साथी...७

नीले-गगन के तले
 प्यारी-सी पवन चले
खिड़की से सूरज दिखे..
 कुछ इस तरह हम मिले...

दो किनारे यहाँ मिल रहे हैं,
देखो नये आयाम बन रहे हैं,
एक तरफ है ख़ाली-सा आकाश,
दूसरी ओर काली जुल्फों की बदली
मन मे खिली एक प्यारी-सी रजनी!,
कुछ तरंगे देखो बह रही है...
एक वृत्त है बना है परितः
केंद्र हम दोनों की है नाड़ी
एक तरफ एक ठंडा किनारा
दूजे तरफ एक गर्म पताका,
दोनो ही मिल रहे है एक दूजे से
देखो है कैसा ये संयोग न्यारा...
सारी घटाए..प्यारा-सा बादल
और तुम्हारा न्यारा-सा आँचल
बन्धन से मुझको मुक्त है करती,
अंतरिक्ष का दर्शन कराती...

ये साथ तुम्हारा
 संयोग नही...
विधान है....
इतने प्यारे एहसासों का...

ढलने का वक़्त फिर सूरज का आया..
फिर वही खिड़की और तेरा साया..
किन्तु देखो ये क्या हो रहा है?...
एक सूर्योदय और एक सूर्यास्त...
सन्ध्या ये कैसी.. भ्रम है या माया
न भ्रम है ये और न ही ये माया...
बस प्रवहित-सी है एक धारा..
और है ये अंतस-आकाश..
टूटे हैं सारे पड़ाव..
बिखरी पड़ी है रश्मि!
और अंतहीन भवधार!.....


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