मीरा(एक प्रेम कथा)
क्लास में जाते ही ईशिता से मुलाकात हुई,वो मुस्कुरा रही थी,मैंने कारण पूछा,तो बोली कुछ नही बस पूछी तुम तो टूरिस्ट हो न;
मैंने कहा हा हूँ तो?
उसने कहा मुझे घुमाने ले चलोगे?
मैंने कहा,कहाँ?
कहीं भी,जहाँ तुम्हें बहुत अच्छा लगता हो,उसने कहा,
हम्म मुझे तो बहुत सी जगहें बहुत प्यारी लगती हैं,
परर....मैं एकाएक शांत होता हूं
क्या सोच रहे हो?उसने कहा,
सॉरी;मैं तुम्हे नही ले जा सकता;
क्यों?
वैसे ही,
खिलखिलाते हुए हँसी ईशिता,मै शांत चित्त हुए अपने पढाई में लग गया;
पर मैं तो पढता ही नही हूं,
बस नौटंकी कर रहा था;
खैर ये मेरा ढंग है,पढ़ने का ,फूल नौटँकी;
मैं सोचने लगा अचानक ईशिता की बातों को,
और फिर अपने जीवन जीने का फ़लसफा...आनन्द बाटना;और ये एक ऐसी साधारण सी बात....मैं उसे घुमाने क्यों नही ले जा सकता हूँ....
ये सोचते हुए कुछ देर ही बीता था कि दोस्तों की फेहरिस्त आई और मेरे ठहाके से कमरा गूंज उठा;फ़िर पढाई की बातें और थोड़ी हँसी ठिठोली, फिर घर आने का समय....
घर पे माँ को मेरा इन्तज़ार रहता है,बड़ी बेसब्री से,आते ही भेली पानी के लिए दिया जाता है,और उसके बाद मैं अपनी अनर्गल क्रियायों में लग जाता हूँ।
अब मैं बंगाल और उड़ीसा जाने की योजना बनाता हूँ,क्योंकि बंगाल में ही हमारी संस्कृति फूली फली;या हो सकता है ऐसी मेरी निज़ी सोच हो;परन्तु विवेकानंद ,टैगोर को देख के ही ऐसी अवधारणा है मेरे मन में;खैर मैंने तय किया कि अबकी बार बंगाल की तरफ़ उन्मुख होना है।
ये सोचते हुए दो दिन ही बीते थें की फिर कॉलेज के पुस्तकालय में एक परिचित आवाज़ गूंजी जो मेरे ठीक पीछे से आयी.."प्रोफ़ेसर अनुज ज़ी"
मैं चौंका,ये कौन प्रोफ़ेसर कह रहा है मुझे,
पलट के देखा तो,ईशिता थी।
अरे ईशिता तुम,
हाँ मैं, क्यों कोई दिक्कत है आपको,
नही! क्यों शर्मिन्दा कर रही हो..और हाँ प्रोफेसर क्यों कहा तुमने....
क्या करें वैसे तो आप सुनेंगे नही तो सोचा प्रोफ़ेसर ही कहूँ,और हाँ आप किसी प्रोफ़ेसर से कम थोड़े ही है,और नही तो ज़्यादा ही हैं।
मैं देख रहा था उसको अपलक;
या यूँ कहें कि ऐसे ही देखता ही हूँ अक्सर किसी को,
वो भी परिचित थी मेरे इस ढंग से,या ये कहें कि कोई भी जो कुछ समय रह जाता है मेरे साथ, परिचित हो ही जाता है,
"अरे व्वाह!ये बालों का क्या किया है,तुमने" मैंने मुश्कुराते हुए पूछा,
क्यों अच्छा नही लग रहा क्या?ईशिता ने कहा
नही जी, जँच रही हो;बिलकुल परी लग रही हो!
2 pm के बाद पुस्तकालय मे नाम मात्र के विद्यार्थी ही रहते हैं और मैं सबसे पिछे की पंक्तियों में ही बैठता हूँ अक्सर,अतः कोई डिस्टर्ब होने वाला नही था हम दोनों की बातों से...
उसने अपने दोनों हाथों पर अपने गालों को रखते हुए मुझसे बच्चों जैसे, इठलाते हुए पूछा,"आप मुझे क्यों नही ले जा सकतें,अपने साथ घुमाने?"
मैंने कहा,"ले जा सकता हूं, पर तुम अपने पापा से परमिशन ले लो,फ़िर चलो,जहाँ चलना हो.."
"पक्का!"अत्यधिक उत्साहित हुए और चेहरे पे विजय की भावनाओं के लिए हुए उसने कहा...
उसके अगले दिन ईशिता ने कॉलेज से आते समय मुझसे कहा,"अनुज!आज आपको पापा बुलाएं हैं घर,आ सकतें हैं कि नही,प्रोफ़ेसर साहब!" शरारत और मस्ती भरे लहजे में कही गयी उसकी बातों को मैं सुन के अवाक् रह गया;
क्यों? कोई काम है ईशिता
"आप उन्ही से पूछ लीजियेगा"ईशिता ने कहा...
मैंने कहा हा हूँ तो?
उसने कहा मुझे घुमाने ले चलोगे?
मैंने कहा,कहाँ?
कहीं भी,जहाँ तुम्हें बहुत अच्छा लगता हो,उसने कहा,
हम्म मुझे तो बहुत सी जगहें बहुत प्यारी लगती हैं,
परर....मैं एकाएक शांत होता हूं
क्या सोच रहे हो?उसने कहा,
सॉरी;मैं तुम्हे नही ले जा सकता;
क्यों?
वैसे ही,
खिलखिलाते हुए हँसी ईशिता,मै शांत चित्त हुए अपने पढाई में लग गया;
पर मैं तो पढता ही नही हूं,
बस नौटंकी कर रहा था;
खैर ये मेरा ढंग है,पढ़ने का ,फूल नौटँकी;
मैं सोचने लगा अचानक ईशिता की बातों को,
और फिर अपने जीवन जीने का फ़लसफा...आनन्द बाटना;और ये एक ऐसी साधारण सी बात....मैं उसे घुमाने क्यों नही ले जा सकता हूँ....
ये सोचते हुए कुछ देर ही बीता था कि दोस्तों की फेहरिस्त आई और मेरे ठहाके से कमरा गूंज उठा;फ़िर पढाई की बातें और थोड़ी हँसी ठिठोली, फिर घर आने का समय....
घर पे माँ को मेरा इन्तज़ार रहता है,बड़ी बेसब्री से,आते ही भेली पानी के लिए दिया जाता है,और उसके बाद मैं अपनी अनर्गल क्रियायों में लग जाता हूँ।
अब मैं बंगाल और उड़ीसा जाने की योजना बनाता हूँ,क्योंकि बंगाल में ही हमारी संस्कृति फूली फली;या हो सकता है ऐसी मेरी निज़ी सोच हो;परन्तु विवेकानंद ,टैगोर को देख के ही ऐसी अवधारणा है मेरे मन में;खैर मैंने तय किया कि अबकी बार बंगाल की तरफ़ उन्मुख होना है।
ये सोचते हुए दो दिन ही बीते थें की फिर कॉलेज के पुस्तकालय में एक परिचित आवाज़ गूंजी जो मेरे ठीक पीछे से आयी.."प्रोफ़ेसर अनुज ज़ी"
मैं चौंका,ये कौन प्रोफ़ेसर कह रहा है मुझे,
पलट के देखा तो,ईशिता थी।
अरे ईशिता तुम,
हाँ मैं, क्यों कोई दिक्कत है आपको,
नही! क्यों शर्मिन्दा कर रही हो..और हाँ प्रोफेसर क्यों कहा तुमने....
क्या करें वैसे तो आप सुनेंगे नही तो सोचा प्रोफ़ेसर ही कहूँ,और हाँ आप किसी प्रोफ़ेसर से कम थोड़े ही है,और नही तो ज़्यादा ही हैं।
मैं देख रहा था उसको अपलक;
या यूँ कहें कि ऐसे ही देखता ही हूँ अक्सर किसी को,
वो भी परिचित थी मेरे इस ढंग से,या ये कहें कि कोई भी जो कुछ समय रह जाता है मेरे साथ, परिचित हो ही जाता है,
"अरे व्वाह!ये बालों का क्या किया है,तुमने" मैंने मुश्कुराते हुए पूछा,
क्यों अच्छा नही लग रहा क्या?ईशिता ने कहा
नही जी, जँच रही हो;बिलकुल परी लग रही हो!
2 pm के बाद पुस्तकालय मे नाम मात्र के विद्यार्थी ही रहते हैं और मैं सबसे पिछे की पंक्तियों में ही बैठता हूँ अक्सर,अतः कोई डिस्टर्ब होने वाला नही था हम दोनों की बातों से...
उसने अपने दोनों हाथों पर अपने गालों को रखते हुए मुझसे बच्चों जैसे, इठलाते हुए पूछा,"आप मुझे क्यों नही ले जा सकतें,अपने साथ घुमाने?"
मैंने कहा,"ले जा सकता हूं, पर तुम अपने पापा से परमिशन ले लो,फ़िर चलो,जहाँ चलना हो.."
"पक्का!"अत्यधिक उत्साहित हुए और चेहरे पे विजय की भावनाओं के लिए हुए उसने कहा...
उसके अगले दिन ईशिता ने कॉलेज से आते समय मुझसे कहा,"अनुज!आज आपको पापा बुलाएं हैं घर,आ सकतें हैं कि नही,प्रोफ़ेसर साहब!" शरारत और मस्ती भरे लहजे में कही गयी उसकी बातों को मैं सुन के अवाक् रह गया;
क्यों? कोई काम है ईशिता
"आप उन्ही से पूछ लीजियेगा"ईशिता ने कहा...
मैं कॉलेज से आते वक्त ईशिता के घर गया,ईशिता के पिता हरिप्रसाद जी से मेरी मुलाकात हुई उन्होंने मुझसे मेरी पढ़ाई और घुमाई दोनो के बारे में पूछा,मैंने यथावत उनको जवाब दिया!
उसके बाद उन्होंने रामू से कहा कि वो ईशिता को सूचित करें कि अनुज आये है,रामू चाय की ट्रे ले जाते वक्त ईशिता को बुलाया,"बेबी जी मि.जेंटलमैन बाबू आये है,पिता जी के पास बैठे है पिता जी आपको बुला रहे हैं।"
ईशिता के पिता मुझे अत्यधिक स्नेह करते थे न जाने क्यों इस तथ्य से मैं अनजान था और निःसंदेह वो बहुत ही नेक हृदय के व्यक्ति थे वो स्वयं एक कॉलेज में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर थे इसलिए मेरी उनसे खूब बनती थी,ईशिता मेरी ही हमउम्र थी या मुझसे थोड़ी सी छोटी,ईशिता को वो अत्यधिक स्नेह करते थे।
ईशिता आयी तो पिता जी के पास इठलाते हुए बैठी और पिता जी से नटखट स्वर में कही,"पापा ये(मेरी तरफ इशारा करते हुए) मुझसे बिल्कुल भी बात नही करते,जब भी इनसे कुछ बात करना चाहती ये अपने पढ़ाई के हवाला दे कर चुप करा देते हैं।"
हरिप्रसाद जी मुझे बोले,"क्यों भाई अनुज क्यों परेशान करते हैं आप मेरी प्यारी ईशु को थोड़ा इसका भी ध्यान रखा करिये.."
"मेली प्यारी बच्ची ईशु.."उन्होंने ईशु का कान खीँच कर ईशु से कहा,"जाओ अब अपने प्रोफेसर के लिये कुछ खाने को लाओ भूखे होंगे जनाब!"
ईशिता चली गयी मेरे लिये कुछ खाने को लाने।
ईशिता के माँ का देहांत होने के बाद ईशिता के साथ वो इसी तरह स्नेहपूर्वक रहते थे जिससे ईशिता को माँ के न होने का दुख न हो।
हरिप्रसाद जी से मेरी बहुत बनती थी मैं अक्सर उनके साथ शाम को सुदूर इलाको में टहलने जाया करता था।
उस दिन उन्होंने मुझे अगले टूर पे ईशु को भी ले जाने का आग्रह किया और मैंने हामी भर दी।
उनके यहाँ से आते-आते शाम के 5:30 हो गए ।मैं घर आकर जल्दी से मुँह-हाथ धोकर अपने अध्ययन कक्ष में गया और सारे बिखरे हर सामानों को सही से रखकर अपने स्टडी टेबल पे बैठ गया।
पेट मे तो जगह बची नही थी अतः माँ से केवल चाय बनाने को ही कहा, माँ चाय ले आयी और मैं अपने अध्ययन में लग गया। कब 2 घण्टे बीत गए ज्ञात नही हुआ।
फिर हमारे दिव्य भारत संगठन के सारे मित्र आ गए औऱ हम लोग आपस मे हंसी ठिठोली करने लगे।
दरसअल दिव्य भारत संगठन मेरे द्वारा ही प्रारंभ किया गया था,जिसका एक मात्र उद्देश्य था गन्दे स्थानों की स्वच्छता।
और इस संगठन में अबतक 25 स्वयंसेवक जुड़ चुके थे।
इस संगठन में ज्यादा नियम कायदे न होकर मात्र एक नियम था कि हम शिकायत रहित रहेंगे।
अर्थात हम किस भी जन प्रतिनिधि, अधिकारी, या नागरिक से हमेशा मुस्कुराते हुए ससम्मान मिलेंगे और कही भी किसी प्रकार की गंदगी को मुस्कुराते हए स्वच्छ करेंगे।
इस कार्य मे लगे हम 25 व्यक्ति शाम को 9 से 11 तक शहरों की स्वच्छता में लग जाते और धीरे-धीरे मजाक मजाक में हम
ज्यादातर स्थानों को स्वच्छ कर चुके थे।
स्थानीय लोग भी हम लोगों की सहायता करते और हमारा मनोरंजन भी हो जाता था।
और सुबह पुनः बंधी-बंधाई दिनचर्या में हम लोग लग जाते थे।
अब तय हो गया था हमारा ईशु के साथ जाना,अब मैं गौर कर रहा था ईशु के चेहरे की कांति कुछ ज्यादा बढ़ गयी थी,आजकल वो अकेले ही कुछ गीत गुनगुनाने में व्यस्त थी,हां एक बात है कि ईशु बहुत ही स्निग्ध एवं कोमल व्यक्तित्व की स्वामिनी थी,उसकी सारी सहेलियां उसे बहुत स्नेह करती थी,आजकल सब उसके प्रसन्नता का राज जानना चाहती किन्तु वो सरप्राइज है ऐसा कह कर टाल देती।
हमे अगले सप्ताह शुक्रवार को कोलकाता जाना था,हरिप्रसाद जी ने जाने और आने की समस्त व्यवस्था कर दीया था,
मेरी माँ भी ईशु को अत्यधिक स्नेह करती थी,अबकी मेरी माँ भी प्रसन्न थी कि मेरे साथ ईशु भी कोलकाता जा रही है,यूँ तो मैं रेल से ही यात्राएं करता था किंतु इस बार हरिप्रसाद जी ने हवाईजहाज से टिकट करवा लिए थे,और शुक्रवार का दिन आ गया हरिप्रसाद जी ईशु को अपनी कार से मेरे घर लाये और पिता जी एवं माता जी से भेंट के बाद वो हमको लेकर एयरपोर्ट कि तरफ रवाना होने को हुए,कि मैं पिता जी के चरण स्पर्श के उपरांत माँ के चरण को स्पर्श किया माँ हमेशा की तरह मेरे माथे पे तिलक लगाई मैं माँ के माथों को चूम कर शीघ्र ही आने को कह कर कर में ईशिता के साथ एयरपोर्ट आया वहाँ हरिप्रसाद जी ने ईशु को हिदायत दी कि बेटा अनुज को ज्यादा तंग मत करना,और फिर उन्होंने हमे यात्रा मंगलमय होने का आशीष देकर विदा किया।
दो घण्टे की उड़ान के बाद हम कोलकाता पहुंचने वाले थे रास्ते मे ईशु मुझसे वहाँ क्या-क्या देखना है,खाना है इत्यादि की बाते सुनाती रही मैं शांत होकर उसकी बाते सुन रहा था और हामी भर दिया करता था।
ईशु हल्के पीले रंग का सूट एवं हरे रंग का सलवार पहने हुई थी,और लाल रंग के दुपट्टे को गले मे गोल घुमाकर डाली थी,मैं बात करते समय गौर कर रहा था कि ईशु काजल भी लगाई हुई है किंतु बहुत ध्यान से देखने पर स्प्ष्ट हो रहा था,ईशु बहुत सुंदर लग रही थी और उसका बच्चो वाला स्वभाव बहुत ही मनमोहक लग रहा था।
मैंने इतना गौर से उसको कभी नही देखा था,वो वाकई बहुत सुंदर थी।
खैर हम लोग कोलकाता एयरपोर्ट से शाम को 5 बजे के करीब हम अपने निवास स्थान(मेरे मित्र नरेंद्र के घर) पहुंचे।जहाँ से हमे 7 दिन की समस्त यात्राएं करनी थी।नरेंद ने हमारे रहने की व्यवस्था अपने हालनुमा कमरे में की थी।हाल के सामने एक बालकनी थी जिसमे विभिन्न पुष्प करीने से लगाये गए थे,वहाँ से बाहर का नजारा बहुत अद्भुत लग रहा था।
नरेन्द्र को परिचय की आवश्यकता नही थी उसे फ़ोन पर मैंने ईशिता के बारे में बता दिया था।नरेंद्र बहुत ही बहादुर व्यक्ति था।
मुझे शाम को एक प्रोफेसर से मिलने जाना था,प्रोफेसर चटर्जी जो मुझे स्नातक में पढ़ाये थे,मैंने नरेंद्र एवं ईशु को बताया की मैं रात्रि में 8 तक लौटूंगा सब्जी और दूध भी लेते आऊंगा तब तक तुमलोग बाटे करो।
मेरे जाने के बाद नरेंद्र ने चाय बनायी और कहा ईशु जी बालकनी में बैठकर चाय पीते है,ईशिता बैठ गयी दोनों में सामान्य बातचीत होने लगी।ईशिता चाय के चुस्कियों के साथ बाहर भी देख लिया करती,उसके चेहरे पे स्निग्ध मुस्कान थी,
नरेंद्र भी उसे देख कर बाते कर रहा था।
फिर ईशिता ने नरेंद्र की ओर गम्भीर दृष्टि डालकर कहा,"नरेंद्र जी आप बुरा नही न मानेंगे यदि मैं आपसे पुछु कि आप अनुज जी से कैसे मिले?माफ करिये यदि आप को बुरा लगा हो!"
नरेंद्र ईशिता को सहज करते हुए कहा,"इसमे बुरा मानने जैसी कोई बात नहीं, दरसल मैं एक पेशेवर अपराधी गिरोह में था,और एक बार मैंने अनुज जी के एक मित्र का हाथ-पांव तोड़ने की सुपारी ली थी,उस वक्त मैं 11 वी में अध्ययनरत था,
मैंने एक चौराहे पर शिवम(अनुज के मित्र) को घेर लिया,मैंने ज्यो ही उसे मारना चाहा बीच मे अनुज आ गए,औऱ फिर अनुज से मेरी बहस होने लगी,हम लोगों की बहस देख दो चार लोग और एकत्रित हो गए,किन्तु अनुज ने उन लोगो को वहाँ से हटाया ये कहकर की हमसब मित्र है एवं यूँही किसी बात पर बहस हो रही है..इस दौरान मैंने अनुज के चेहरे पर एक दिव्य कांति देख ली थी,फिर भी ढिठाई क्या न करा दे, मैंने अनुज की आंखों में गुरेरते हए कहा कि मेरे पास पिस्टल है मैं मार दूंगा!"
ईशिता बड़े कौतूहल से इन बातो को सुन रही थी,ईशिता ने कहा फिर
नरेंद्र, "उसके बाद अनुज ने मुझसे कहा,"मार दो फिर;तुमको,मैं विश्वास दिलाता हूं तुमको कि तुम्हे कोई नही परेशान करेगा मेरी मृत्य के पश्चात,किन्तु एक शर्त है कि यदि तुम मुझे नही मार पाये तो तुम्हे आज ही,अब से ही ये सारे कुकर्म त्यागने होंगे।
बोलो! राजी हो..हो कि नही।" मैं बिल्कुल अवाक था शायद पहली दफा मेरा सामना किसी शानदार व्यक्ति से हुआ था,मैं तत्क्षण अपने बुरे कर्मो को त्याग कर नई जिंदगी प्रारम्भ करने का शपथ लिया,और आज मैं एक कंपनी में बतौर मैनेजिंग डायरेक्टर के रूप में कार्यरत हूँ, सच मे इस इंसान ने मेरा जीवन परिवर्तित कर दिया।"
ईशिता और नरेन्द्र ऐसे ही श्रृंखला बद्ध ढंग से बाटे करते रहे और इन समस्त बातो का केंद्र अनुज ही था।
रात को 8 बजे अनुज ने दरवाजे पर दस्तक दी और ईशू से पूछा तुम बोर तो नही हुई? ना! ईशू ने गम्भीर चिंतन की मुद्रा में सर हिलाया,ईशू इस बार और करीब से देखना चाहती थी अनुज को,ईशू के मन मे उत्कंठाओं का सैलाब उमड़ रहा था इस अल्हड़ अनुज के प्रति,ईशू खुद भी नही समझ पा रही कि क्यों,आखिर क्यों इस अनुज में इतनी रुचि ले रही है।
इन समस्त विचारो में खोया हुआ देखकर अनुज ने ईशा को कहा,"ईशू! कहाँ खोयी हो?" "कही नही,खाने मे क्या बनेगा"
ईशू ने मन्द स्वर में पूछा।
"पंचमेल खिचड़ी" ईशिता ने कहा,"अच्छा फिर कैसे-कैसे क्या- क्या होगा?"
अनुज ने कहा कि वो बनाएगा, ईशिता रॉ मटेरियल तैयार करेगी और और नरेंद्र गीत सुनाएंगे।
ईशिता ने उछलकर कहा तब तो बहुत आनन्द आने वाला है।
ईशिता रॉ मटेरियल तैय्यार करने लगी और नरेंद्रन उसमे उसकी मदद..और तबतक अनुज अपनी धोती और पैकेट वाली बनियान पहन कर आ गया,ईशिता ध्यान से देख रही थी अनुज को,अनुज ने अपने पॉकेट से पान निकाला और मुह में डाल लिया, ईशिता ने जानना चाहा कि पान क्यों खा रहे है,तो अनुज ने मजाकिया लहजे में बोला कि इससे खाना मन से बनेगा,फिर ईशू भी जिद की तब तो मुझे भी खाना है पान मेरा रा मटेरियल अच्छा होगा,अनुज ने मना किया लेकिन ईशू के जिद के आगे वो झुक गया और अपनी पॉकेट से एक पान निकाल कर ईशू को दिया कमरे में मद्धम रोशनी जल रही थी,और बाहर से आ रही स्ट्रीट लाइट के प्रकाश की कुछ किरणों से कमरे का माहौल बहुत सुंदर लग रहा था।
ईशिता ने टेबल के उस तरफ बैठे नरेंद्र से कहा आप अपनी गीत संगीत प्रारंभ करिये!
नरेंद्र ने उत्सुकता बस कहा कि जो आज्ञा हुजूर और मैं अपने गीत का प्रारंभ अपने गुरु जी के फरमाइस से करूँगा!
अनुज ने कहा वही जो मैं हमेशा से सुनता आ रहा हूँ..
कमरे में बिल्कुल शांति,नरेन्द्र अनूप जलोटा का भजन..
ऐसी लगी लगन, मीरा हो गयी मगन,गुंगनाने लगा,
ईशिता बिल्कुल शांत होकर अपने काम को करते हुए गीत सुन रही थी मानो डूब गयी हो सागर में और अनुज तो बिल्कुल मन्त्रमुग्ध होखत भजन सुने जा रहा था...
इसी तरह दो चार और गीतों के बाद भोजन बन गया और भोजन बालकनी में ही चन्द्रमा एवं स्ट्रीट लाइट के मिलेजुले प्रकाश में किया गया,इस दौरान ईशिता मन ही मन मीरा के भजन को गुनगुना रही थू,हल्की हल्की हवाएं चल रही थी जो हृदय को स्पर्श भी कर रही थी।
ईशू और नरेंद्र ने भोजन की तारिफ की और अनुज को धन्यवाद दिया!
भोजन के बाद नरेंद्र अपने कमरे में चला गया जहां उसे कुछ आवश्यक कार्य निपटाने थे,और अनुज एवं ईशू उसी टैरेस में बैठे हुए बाहर की तरफ देख रहे थे!
ईशू प्रसन्न तो थी किन्तु एक विशिष्ट गाम्भीर्य के साथ कभी कभार अनुज की तरफ देख भी ले रही थी, इन सब बातों के इतर जो एक महत्वपूर्ण घटना घटित हो रही थी इशिता के ह्रदय में वो ये कि वो मीरा के बारे में बार बार विचार कर रही थी और मीरा का अनुज से क्या सम्बन्ध है इस बारे में भी जानना चाहती थी,क्योंकि अक्सर पूर्व में भी उसने अनुज के घर मे एवं स्टडी रूम में भी मीरा के दो चार तस्वीरों को देखी थी।
उसके मन मे आया कि वो पूछे तुरंत, और ऐसा भी नही है कि अनुज उसके प्रश्न का जवाब नही देगा किन्तु ये क्या आज ईशू को अनुज से लज्जा आ रही थी,वो नही पूछ पा रही थी मीरा के बारे में,जबकि उसके मन मे इस समय केवल अनुज और मीरा के अतिरिक्त और कोई भी नही है।
ईशिता के हृदय में ऐसी मीठी उलझन कभी न आयी थी,और वो देख कर इतनी अवाक थी कि वो अनुज के बिलकुल निकट बैठ कर भी बहुत दूर महसूस कर रही थी।
किन्तु स्त्री का हृदय अत्यधिक धैर्य से भरा होता है,उसे विचलित करना नामुमकिन है,आज उसने ठान लिया कि वो अनुज के बारे में जान कर ही रहेगी,और अनुज का मीरा से सम्बद्ध कैसे जुड़ा इस तथ्य का पता लेकर ही दम लेगी।
अनुज कहता है कि ईशू सो जाओ सुबह से हमे विभिन्न स्थानों पर जाना है,और तबतक हरिप्रसाद जी का फोन आता है,कुशल-क्षेम जानने के बाद वो फ़ोन रख देते है,और ईशिता अपने बिस्तर पर चली जाती है।अनुज भी अपने बिस्तर पर सोने चला जाता है किन्तु अनुज रात का उल्लु है उसे इतनी जल्दी निद्रा नही आने वाली अतः वो कामायनी पढ़ने लगता है,अपना टेबल लैंप जल कर और ईशिता अपने मन के विभिन्न सवालों में उलझी हुई चोरी-चोरी अपने चादर से अनुज को देखती ही रहती है।अनुज के चेहरे पे पड़ रहा प्रकाश ईशिता की नजरें स्वतः ही खींच लेती है..इसी उहापोह में ईशिता सो जाती है!और अनुज पढ़ता रहता है,थोड़ी देर बाद वो भी टेबललैम्प बुझा के सो जाता है।
सुबह उठकर दैनिक कर्मो से मुक्त होकर सब चाय पर एक साथ बैठते है नरेंद्र को ऑफिस जाना जरूरी है,इसलिए वो ऑटो से ऑफिस चला जायेगा,और कार छोड़ जाता है,जिससे अनुज और ईशु को कोई कठिनाई न हो।अनुज और ईशू भी कार से कोलकाता भृमण को निकलते है,रास्ते मे उन्होंने नाश्ता इत्यादि कर लिया,उसके बाद वो दक्षिणेश्वर जाने के लिए निकले, अनुज स्वयं कर चला रहा था, ईशिता खिड़की से शहर को देखे जा रही थी,अनुज ने कर में कृष्ण भजन धीमे स्वर में लगा दिया जिससे ईशिता का ध्यान पुनः मीरा की ओर गया और इस बार उसने मीरा के बारे में अनुज से पूछ ही लिया,"अनुज तुम्हे मीरा में सबसे ज्यादा अच्छा क्या लगता है?"
"उनका निःस्वार्थ और पूर्ण समर्पित प्रेम,जो मुझे अत्यधिक दिव्य लगता है! मीरा का प्रेम शर्तों से परे है,एवं मीरा में अपने प्रेम को निभाने का अदम्य साहस है"
"उनके नाम से ही मेरे रोम-रोम हर्षित हो जाते है,इसलिए मैं मीरा के भजन,मीरा के पद को बड़े रुचिपूर्वक सुनता हूँ एवं गुनता हूँ"
ईशिता शांत भाव से अनुज के इस कन्फेशन को सुन रही थी
और वो अनुज के बिल्कुल भोलेपन से युक्त बातों से मुग्ध हल रही थी।
दक्षिणेश्वर दर्शन के बाद,नाव से हुगली नदी के उस पार बेलूरमठ के दर्शन के लिए दोनों जा रहे थे,और गंगा के अद्भुत प्रवाह को देख कर ईशू बड़ी प्रसन्न होए जा रही थी।
इस तरह सात दिन विभिन्न दर्शनीय स्थलों के भृमण के बाद उनके आने का वक़्त हो गया, ईशू सामान रखते हुए अनुज से बोली,"कितना जल्दी वक़्त बीत गया पता ही नही चला!'
अनुज और ईशू को लेकर नरेंद्र एयरपोर्ट ले आया और विदाई के बाद वो अपने ऑफिस चला गया।
फ्लाइट 1 बजे गोरखपुर लैंड करती,दो घण्टे के सफर में ईशू ने अनुज को ढेर-सारा धन्यवाद दिया और विभिन्न बातें भी की,किन्तु मीरा बार-बार उसके मन मे आती रही,उसने इन सात दिनो में मीरा के बारे में खूब पढ़ा और जाना था,उसके मन मे एक तीस भी उभरती की काश! वो मीरा जैसी होती तो इस बुद्धू अकड़ू अनुज को खूब-प्रेम दे सकती,इन सात दिनों में ईशू अनुज के अतिनिकट आ चुकी थी, हांलाकि अनुज इन सब बातों से अनजान उसे एक बच्ची के अतिरिक्त और कुछ न समझता था।
खैर वो दोनों गोरखपुर 1 बजे आ गए एयरपोर्ट पर हरिप्रसाद जी अनुज के माँ-पिता के साथ इंतज़ार कर रहे थेउन्होंने अनुज को उसके घर छोड़ा एवं अपनी प्यारी बेटी ईशू के साथ अपने घर के आ गए!
ईशू को देखकर उन्हें बहुत प्रसन्नता हुई किन्तु उन्होंने देखा कि कोलकाता से आने के बाद से ईशू की चंचलता एक गहन गाम्भीर्य में परिवर्तित हो गयी थी।
ईशू अब रोज मीरा से सम्बंधित पुस्तकों के अध्ययन में लग गयी,जैसे ही उसको वक़्त मिलता वो मीरा को पीना प्रारम्भ कर देती, उसने मन ही मन तय कर लिया था कि वो मीरा-सा
प्रेम अनुज को समर्पित कर के ही रहेगी,अनुज निःसंदेह उसके हृदय में बैठ गया था,,अतः प्रेम के पुष्प पल्लवित होने प्रारम्भ हो चुके थे, अब जब भी वो अनुज से मिलती उसका बहुत खयाल रखती,अनुज भी इस तरह के बदलाव से वाकिफ था,उसे भी हृदय ही हृदय में ईशिता के मन के भाव ज्ञात होते थे,,अनुज निश्चित रूप से ईशिता को अत्यधिक स्नेहन के साथ दुलार भी करता था,और अब तो अनुज को भान हो गया था कि मीरा का प्रभाव ईशू पर खूब गहराई से पड़ा है..इसको लेकर कभी कभी एक संसय भी मन मे उमड़ता था किंतु फिर भी वो ईशिता को स्नेह तो करता ही था।
हरिप्रसाद जी भी इन सब बातों को जान रहे थे, हरिप्रसाद जी एक दिन अनुज के पिता एवं माता जी से ईशिता के विवाह का प्रस्ताव रखते है,प्रस्ताव स्वीकृत होता है।
अनुज और ईशू परिणय-सूत्र में बढ़ते है,
सुहाग रात के वक़्त अनुज ईशिता से कहता है कि मैं तुम्हे उपहार देना चाहता हूं, ईशू ने कहा दीजिये,
अनुज ने दोनों हाथों ईशिता के कंधों को आहिस्ता-आहिस्ता अपनी तरफ खींच कर उसके माथे पर एक भावयुक्त चुम्बन दे कर कहता है कि आज से तुम्हारा नाम मीरा होगा!
ईशिता के आंखों में प्रेमाश्रु आ जाते है,और मुस्कुराते हुए दोनों एक दूसरे को आलिंगन बद्ध कर लेते हैं।
इति..
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