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प्रयत्न

प्रयत्नों का मनोवैज्ञानिक आधार है,प्रयत्न आसक्ति से नही करना,और ये कितना विरोधाभासी प्रयत्न है तुम्हे समझाने का ,खुदी को भूलना नही,सम्यक स्मृति कठिन है,लगेगा सरल किन्तु कठिन, जागना प्रत्येक पल कितना दूभर है,फिर कुछ भी अकस्मात नही होगा,बिल्कुल तुम्हे ज्ञात होगा,श्रोत से जुड़ गए तुम,तब प्रयत्न कर सकते हो,क्योंकि मुक्त हो गए,तुम्हारे अंदर मुक्तिबोध का जागरण हो गया,प्रस्फुटन हो गया अब रुकने से भी नही रुकेगा,और एक मज़े की बात की तुम अब रोकोगे भी नही,बहोगें तुम जागृत अवस्था मे,योग में अधिस्थित हो गए तुम अब तुम्हे विश्लेषण की आवश्यकता नही,अब तुम आदि से जुड़ गये, कोई आवश्यकता नही तुम्हे, इसलिए प्रयत्न समझ के करना क्योंकि तुम्हारा प्रत्येक प्रयत्न पेंडुलम हो जाएगा,फिर तुम्हे मध्य की आवश्यकता का भास होगा! फिर तुम मध्यम मार्गी हो गए, किन्तु ये तुम्हारे तय सीमा से परे होगा, कब होगा,समय पर होगा, किन्तु होगा अवश्य, परिपक्वता आने पर होगा।

The happiness.

Something something is being on. We are viewer,we should not disturb, And also we should not cling with any happening, otherwise we will suffer, The basic philosophy of being happy is to let go all the thing and be patiencefull ...

दोषारोपण

इस समय या प्रत्येक समय ये एक तरह की प्रवृत्ति रही है कि दोषारोपण किया जाए। दोषारोपण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमे वह व्यक्ति जो दोषारोपण करता है उसके क्षति की ज्यादा सम्भावनाये है,क्योंकि वो आत्मनिरीक्षण की प्रक्रिया से तत्क्षण पलायित हो जाता है। दोषारोपण कभी कभी आवश्यक है,और जो नित्य आवश्यक है वो है आत्मविश्लेषण ,क्योंकि आत्मविश्लेषण से तत्क्षण निर्णय को टाला जा सकता है। आप का दोष दिखाता समाज आपको सुअवसर देता है कि आप स्वयं को परिमार्जित करें। उत्तम रूप में खुद को प्रकट करने में सक्षम हो,तत्क्षण निर्णय कभी आपके लिये शुभ चेतन का कार्य नही करता बल्कि आपजो जिम्मेदारियों से भाग जाने को निर्देशित करता है,जिससे आप दीर्घसूत्री हो जाते है। दीर्घसूत्री होना एक प्रकार की व्यक्तिगत व्यक्तित्व विषयक कमी है जो आपको आनन्द के सर्वोत्तम रूप को प्राप्त करने में बाधक होता है। राजनीतिक व्यक्ति यदि अपने लिये कुछ विशेष कर सकता है तो उसको दोषारोपण नही करना चाहिये एवं खुद का निरीक्षण करना चाहिये। जिससे समाज विकास के सकारात्मक दिशा को प्राप्त होता है।

भोर!

भोर का मोर विस्मृत हो गया, नूतन दिनचर्या में, दांतुन अब जमाने का विषय है, क्या खोया क्या पाया, अब भोर के लोग, पलायन कर रहे हैं, किसी अन्य दुनिया की ओर, उर्जाविहीन हो जाएंगे, वो लोग भोर का सामना कर कर के, क्योंकि अब बहिर्मुख यात्रा, कर रहे है, फिर भोर के मायने बदल गए!

Maaa

You don't complain for , The sin,you are full of, Love and affection...I feel Low in your absence, You provide each and every thing I didn't care about you, Even I ignored you in my Bad mood. Thy presence is a source of Eternal love.... People says you are illiterate But I see you excellent in all My caring,you teach me to give, Not to take. You teach me the lesson I don't find In any books, You are "Maa" Always giving I think how I can be so lazy and A burden to the earth ..... When I lived in a beautiful woumb, You are eternal,you are divine.. I am doing only bullsit all the Time you are in my thinking, Even I only write you in my Each lines... Even you are illiterate....But there should Be a deep knowledge of words and grammar To express you within me..... One day I will be known As an eminent scholar..... But you would always be my Inspiration......

Manner!

See how the manners , Imposed upon us, Is despoiling our lives, Let us be free, friends Sometimes be mannerless, Necessarily will make you free, Mannerless ness is actually a art. It comes u out from the bondages, You have been engaged in being manner full, That is why you are going in deeper bondages. . Let us be free and follow the consciousness... And enjoy the hollyness of your soul.. Be free be free from all the rituals Let the Masters be the master of yourself...

प्रेयसी

शून्य देखा तुम्हे,सबसे पहले, फिर थोड़ा तो आकर्षक व्यक्तित्व तुम्हारा, लेकिन ये कुछ मायने नही रखता, फिर अकस्मात, ये अकस्मात तो कह दिया, लेकिन प्रक्रिया लंबी है, भाव बनने प्रारम्भ हुए, दो तरह है,प्रदर्शन का,एक तुम्हारे, पिता की तरह एक तुम्हारे पुत्र की तरह, दोनों साँचो में तुम ढलती हो, अज़ीब है लेकिन सच है, भाव पुनः प्रारंभ अब थोड़ा परिवर्द्धन, अब निर्भीकता को अग्रसर मैं भी, तुम भी तब तो योग संयोग हो गए, पुनः भाव और कल्पना, कल्पना की गहनता गहराती है, फिर तुम समक्ष हो,तुम्हारा चाहना यहाँ कोई मायने नही रखता, अब मैंने सम्वाद प्रारम्भ किया, तुम से भाव फिर गहन हुए, तुमको भी शायद बेशब्री रहती अब, अब ख़्वाब तुम्हारे औऱ हमारे, दो केंद्रों से हो कर एक केंद्र की, तरफ यात्रा करते है, तुम्हे प्रस्तावित करने की आवश्यकता नही, की तुम प्रेयसी हो , प्रेयसी!

ठिठोली

याद है सखी तुम्हे एक बार गलती से मुर्दाबाद कह दिया था, नादान था मुझे मालूम भी नही थे, शब्द के मायने, बस ठिठोली थी बचपन की वो, फिर तुम्हारा रूठ कर, हा, रुठ कर ही नही, बल्कि पूरे जोर से रोना जैसे, सचमुच तुम मुर्दा हो गयी थी, हम्म हम्म" मम्मी से कहब अब" बहुत मासूम सा था स्मित तुम्हारा, मैं भी बिल्कुल डर गया था, स्मरण है मुझे वो दिन, अमरूद का पेड़, कर 'कित्त कित्त" का खेल ,अब उतनी मासूम नही तुम ,पर तुम्हारे यादों के ज़िल्द का वो बहुत सुनहरा पन्ना है अब सखी तुम हमेशा खुश रहो, उस वक़्त के खुशी के लिये यही तो मांगना था मेरा!

गति

हा मालूम है मुझे ,तुम्हे, निशानी चाहिये,सब्र करो, भरूँगा तुम्हे पहले भावों से, फिर सुलझाऊंगा तुम्हारी जुल्फों के साथ तुम्हारे मन को,उर को, फिर उतरूंगा धीरे धीरे, प्रेम सरोवर में,तुम्हे लम्हा लम्हा, निर्भय और अभय करता जाऊंगा, अभय होते ही तुम खुद जुड़ जाओगे, अनन्त सत्ता से,आराम देते हुए तुम्हे, इतना योग्यतम की ओर अग्रसर करूँगा, अनन्त का एक ,एक आगन्तुकआएगा, खुद तुमतक मेरी प्रतिच्छाया! जो तुम्हे मुक़्क़म्मल करेगा थोड़ा सब्र तो करो!

हवन कुण्ड

हवन कुंड जीवन है ये अद्भुत अद्भुत स्मृतियां है,एक एक क्षण का बाज़ीगर, ये जान चुका जो सब रहस्य, कैसी बेसुध वाणी उसकी क्या तुम समझ सकोगे, ना ना ना हो ही नही सकता ये तुमसे कब सम्भव है, बस बिखर बिखर के बिफर बिफर के , अपनी राम कहानी,का प्रवचन, कैसी लज़्ज़ित जीवन शौली के वाहक बन, तुम नाच रहे हो, जरा ठहर कुछ वक्त बिखर के अंधकार तो देख सखे, आलिंगन को तरश रहा ये अंधकार भी हे मानव!

भूखे का भ्रम

क्यों प्रकाश की भूखी दुनिया, क्यों इतना दावानल है, ये भूख एक भीख है, जो तुम्हे दिव्यप्रभा से दूर कर देगी, प्रारंभ से वंचित हो जाओगे तुम, बिल्कुल विरोधाभास है यहाँ, सतियों की वैष्यवृत्ति, एवं वैश्याओं का सतीत्व, तुम शायद देख न सको, क्योंकि अंधकार से चिढ़ है तुम्हे, बड़भागी होते है वो लोग जिन्हें अंधकार, मयस्सर होता है और विजयी होते है वो, जो अपना हृदय मुक्त कर देते अंधकार में, और जिनको अंधकार देखना हो, फिर उन्हें तुम्हारे जैसे आँखों की कोई आवश्यकता नही, उनकी बौखलाहट भूख से नही होती, जरा अंधकार को स्वीकार तो करो!

पथिक

चल रहा हूँ मै, चल रहे हो तुम, मन्ज़िले अज्ञात है, फिर भी चल रहे हैं, क्योंकि चलना हमे, दुसरो की दृष्टि में सफल, सिद्ध कर देता है, मात्र चलते रहना, किन्तु अगर रुक सको, तो रुक लो , क्योंकि रुकते ही, मन्ज़िले ज्ञात हो जाएंगी, मेरे मित्र पथिक!

विस्तार

विस्तार एक रहस्य है,औऱ विवेकानन्द रहस्य को उजागर नही करते रहस्यों को जानना तुम्हारा धर्म है,रहस्यमयी दुनिया का उजागर करना तुम्हारा धर्म नही,क्योंकि उसके परिणाम भयानक होंगे, इसलिए यदि कोई वास्तविक रहस्य का जानकार है तो वो भविष्यवाणी नही करता, यही हम भारतीयों ने किया,दुनिया के वैज्ञानिक आज जिन जिन रहस्यमय तथ्यों को सबके समक्ष प्रस्तुत कर रहे है भारतीय उन रहस्यों को सदियों से जानकर मौन है!

आनन्द-सृंखला

मृत्यु तुल्य कष्ट,परंतु मृत्यु तो एक उत्सव है कष्ट नही होना चाहिए , समाज के गति के सापेक्ष यदि तुम्हारे मन और आत्मा की गति न हो तो तुम्हे कष्ट नही होना चाहिए, तुलना प्रतिस्पर्धा तुम्हे ज्यादा मानसिक कष्ट देते हैं।हो सकता है तुम्हे ये लगे की मैं ये सब इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि प्रतिस्पर्धा और तुलना कठिन जान पड़ता देख मैं तुम्हे पलायन करने का उपदेश या प्रवचन कर रहा हूं।परंतु शांत ह्रदय से जरा आत्मा को विश्रांति देकर देखो ,विचार श्रृंखला को देखो और महसूस करो की आजतक इतना जीवन जो आपने जिया वो किसलिए जिया। ज्यादा पढ़ लें, खेल लें ,सो लें, सेक्स कर लें, कार में घूम ले, कहीं का बॉस बन लें, किसी के उपर अपनी धाक जमा लें ,या सारा संसार जीत लें और आसमां में ऊँचा उड़ ले,जादूगरों की भांति अपने द्वारा दुनियां को नियंत्रित कर लें आदि आदि................. अच्छा दो क्षण के लिए कल्पना करें, बस कल्पना करें कि जो भी इच्छा मन में जागी उसे पूरा कर लिया.... जैसे मैं एक अच्छा लेखक बनना चाहता हूँ कि पूरी दुनिया के श्रेष्ठतम सम्मान से सराहा जाऊं, मैंने वो मुकाम हासिल कर लिया तो मुझे विश्व की सुन्दरतम जगह पे द...

जाति संघर्ष!

पंडित बन जाओ, ठाकुर बन जाओ, बनिया बन जाओ, यादव बन जाओ, चमार बन जाओ, पासी बन जाओ, हिन्दू बन जाओ, मुसलमाँ बन जाओ, क्यों बनोगे हिंदुस्तानी, रक्त में है जब मक्कारी, सारी कचहरी भरी पड़ी है, भाई भाई के मुकदमों से, और चले तुम "क्षुद्र" जाति बढ़ाने महकमों में। "जब तुम अबतक जान न पाए मानवता , क्या जानोगे तुम देश की अखंडता ।" छोटी छोटी बातों पर तुम बलबलाते हो, बेटी गर्भ में मार कर बहु घर में जलाते हो, फिर देवी दूर्गा पूजने मंदिर क्यों जाते हो, काली को पूजते हो,नंगी औरत घूरते हो। कब ये बातें टूटेंगी, मानवता फिर उपजेगी, भारत माँ की शान हमारे , मानस से कब उपजेगी। प्रभाकर द्विवेदी "अहिंष्य"

अर्थव्यवस्था!

जब हम।किसी सेवा के लिए भुगतान करें और सेवा की गुणवत्ता न रहे तो हमें क्या करना चाहिए? विद्यालय में उपस्थिति न होने पर हमें फाइन देना होता है, अगर हम काजू की बर्फी का पैसा दे,और दुकानदार हमे चीनी की बर्फी दे तो हम क्या करते है? दुकानदार का सर खा जाएंगे और उससे अपना पैसा वापस करने को कहेंगे। मैं सोचता एक ऐसी व्यवस्था जो वास्तव में एक न्यायपूर्ण व्यवस्था होगी। जैसे- यदि कोई सड़क टूटी हो जिम्मेदार विभाग की लापरवाही से तो उसका हर्जाना जनता को मिलना चाहिये, स्वास्थ्यकेन्द्र में गंदगी हो तो उसका हर्जाना आम जनता को मिलना चाहिये, विद्यालय की स्थिति घटिया हो तो उसका हर्जाना उपभोक्ता को मिलना चाहिये, क्योंकि यदि हम टैक्स समय से न भरे तो हम अपराधी, यदि हम ट्रैफिक नियम तोड़े तो हम अपराधी, यदि हम सरकार का यथोचित भुगतान न करें तो हम अपराधी, और यदि सरकार से अनियमितता हो कौन अपराधी? सरकारे रोज असंख्य त्रुटियां करे तो कोई बात नही ये कहाँ का न्याय। सरकारी मातहत गलतियां कर कर के वेतन पा रहें है ,और आम लोगों का क्या, ये अन्याय है और असली भ्रस्टाचार है,जो की सरकार है। इसका जवाब है किसी के ...

महामिलन!

ज़रा निकलो अपने पिंजरे से, है कोई ऐसा जो, तुम्हे बेशर्त मोहब्बत करेगा! न टूटने का डर होगा,न शर्मिंदगी तुम्हे डराएगी, न खौफ़ होगा,प्रतिपल किसी के अकस्मात जाने का, न तुम्हारे ज़िस्म से मतलब होगा, न तुम्हारे ऐब से, बस रुख्सत करना धीरे-धीरे, ख्वाहिशें,जो तुमने सँजोये हुआ है, फेंकना है धीरे-धीरे; उनको, फिर ग़ौर से देखना तुम, ये जमीं,आसमां,समीर,नदियां ....बस समर्पित कर रहें है खुद को, बिना ख्वाहिश, बेशर्त ! बस दो-चार पल में तुम्हारा मिलन होगा उस महबूब से, जिससे मिलने के बाद, तुम्हे किसी का, इंतज़ार न होगा, न पीड़ा होगी, न ज़लन बस उत्सव होगा महामिलन का! प्रभाकर द्विवेदी "अहिंष्य"

मीरा(एक प्रेम कथा)

क्लास में जाते ही ईशिता से मुलाकात हुई,वो मुस्कुरा रही थी,मैंने कारण पूछा,तो बोली कुछ नही बस पूछी तुम तो टूरिस्ट हो न; मैंने कहा हा हूँ तो? उसने कहा मुझे घुमाने ले चलोगे? मैंने कहा,कहाँ? कहीं भी,जहाँ तुम्हें बहुत अच्छा लगता हो,उसने कहा, हम्म मुझे तो बहुत सी जगहें बहुत प्यारी लगती हैं, परर....मैं एकाएक शांत होता हूं क्या सोच रहे हो?उसने कहा, सॉरी;मैं तुम्हे नही ले जा सकता; क्यों? वैसे ही, खिलखिलाते हुए हँसी ईशिता,मै शांत चित्त हुए अपने पढाई में लग गया; पर मैं तो पढता ही नही हूं, बस नौटंकी कर रहा था; खैर ये मेरा ढंग है,पढ़ने का ,फूल नौटँकी; मैं सोचने लगा अचानक ईशिता की बातों को, और फिर अपने जीवन जीने का फ़लसफा...आनन्द बाटना;और ये एक ऐसी साधारण सी बात....मैं उसे घुमाने क्यों नही ले जा सकता हूँ.... ये सोचते हुए कुछ देर ही बीता था कि दोस्तों की फेहरिस्त आई और मेरे ठहाके से कमरा गूंज उठा;फ़िर पढाई की बातें और थोड़ी हँसी ठिठोली, फिर घर आने का समय.... घर पे माँ को मेरा इन्तज़ार रहता है,बड़ी बेसब्री से,आते ही भेली पानी के लिए दिया जाता है,और उसके बाद मैं अपनी अनर्गल क्रियायों में ...

आधिपत्य!

ये अल्फ़ाज़ और अधमरे एहसास, कभी-कभी,बहुत अच्छे होते हैं, प्रेम की घोषणाएं प्रेम को अवरुद्ध ही करती हैं, अधिकारों का सृजन करती है, अधिकार सृजित हुआ की प्रेम प्रेम न रहा, प्रेम व्यवसाय हुआ तत्क्षण, एक गुलाब का पुष्प महीनों काटों को देखने से ही, दर्शित होता है, और ये भी सम्भावना है कि न भी, दर्शित हो, परंतु यहाँ माली जैसे धैर्य का आभाव है, इसलिए शायद सड़े हुए रिश्ते आजकल प्रेम, समझ लिए जाते है, प्रेम है,अगर देखना है,प्रेम को तो, अधिकार,आधिपत्य का खोना जरुरी है, नही तो प्रेम पर्व नही बस दंगा होगा, घृणा! प्रभाकर द्विवेदी "अहिंष्य"

Male-पुरूष

माँ और पत्नी के झगड़ो में मै मध्यस्थ रहता हूं, माँ को बोलू तो नालयक, पत्नी को बोलू तो बेवफा, इसलिए ये झगड़ा शांत हो जाये जल्दी से,,, ऐसी मिन्नतें करता हु, खुद जनरल में यात्राएं कर के भी, बहन को ऐसी में भेजता हु, घर परिवार का नाम मुझसे ही चलता है, बदनामी से हर पल डरता हूँ, जो मेरे लाडले हुए,उनके भविष्य के लिए, कभी दो चार थप्पड़ रशीद कर दिए, इसके वजह से उनसे आजन्म दूर हो जाता हूं, कभी सीने से भी न लगा पाता हूं, एक एक कौड़ी के लिए ज़माने भर की ठोकरे खाता हूं,  उम्र के बढ़ते,एक एक पायदान पर, मेरी जबान कम से कमतर खुलती है, फिर भी मैं शोषक हूँ,अत्याचारी हूँ, क्योंकि मैं पुरूष हूँ, बाप क्या होता है,ये बाप बन के ही जानता हूं, क्योंकि मैं पुरुष हु,और शोषक भी हूँ...... प्रभाकर द्विवेदी "अहिंष्य"

प्रियतमा-my love

बस तुम ही तुम हो, चारो तरफ हो, आठो पहर हो, प्यास हो तुम,ज़िन्दगी भी, बेवजह है,इश्क़ तुमसे, आवारगी में शामिल तुम्ही हो, ज़िन्दगी में मोहलत नही है, बंदिशें है,दुश्वारियां है, नदियों में बसती लहरे तुम्ही हो, क्या तुमको पता है, ये आँखे सिर्फ़ और सिर्फ़ इसलिए खुलती हैं, कि तुम हो, सांसे हमारी तुमसे जुडी है, लफ्ज़ में और ख्वाब में तुम, तुमसे सुरु मैं तुमपे ही खत्म हूं, तुम ही बताओ 'मै' कहाँ हु, ढूंढता हु, मैं खुद को अक्सर! ये पल देखो ज़ा रहा है, मुझको कहीं ले जा रहा है, मालूम नही है,मंज़िल मुझको, तुम ही बताओ मै कहाँ हु, भीगी पलके,ढूंढती मुझको, तुम ही तुम हो मैं कहाँ हू? खोया हुआ हूं,खो जा रहा हूं, तुम ही बताओ मैं कहाँ हु!

नशा-addiction

जो कहते हैं दुनिया में की हम मज़े में हैं, या तो वो फ़क़ीर है या वो नशे में हैं! कुछ नशा है तो ज़रूर यहाँ सबमें, कुछ को खबर है,कुछ बस धोखे में हैं, यहाँ हर कोई किसी बात में गुम है, बस मालूम नही है कि वो किस मज़े में हैं!

ख्वाहिशे! The desire

ख्वाबों का एक बड़ा सा गट्ठर बनाओ, फिर झूम के उसमे आग लगाओ, धुंआ उठेगा ,कुछ अफनाहट! दौड़ी आएगी ज़िन्दगी! आगोश में लेना उसे! उससे भी कहना कान में उसके, ख्वाहिशें कैसे जलाई है तूने!!

आतंकी!

जो बेमौत मारे जा रहे है,तुम्हारी ज़िद से! उसका हिसाब तुम्हारे पास नही होगा, कुछ ऐसी कवायद करो की इतमिनाम रहे तुम्हे भी! तुम जिस ज़िद को पाल कर गुरुर में हो, कयामत के वक़्त तक सबकी मौत मरोगे तुम! सबकी ख्वाहिशे,ज़िन्दगी सबकी, गुज़रेगी तुम्हारी सड़ी हुई हड्डियों से! कुछ तो तय है,कि तुम्हारी ठेकेदारी तुम्हें तुम्हारी नाक रगड़ने को मज़बूर करेगी!

धारा! The flow!

ज़िन्दगी को ज़िन्दगी पर छोड़िये जनाब, ज़िन्दगी जीने के लिए है, गाली सुनने की कला आना चाहिए, ये सफलता की सीढिया कहाँ तक, कबतक छिपेंगे जनाब यहाँ, ढूंढ लेगी वो भी मंज़िल आपको, जो इसरत मंज़िल कहलाती है, बस ज़िन्दगी को ज़िन्दगी को पे छोड़ दीजिए जनाब, ये रस्ते के किनारे कुछ पुष्प लगे हैं, काटों को चीरकर ये निकले है, आपके लिये जनाब बस कुछ पल बाद, ये मिट्टी मे मिलेंगे, गर नही देखेंगे जनाब तो, संघर्ष की अवहेलना होगी, ये रस्ते में पड़ा जो पेड़ है, कह रहा कुछ अपनी व्यथा, जड़वत बने रहकर , हरा भरा रहने, का कुछ सन्देश दे रहा है! वो गोबर की खेप भी देख लीजिए ज़नाब, मृत्यु का उत्सव मना रहा है, उधर देखिये किनारे पे पड़ी टूटी पगडंडियां अपने को मिटा कर भी कर्म की प्रेरणा दे रही!

कृषक महान(the great farmer)

शहरों में बढ़ती हुई धुप, करामात है आपकी, उन ग़रीबो को जिनको देख आपके पसीने निकल आते हैं, वो जो बरसात हुई है, आपकी महबूबा को लूभा रही है, ये करामात है उनका, जिनके वजह से आपके पसीने सुख जाते हैं!

धर्मयुद्ध!

कुछ पानी पी पीकर गरियाते है तुमको बुद्ध ,कबीर! क्यों बनाया नही उनको तुमने युद्ध के लायक, इन्हें मृत्यु ही सीखना था तुम्हे, जो बटे हुए है,हज़ारो जातियों और मज़हबों में, है कोई माई का लाल जो सात अरब को बांधे एक बस एक मज़हब में!फिर ये आतंक की खेती ही नही हो, बंदूके तोपे बने ही न! लेकिन नही है कोई बुद्ध कबीर , क्योंकि आज का दौर उन्हें बेमौत मरने को मजबूर कर देता है, और वो भी क़ुछ सुकून पाते है मौत की गोद मे, क्योंकि जड़त्व ,जड़त्व से किसी को हटाना एक जागे हुए के लिए पुनीत हो सकता है, बाकी सबके लिए ये घोर अतिक्रमण है, अपराध है,जघन्य अपराध, इसीलिए तो ईशा,सुकरात, को मृत्यु नसीब हुई मृत्यु!

स्वीकृति!

मेरी प्रवृत्ति मैं कंटक हूँ हे पुष्प मगर इतना सुन लो, अपने वजूद को हर्ष सहित, स्वीकारा है मैंने, मेरी प्रवृत्ति मैं कंटक हूँ अवसर देता सुंदरता की, तुमको जग में छा जाने की, नीत नूतन मेरा वज़ूद, बस देख नही पाते है लोग, पर नही मुझे कोई शिक़वा, मैं कंटक हु तो कंटक हूँ, तुम अहोभाग्य, मैं दुर्भाग्य सखे!

Choice!

Do you have any choice? Hmmm perhaps no or I can see that I am choice less . Ohh that's great!  welcome please I have found. Choice lessness is timelessness.

फर्क़

तुझमें और मुझमें बस फ़र्क़ इतना है, तुम भूल जाते हो, मैं भूलता नही, इसीलिए शायद तुम लड़ते हो, मैं मस्त करता हूं, तुम भूलते बहुत हो, तुम भूलते बहुत हो, ..... बस फ़र्क़ इतना है, तुम सोते बहुत हो! मैं जागता बहुत हूं!

गुरुदेव! सांड!

  मुझसे मेरे दोस्त ने पूछा, यार प्रभाकर!    तुम करते वरते तो कुछ हो नही,ऊपर से हँसते भी बहुत हो,मस्त रहते हो, क्या बात है,तुम्हे आलस्य में इतना मज़ा क्यों आ रहा है? क्या बात है यार तनिक भी नही सिकन तुम्हारे मुख पर... मैं देखा जैसे शून्य में, और फिर थोड़ी देर बाद मैंने कहा उससे,"देख भाई मार्च अप्रैल के महीने में मुझे एक गुरु जी मिले,बड़े निश्चिन्त प्रवृत्ति के दिखे मुझको तो मैने भी तुरन्त दीक्षा ले ली उनसे,तबसे मै भी निश्चिन्त रहने लगा,और हा ये बात मैंने किसी को बतायी नही थी किन्तु आज गुरु पूर्णिमा के दिन झूठ बोलना ठीक नही इसलिए तुम्हे बताये दे रहा हु!" मेरे पत्रकार मित्र ने मुझसे तत्क्षण कहा देखो भाई प्रभाकर मुझे उनसे मिलना ही नही बल्कि दीक्षा भी लेनी इसलिए नेक कार्य में विलंब न करो,क्योंकि मैं भी तंग आ गया हूं गधों की तरह काम करके ,मुझे भी मुक्त होना है तुम्हारी तरह! मैंने कहा ठीक है,मैं ले चलूंगा तुम्हे गुरु जी के पास,किन्तु एक शर्त है मित्र कि तुम घबराओगे नही,बिल्कुल नही घबराओगे क्योंकि डरे कि मरे,गुरु जी हिमालय से भी खतरनाक स्थान पर रहते हैं, बोलो..रिस्क लेना चाहो...

सृंखला

कभी -कभी बस कभी-कभी, ये ऐहसास होगा मुझे,कि मै अकेला ही हूँ, ज़िन्दगी के तज़ुर्बे हमेशा याद नही रहते, कुछ कुछ ख्वाब यूँही मज़ारों को रुख हुआ करते है, कभी-कभी बस यूँही जो लगता है,मुझे, माना कि भ्रम है, मगर वज़ूद भी तो है, ज़िन्दगी गुलज़ार भी यूँही है, बेवजह,जैसे ये तनहाई है बेवजह।

कविता(poetry)

गर इम्तिहान न होता, ज़िन्दगी इत्मीनान न होती, एक ख्वाब,एक लम्हा,और है, ज़िन्दगी, ज़िन्दगी के सफर की धूप ज़रूरी है, जिससे छांव की कशिश बरकरार रहे, कुछ टूटे फूटे शब्द यूँही गढ़ते रहने, से कविता ही बने ये ज़रूरी नही, ज़रूरी है,वो चाह जो विपरीत है, तुम्हारे,और आना चाहे तुम्हारी तरफ़, तो तुम्हारा हर लफ्ज़ चाहे अपाहिज ही हो, एक कविता होगी,एक ग़ज़ल होगी! "अहिंष्य"

मृत्यु(Death)

मृत्यु तुम्हे ले जाएगी, ऐसी दुनिया में जहाँ न कोई हिन्दू, और न मुसलमाँ सिख्ख ईसाई, वहां समझ आएगी तुमको, नही वसुंधरा का धर्म कोई पर मानवता से, वहाँ भास ये तुमको होगा, नफरत में तुमने इस धरती, को भस्म किया बस भस्म किया, प्रेम तुम्हे होगा ज्ञात, किन्तु उस वक़्त बहुत तुम दूर रहोगे इस जीवन से, फिर तरसेगी रूह तुम्हारी, फिर तड़पेगी रूह तुम्हारी, कैसे की एक शब्द  "धर्म" ने तुमको तुम्हारी जाति का कातिल बना दिया!

उद्देश्य!

इस धरा पर आकर गर तुम, प्रेम नही पहचान सके, जीवन से तब मृत्यु सखे, तुम श्रेष्ठ समझ लेना, क्योंकि प्रेम रहा वो तत्व सखे, धरा पे तुम प्रकट हुए, गर प्रेम नही तुमने जाना, सारा सार भस्म कर डाला, विस्मृत होना तम नही, अजागृति महान तम है, तम ही नही कुण्डित है!

नदी-बेटी

पूजी मेरे देश मे नदियां भी जाती है, हक़ीक़त मगर उनकी कचरों से भर जाती है! माताओं की भक्ति में पांडाल सजते है, गर्भ में बच्चियों के ख्वाब मरते है!

प्रतिदान!

न निर्मम है न निर्मल है, ये मात्र तुम्हारा प्रक्षेपण, स्वतन्त्र अनिश्चितता, सुरक्षा का बंदीगृह भी, ये अन्वेषण जो किये गए, वसुधा की अग्नि तपस्या है, यूँ तुमने लौटाया करुणा, वेदना यहाँ अचम्भित है!

हँसती लड़की!

रास्ते से जा रही थी वो, कोई आकर्षक खिलौने नही थे, फिर भी बेबाक हंसना उसका, बेफिक्र मुस्कान उसकी उस बच्चे से, ज्यादा कीमती थे जिसके हाथ में रिमोट वाला हवाई जहाज़ था, उस मासूम सी बच्ची ने अकस्मात मुझको बहुत कुछ सीखा दिया, सिखाया उसने की खुसी के लिये धन दौलत जरूरी नही बल्कि जरूरी है तो स्वीकार्य आनन्द और संतुष्ट सलीका जो पैसे रुपये से कतई नही आता, उसके लिये अनुग्रह की आवश्यकता है,हम कितने अनुग्रह से भरे है उस प्रकृति के प्रति जिसने हमे बस दिया ही दिया है, लेकिन हमारी प्यास बुझती ही नही,और पाना है हमे और! वो हँसती हुई लड़की अपने आप मे एक हस्ती थी जिसे शायद मैं ही समझ रहा था,क्योंकि मैंने उसकी आंतरिक झलक जो देख ली थी!

कीमत

वक़्त के बारे में इतने अचंभित क्यों हैं आप,ये है ही है,अनंत असीम,बस समायोजित होना सीखना है आपको,वक़्त के साथ जैसे जैसे समायोजित होंगे सब रहस्य प्रत्यक्ष हो जाएगा धीरे धीरे, लेकिन इसको सीखना पड़ेगा,बिल्कुल पुष्प जैसा है ये वक़्त का मरहम धीरे धीरे लगाना प्रारंभ करेंगे आप,और एक तथ्य आवश्यक है,वो है बेफिक्र होना,बेफिक्री जरूरी है। ये आसान भी नही है,और कठिन भी नही है,बस सम्यक होना है और आप पाएंगे कि धीरे धीरे आप वक़्त के साथ हो गए,और आपको कीमत की फिक्र नही करनी है,बस चलना है आपको वक़्त के साथ! सानन्द! यही ज़िन्दगी की कीमत है!
फकत एक ख़्वाब के सिवा, ज़िन्दगी और कुछ भी नही, तुम्हारी ज़िद के बंधे तुम, ज़िन्दगी कब जियोगे, क्योंकि ज़िन्दगी एहसास- ए-दरिया है,इसमें उतरो, और फिर तुम्हे ज्ञात होगा, की ज़िंदगी की दरिया भी, तुम पार तभी कर पाते हो, जब तुम प्रयास करना छोड़, अपने भीतर शांत होकर स्थित हो जाते हो! "प्रभाकर अहिंष्य द्विवेदी"