निर्वाण की ओर..

दहन कर रहा हूँ,
देखो हवन कर रहा हूँ,
यादों,ख्वाबों और ख्वाहिशों,
का हवन कर रहा हूँ!

अनुभूति!
निरसन, अपकार और,
घृणा सारे भावों का
दहन कर रहा हूँ!

शिकवे गीले एहसास
सारे,बुने थे जो ख्वाब सारे,
देखो उन सबका अग्निकुंड में
दहन कर रहा हूँ!

रोएं रोएं के रोष और
प्रतिशोध युक्त भावों के संग
तुमसे आसक्त हृदय के
सारे एहसासों को!

जो नही दे सका तुमको
कशक भी इसकी,और
जो मिलती
है इश्क में सजाएं!

समग्र उन भावो को
देखो सहन कर रहा हूँ,
और शेष कुछ बचा गर
उसको हवन कर रहा हूँ

अवशेष नही है अब कुछ
बस भाव अनुग्रह के,
तुम अपने अग्रिम जीवन
को जी सको शान से
इसका जतन कर रहा हूँ,
और घृणित होने का,
नज़रों में तुम्हारे,
कुछ यतन कर रहा हूँ!

मेरे एहसास क्या है,
टूटते ही जाना तो,
फितरत रही है मेरी,
फिर भी खुद के टूटे टुकड़ों से
सृष्टि का वाहक हूँ मैं
सारे तमस को देखो मैं
आज दहन कर रहा हूँ
जितना भी तुम मुझमे हो
एक-एक आहुति में
खुद को रिक्त करने हेतु
देखो हवन कर रहा हूँ
हवन कर रहा हूँ!



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