हे पथिक सुन, सन्देश है,कुछ पल चलोगे,कान में गर्म वायु, बहकर अप्सरा जाएगी, उस मोड़ पे जहां तुम विश्राम, को उद्धत हुए,कैसी विचित्र, विडम्बना तुमको यहाँ, निहार रही, जाओ तुम वहाँ, जाकर मिलो, उस नृत्यांगना से,गुर सीखो,कला सीखो,और कुछ मातृत्व भी, वात्सल्य और श्रृंगार भी, कुछ प्रेम के पथ पर चलो, खुद की खुदी को छोड़कर, हिंसक हुए यूँही तुम भटकते रह, जाओगे,जाओ वहां पर झीलों की, खुसबू है, इत्र है कुछ विशिष्ट, खो जाओ और पी भी, जाओ अश्रु जैसे रस को भी, उत्साह से उत्सर्ग को, चूमो,वहाँ झूमो वहाँ, लयबद्धता की गति में तुम, मैं को सुलगाते रहो फिर रस बहेगा,सृष्टि का, उसमे भिगो के अश्रु को, सृंखला का उद्धार कर, खुद को विसर्जित कर वहाँ, खो जाओ तुम आकाश में, मिल जाओ तुम संसार मे।