फितरत!

निगाहो की फितरत है साहब,
सत्ता में नशे में रहने की....

और सत्ता की भी फितरत है,
दहलीज कभी भी लाँघने की...

चरम है उत्थान तो समझो,
प्रारंभ-पतन भी निकट ही है!

किस्मत की भी एक फितरत है,
क्षण-क्षण परिवर्तित होने की...

तय कर लो तुम क्या करना...है!

वक़्त की भी फितरत है
बस बहने की..हाँ चलने की...

बस चलने की...हाँ चलने की...!

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