फकत एक ख़्वाब के सिवा,
ज़िन्दगी और कुछ भी नही,
तुम्हारी ज़िद के बंधे तुम,
ज़िन्दगी कब जियोगे,
क्योंकि ज़िन्दगी एहसास-
ए-दरिया है,इसमें उतरो,
और फिर तुम्हे ज्ञात होगा,
की ज़िंदगी की दरिया भी,
तुम पार तभी कर पाते हो,
जब तुम प्रयास करना छोड़,
अपने भीतर शांत होकर
स्थित हो जाते हो!
"प्रभाकर अहिंष्य द्विवेदी"
ज़िन्दगी और कुछ भी नही,
तुम्हारी ज़िद के बंधे तुम,
ज़िन्दगी कब जियोगे,
क्योंकि ज़िन्दगी एहसास-
ए-दरिया है,इसमें उतरो,
और फिर तुम्हे ज्ञात होगा,
की ज़िंदगी की दरिया भी,
तुम पार तभी कर पाते हो,
जब तुम प्रयास करना छोड़,
अपने भीतर शांत होकर
स्थित हो जाते हो!
"प्रभाकर अहिंष्य द्विवेदी"
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