सृंखला

कभी -कभी बस कभी-कभी,
ये ऐहसास होगा मुझे,कि मै अकेला ही हूँ,
ज़िन्दगी के तज़ुर्बे हमेशा याद नही रहते,
कुछ कुछ ख्वाब यूँही मज़ारों को रुख हुआ करते है,
कभी-कभी बस यूँही जो लगता है,मुझे,
माना कि भ्रम है, मगर वज़ूद भी तो है,
ज़िन्दगी गुलज़ार भी यूँही है,
बेवजह,जैसे ये तनहाई है बेवजह।

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