धर्मयुद्ध!

कुछ पानी पी पीकर गरियाते है तुमको बुद्ध ,कबीर!
क्यों बनाया नही उनको तुमने युद्ध के लायक,
इन्हें मृत्यु ही सीखना था तुम्हे,
जो बटे हुए है,हज़ारो जातियों और मज़हबों में,
है कोई माई का लाल जो सात अरब को बांधे एक बस
एक मज़हब में!फिर ये आतंक की खेती ही नही हो,
बंदूके तोपे बने ही न!
लेकिन नही है कोई बुद्ध कबीर ,
क्योंकि आज का दौर उन्हें बेमौत मरने को मजबूर कर देता है,
और वो भी क़ुछ सुकून पाते है मौत की गोद मे,
क्योंकि जड़त्व ,जड़त्व से किसी को हटाना एक जागे हुए के
लिए पुनीत हो सकता है,
बाकी सबके लिए ये घोर अतिक्रमण है,
अपराध है,जघन्य अपराध,
इसीलिए तो ईशा,सुकरात, को मृत्यु नसीब हुई मृत्यु!

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