धारा! The flow!

ज़िन्दगी को ज़िन्दगी पर छोड़िये जनाब,
ज़िन्दगी जीने के लिए है,
गाली सुनने की कला आना चाहिए,
ये सफलता की सीढिया कहाँ तक,
कबतक छिपेंगे जनाब यहाँ,
ढूंढ लेगी वो भी मंज़िल आपको,
जो इसरत मंज़िल कहलाती है,
बस ज़िन्दगी को ज़िन्दगी को पे छोड़ दीजिए जनाब,
ये रस्ते के किनारे कुछ पुष्प लगे हैं,
काटों को चीरकर ये निकले है,
आपके लिये जनाब बस कुछ पल बाद,
ये मिट्टी मे मिलेंगे,
गर नही देखेंगे जनाब तो,
संघर्ष की अवहेलना होगी,
ये रस्ते में पड़ा जो पेड़ है,
कह रहा कुछ अपनी व्यथा,
जड़वत बने रहकर , हरा भरा रहने,
का कुछ सन्देश दे रहा है!
वो गोबर की खेप भी देख लीजिए ज़नाब,
मृत्यु का उत्सव मना रहा है,
उधर देखिये किनारे पे पड़ी टूटी पगडंडियां
अपने को मिटा कर भी कर्म की प्रेरणा दे रही!

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