आनन्द-सृंखला

मृत्यु तुल्य कष्ट,परंतु मृत्यु तो एक उत्सव है कष्ट नही होना चाहिए , समाज के गति के सापेक्ष यदि तुम्हारे मन और आत्मा की गति न हो तो तुम्हे कष्ट नही होना चाहिए, तुलना प्रतिस्पर्धा तुम्हे ज्यादा मानसिक कष्ट देते हैं।हो सकता है तुम्हे ये लगे की मैं ये सब इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि प्रतिस्पर्धा और तुलना कठिन जान पड़ता देख मैं तुम्हे पलायन करने का उपदेश या प्रवचन कर रहा हूं।परंतु शांत ह्रदय से जरा आत्मा को विश्रांति देकर देखो ,विचार श्रृंखला को देखो और महसूस करो की आजतक इतना जीवन जो आपने जिया वो किसलिए जिया।
ज्यादा पढ़ लें, खेल लें ,सो लें, सेक्स कर लें, कार में घूम ले, कहीं का बॉस बन लें, किसी के उपर अपनी धाक जमा लें ,या सारा संसार जीत लें और आसमां में ऊँचा उड़ ले,जादूगरों की भांति अपने द्वारा दुनियां को नियंत्रित कर लें आदि आदि.................

अच्छा दो क्षण के लिए कल्पना करें, बस कल्पना करें कि जो भी इच्छा मन में जागी उसे पूरा कर लिया....
जैसे
मैं एक अच्छा लेखक बनना चाहता हूँ कि पूरी दुनिया के श्रेष्ठतम सम्मान से सराहा जाऊं, मैंने वो मुकाम हासिल कर लिया तो मुझे विश्व की सुन्दरतम जगह पे दुनियां के बेहतरीन लोगों के सम्मुख बुलाकर ढेरों प्रशंसा भरे शब्दों से , प्रियतम उच्चतम मनभावन शब्दों , भावों से पूरे विश्व भर में सराहा गया और सराहा जा रहा है,अब मैं ये सब महसूस करके गदगद भर गया भावों से........

मैं उस महफ़िल से निकला मुझे मानव मिलन अपनी मानवी से मिलने की प्यास या आस जागी,मैं नही पाया उन्हें इसलिए क्योंकि सामाजिक अभियांत्रिकी में मैं उनके समक्ष या सापेक्ष फिट नही बैठा था।
इसलिए मुझे उनका साथ मयस्सर नही हुआ था.....
मै तत्क्षण कंगाल हो गया पुनः पृथ्वी के चेतन यात्रा के ज्ञातप्रारंभ को कोसने लगा क्योंकि वो मेरे समक्ष नही थी,वो कहीं और किसी क़े साथ स्वस्थ गृहस्ती से या तो खुस हो रही होती हैं या खुस रहने का अभिनय कर रही होती है,वो मुझसे मिलना तो चाहती हैं इस समय किन्तु साथ ही साथ वो बड़े संतुष्ट ह्रदय से ईश्वर से प्रार्थना भी कर रही होती है कि मेरा और उनका इस जगत में साक्षात्कार न हो वो इसलिए क्योंकि उनकी गृहस्ती नया बसा घर कहीं उजड़ न जाये ,उनके बच्चे उन्हें गलत न समझे ।
उनकी नयी दुनिया के उनके ह्रदय में मैं कभी कभार आता हूं क्योंकि वो अपने कर्म में रत है,यदा कदा उनको मेरा स्मरण हो जाता है जब उनको अपनी दुनिया के अतीत को झांकने को जी करता है या कभी अकस्मात् कोई घटना या दृश्य उनको मेरी याद दिलाता है......

मै उस महफ़िल से अपने घर आता हूं, व्हिस्की में बर्फ के कुछ टुकड़े डालकर विनम्रता से कहता हूँ कोई अच्छी सी चिकन फ्रीईड डिस सामने लाकर रखे और अपने घर भी ले जाकर अपने बच्चों के साथ खुशियां मनाए।
मैं व्हिस्की का स्वाद चिकेन से लेता हूं और टी वी में सिनेमा देखता हूँ क्योंकि खबरें परेशां ही करती हैं और मन को दुखी करती है और दुखी हो भी लेता हूं,आँखों से अकारण आंसू की कुछ बुँदे निकलती हैं और फिर भारी रात सुबह में तब्दील होतो हैं।
विनम्रता सुबह पांच बजे ही घर आकर बिखरे पड़े बोतल और गिलास को समेट कर घर की सफाई करके मुझे एक कप चाय देकर जाती है,सर उठिये ,मैं मेज पे पड़ी गिलास से पानी पी फिर चाय को उठा कर मुह से लगा कर वही दिनचर्या प्रारम्भ करता हूँ।

अब भाई साहब या बहिन जी मैं आपसे कह दूँ जीवन के सांसारिक पक्ष के सुख के लिए आभाव का होना आवश्यक है, अगर खली न हो पेट ,एक ही बार में भर जाए तो क्या आप कल्पना  कर सकते हैं कि इतने सारे व्यंजनों और स्वादयुक्त रेसेपियों का अविष्कार हो पाता । वैसे ही मन की दुनिया अगर अनवरत सानंद रहे तो फिर जीवन की प्राप्ति में विषाद और हताशा का योगदान आप न समझ पाए।अनंत रसों में कुछ रस ही खोजे जा सके,कुछ खोजे जा रहे हैं और कुछ को परिष्कृत किया जा रहा है।
दुनिया का प्रत्येक वर्ग अत्यधिक महत्वपूर्ण है।दुनियां,समाज या ज़िन्दगी परस्परता में ज्यादा जीवित है।निरपेक्षता मे दुनिया की या समाज की कल्पना करना थोड़ा कठिन है हाँ परन्तु असंभव नही हैं।

हाँ निर्लिप्त और निर्पेक्ष लोगों का प्रेम फ़िलहाल मेरे समझ से परे है और आशा है जल्दी समझ आएगा ...आएगा तो अवश्य लिखूंगा।

सादर धन्यवाद
प्रभाकर द्विवेदी "अहिंष्य"

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