महामिलन!

ज़रा निकलो अपने पिंजरे से,
है कोई ऐसा जो,
तुम्हे बेशर्त मोहब्बत करेगा!
न टूटने का डर होगा,न
शर्मिंदगी तुम्हे डराएगी,
न खौफ़ होगा,प्रतिपल
किसी के अकस्मात जाने का,

न तुम्हारे ज़िस्म से मतलब होगा,
न तुम्हारे ऐब से,
बस रुख्सत करना धीरे-धीरे,
ख्वाहिशें,जो तुमने सँजोये हुआ है,
फेंकना है धीरे-धीरे; उनको,

फिर ग़ौर से देखना तुम,
ये जमीं,आसमां,समीर,नदियां
....बस समर्पित कर रहें है खुद को,
बिना ख्वाहिश, बेशर्त !
बस दो-चार पल में तुम्हारा
मिलन होगा उस महबूब से,
जिससे मिलने के बाद,
तुम्हे किसी का,
इंतज़ार न होगा,
न पीड़ा होगी,
न ज़लन

बस उत्सव होगा
महामिलन का!

प्रभाकर द्विवेदी "अहिंष्य"

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