बालक-बालम!

बालम... बालमा..
बालक...
प्रेमी भी पुत्र,पति भी पुत्र-सा
उपनिषदों में उल्लेखनीय है ये बात,
ऋषि आशिर्वाद दे रहे है,"तुम अपने पति को इतना प्रेम,इतना प्रेम करना कि दस सन्तान के बाद तुम्हे 11 वा पुत्र अपने पति जैसा प्राप्त हो!"
स्त्री के प्रेम का शिखर तभी है जब वो आपको पुत्र स्वीकार करे बेशर्त!
और पुरूष का शिखरतम प्रेम उसको जनक औऱ लक्षिता को जानकी बना देता है!
और ये बेशर्त दशा सर्वथा त्याग के बाद प्राप्त होती है
बालम.. बालमा..
हे प्रिय तुम बालक मैं माँ!
ये प्रेम का स्तर है जहाँ से प्रेम विदा होकर..
विशुद्ध कर्म में परिणीत होता है!

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