होना चाहिए, तुलना प्रतिस्पर्धा तुम्हे ज्यादा मानसिक कष्ट देते हैं।हो सकता है तुम्हे ये लगे की मैं ये सब इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि प्रतिस्पर्धा और तुलना कठिन जान पड़ता देख मैं तुम्हे पलायन करने का उपदेश या प्रवचन कर रहा हूं।परंतु शांत ह्रदय से जरा आत्मा को विश्रांति देकर देखो ,विचार श्रृंखला को देखो और महसूस करो की आजतक इतना जीवन जो आपने जिया वो किसलिए जिया। ज्यादा पढ़ लें, खेल लें ,सो लें, सेक्स कर लें, कार में घूम ले, कहीं का बॉस बन लें, किसी के उपर अपनी धाक जमा लें ,या सारा संसार जीत लें और आसमां में ऊँचा उड़ ले,जादूगरों की भांति अपने द्वारा दुनियां को नियंत्रित कर लें आदि आदि................. अच्छा दो क्षण के लिए कल्पना करें, बस कल्पना करें कि जो भी इच्छा मन में जागी उसे पूरा कर लिया.... जैसे मैं एक अच्छा लेखक बनना चाहता हूँ कि पूरी दुनिया के श्रेष्ठतम सम्मान से सराहा जाऊं, मैंने वो मुकाम हासिल कर लिया तो मुझे विश्व की सुन्दरतम जगह पे द...