सूर्य-चन्द्र...एक लोककथा!

भैया श्री सुधाकर,श्री दिवाकर..आदरणीय पिता जी के साथ ही रहते थे,बहन सु.श्री स्मिता और मैं राज(प्रभाकर) मम्मी के साथ और दादी  राजदेई देवी जी के साथ गांव में ही रहता था,
गांव के प्राथमिक विद्यालय में मेरा और दीदी का पठन-पाठन हुआ,भैया लोग अत्यधिक स्नेह करते थे,गुरु अभिभावक सब वही थे, पिता जी से हम लोग(मैं और दी) बहुत बेतकल्लुफी से बात करते थे,
पिता जी भैया लोगो की बहुत पिटाई किये थे,लेकिन मुझे और दी को कभी भी स्नेह के अतिरिक्त और कुछ नही...
पिता जी अकेले पुत्र है दादी के, जो अब नही हैं हमलोगो के मध्य...स्वर्गीया राजदेई देवी
पिता जी का मूल नाम तो मनोज रखा गया था,किन्तु एक योगी आये और जबरदस्ती लालमणि नाम रखकर चले गए..
एक मामले की विवेचना में एक न्यायाधीश जिनका नाम खुद लालमणि था...
अपने नाम का अर्थ पूछे..पिता जी को तबतक नही मालूम था..
कोर्ट से निकलने के बाद पिता जी मुझसे पूछे तो मैंने बताया कि "कृष्ण" होता है...न्यायधीश महोदय को भी पता चला.. उन्होंने धन्यवाद अर्पण किया...

दादी ढेर सारी कहानियां सुनाती थी,
मै और दीदी माँ के पास ही सोते थे,
बीच मे सोने की जिद मेरी हमेशा पूर्ण होती थी..
मम्मी भी कहानियां सुनाती..मम्मी की कहानियां आध्यात्मिक होती थी...
एक कथानुसार चन्द्र और सूर्य भाई थे,एक निमंत्रण में भोजन करने जा रहे थे,माँ ने कहा कि आते वक्त मेरे लिए दो पूड़ियाँ लाना... दोनो भोजन कर आये..
सूर्य ने कहा कि माँ मैं बिना नियम पूड़ी नही लाया,लाता तो चुरानी पड़ती...किन्तु चन्द्र ने अपने कुर्ते में दो पूड़ियाँ चुरा लायी थी..
माँ ने चन्द्र को शीतल रहने का और सूर्य को तेज से उत्तप्त रहने का वर दिया...
जैसे ही ये कथा कह लेती माँ मुझसे पूछती तुम क्या करते मैं हमेशा कहता कि नही लाता...नियम विरुद्ध..
माँ कुछ नही कहती हमसब सो जाते थे...

रात्रि में सबके सोने के बाद मैं धीरे से बिस्तर से हटकर गोशाला में अपने प्रिय बैल के पास जाकर उर से लगा सोता था...बैल की खुर्द जीभे मेरे बाल मुँह सब चाट जाती थी...
बचपन यूँही बिता...

एक बात और माँ(आरती देवी निरक्षर है)
उन्हें मैं उनका नाम लिखना सिखाया करता किन्तु वो भूल जाती... आजतक निरक्षर ही है...
किन्तु ढेर सारे गीत स्मृति में है,जब माँ अकेली रहती गीत गुंगनाने में व्यस्त रहती...
माँ ने हमेशा ईमानदारी सिखाई..
अभी दो दिन हुआ दीदी का MBBS पूरा होने को है तो माँ-पिता जी कोलकाता से आये...
आते ही माँ का माथा चूम लिया मैंने
उसने कहा"मोदी कह रहे थे मुझे माँ गंगा ने बुलाया है।"
मैंने कहा तो
तो उसने कहा"मुझे गंगा सागर ने बुलाया था)

माँ दिव्य ज्ञानी है निरक्षर होते हुए!
पिता जी एक ईमानदार वीर पुरुष हैं!

दादी के मृत्यु के कुछ माह पूर्व ही उसके गोद मे सिर रख मैं बहुत विलाप किया था...मैंने कहा था कि उसकी मृत्यु में नही रोऊंगा...
और सत्य है दादी के मृत्यु में मेरी आँख से एक बूंद भी नही गिरी...
मैं अवाक भी नही था...
बिल्कुल शांत था...
मैंने सारा विलाप उसकी गोद मे ही कर लिया था...

दादी आज भी मेरे जेहन में जीवित है!

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