आधिपत्य!

ये अल्फ़ाज़ और अधमरे एहसास,
कभी-कभी,बहुत अच्छे होते हैं,
प्रेम की घोषणाएं प्रेम को अवरुद्ध ही करती हैं,
अधिकारों का सृजन करती है,
अधिकार सृजित हुआ की प्रेम प्रेम न रहा,
प्रेम व्यवसाय हुआ तत्क्षण,
एक गुलाब का पुष्प महीनों काटों को देखने से ही,
दर्शित होता है,
और ये भी सम्भावना है कि न भी,
दर्शित हो,
परंतु यहाँ माली जैसे धैर्य का आभाव है,
इसलिए शायद सड़े हुए रिश्ते आजकल प्रेम,
समझ लिए जाते है,
प्रेम है,अगर देखना है,प्रेम को तो,
अधिकार,आधिपत्य का खोना जरुरी है,
नही तो प्रेम पर्व नही बस दंगा होगा,
घृणा!

प्रभाकर द्विवेदी "अहिंष्य"

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