स्वीकृति!
मेरी प्रवृत्ति मैं कंटक हूँ
हे पुष्प मगर इतना सुन लो,
अपने वजूद को हर्ष सहित,
स्वीकारा है मैंने,
मेरी प्रवृत्ति मैं कंटक हूँ
अवसर देता सुंदरता की,
तुमको जग में छा जाने की,
नीत नूतन मेरा वज़ूद,
बस देख नही पाते है लोग,
पर नही मुझे कोई शिक़वा,
मैं कंटक हु तो कंटक हूँ,
तुम अहोभाग्य,
मैं दुर्भाग्य सखे!
हे पुष्प मगर इतना सुन लो,
अपने वजूद को हर्ष सहित,
स्वीकारा है मैंने,
मेरी प्रवृत्ति मैं कंटक हूँ
अवसर देता सुंदरता की,
तुमको जग में छा जाने की,
नीत नूतन मेरा वज़ूद,
बस देख नही पाते है लोग,
पर नही मुझे कोई शिक़वा,
मैं कंटक हु तो कंटक हूँ,
तुम अहोभाग्य,
मैं दुर्भाग्य सखे!
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