जाति संघर्ष!
पंडित बन जाओ,
ठाकुर बन जाओ,
बनिया बन जाओ,
यादव बन जाओ,
चमार बन जाओ,
पासी बन जाओ,
हिन्दू बन जाओ,
मुसलमाँ बन जाओ,
क्यों बनोगे हिंदुस्तानी,
रक्त में है जब मक्कारी,
सारी कचहरी भरी पड़ी है,
भाई भाई के मुकदमों से,
और चले तुम "क्षुद्र"
जाति बढ़ाने महकमों में।
"जब तुम अबतक जान न पाए मानवता ,
क्या जानोगे तुम देश की अखंडता ।"
छोटी छोटी बातों पर तुम बलबलाते हो,
बेटी गर्भ में मार कर बहु घर में जलाते हो,
फिर देवी दूर्गा पूजने मंदिर क्यों जाते हो,
काली को पूजते हो,नंगी औरत घूरते हो।
कब ये बातें टूटेंगी,
मानवता फिर उपजेगी,
भारत माँ की शान हमारे ,
मानस से कब उपजेगी।
प्रभाकर द्विवेदी "अहिंष्य"
ठाकुर बन जाओ,
बनिया बन जाओ,
यादव बन जाओ,
चमार बन जाओ,
पासी बन जाओ,
हिन्दू बन जाओ,
मुसलमाँ बन जाओ,
क्यों बनोगे हिंदुस्तानी,
रक्त में है जब मक्कारी,
सारी कचहरी भरी पड़ी है,
भाई भाई के मुकदमों से,
और चले तुम "क्षुद्र"
जाति बढ़ाने महकमों में।
"जब तुम अबतक जान न पाए मानवता ,
क्या जानोगे तुम देश की अखंडता ।"
छोटी छोटी बातों पर तुम बलबलाते हो,
बेटी गर्भ में मार कर बहु घर में जलाते हो,
फिर देवी दूर्गा पूजने मंदिर क्यों जाते हो,
काली को पूजते हो,नंगी औरत घूरते हो।
कब ये बातें टूटेंगी,
मानवता फिर उपजेगी,
भारत माँ की शान हमारे ,
मानस से कब उपजेगी।
प्रभाकर द्विवेदी "अहिंष्य"
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