जड़त्व-एक प्रेम कथा!..

सेजल! उस दिन की सारी घटनाएं मुझे याद हैं और अभी तक याद है,उस दिन बिल्कुल अकस्मात मैं यूनिवर्सिटी का कार्यक्रम बीच मे छोड़ा था, लोग अवाक थे मेरे इस बर्ताव से सेजल!
मैं वहाँ से घर आया,माँ ने कहा था मुझसे,याद है मुझको सेजल,
"शिरीष कपड़ा गंदा हो गया है निकाल दो मैं धूल दूंगी।"

मैं तुरन्त हरी टी-शर्ट और व्हाइट वाली जीन्स पहनकर कैंटोनबोर्ड की तरफ चला गया,जहाँ से होते हुए अक्सर मैं गंगा एवं यमुना नाम वाले इंजिनीरिंग कॉलेज के द्वारों से होकर संगम जाकर वास्तविक गङ्गा और यमुना के दर्शन किया करता था,किन्तु उस दिन...
    यकायक मैं मुड़ा न जाने क्या सुझा मैं तुम्हारे यहाँ चला गया और अंकल-आंटी से थोड़ी देर बातचीत के बाद मैं तुम्हारे स्टडी-रूम में आया था! सब याद है मुझे
"अर्रे...शिरीष! तुम कब आये"
बस अभी यूँही...मैंने कहा।
अच्छा प्रोफेसर शिरीष सुना है आजकल ज्योतिष का सोध चल रहा है तुम्हारा...
हाँ चल रहा है किन्तु तुमसे किसने कहा
हम्म...अवनि ने।
सेजल ने अपना हाथ मेरे हाथ में देते हुए कहा...
तब फिर देखो मेरा हाथ!

और हाथ देखते हुए पहले तो मैंने बेहतरीन नेल पॉलिश और नेल्स के रख-रखाव की तारीफ किया..
और फिर सेजल का हाथ देखकर उसे बहुत कुछ बताया,
उसने कहा शिरीष तुम तो वाकई जानकर हो गए हो....

किन्तु तबतक मैं सेजल के बालों के खुश्बू! में खो चुका था,हमेशा रिजर्व्ड रहने वाला शिरीष आज भावों के भवसिन्धु से शून्य या पूर्ण,ये तो बता पाना मुश्किल है,लेकिन वाकई बेहतरीन खुशबू थी वो,भूल नही पाता हूँ मै...

और फिर मैंने सेजल के बालों की क्लिप खोल दी और कहा कि वो बाल खुला ही रखे,खुश्बू को बिखरने दे,मुझे अच्छी लग रही है ये सुगंध....

      किन्तु....
ये सारी क्रियाएं भावनाओं की ही परिणति रही होंगी,और सेजल के बालों की खुश्बू वाकई मन्त्रमुग्ध कर रही थी मुझे,और उसकी आंखें या कहिये वो सारी सूक्ष्म से विराट तक "सेजल" जैसे कोई डिवाइन आकर्षण या अनुभूति मैं समयशून्य एवं भार शून्य हो गया था उस वक़्त मुझे स्मरण है जब मैं केवल एक चैतन्य चेतना के अतिरिक्त और कुछ नही था....
     किन्तु यथार्थ और "जड़" की प्रवृत्ति है की वो रिक्तता को भरता है,शायद इसलिए हिंदुस्तान के संत और विवाहित लोंगो का भार बढ़ता ही जाता है!..
   क्योंकि सन्त तो भारत मे ही पाये जाते है अन्यत्र मुश्किल से......
    खैर सेजल की चैतन्यता का दर्शन भी मुझे हुआ था उस क्षण किन्तु तुरन्त यथार्थ संसार को शून्य को भरते भी मैंने देखा था.....
   जड़ की विशेषता है कि चैतन्य को वो नकारात्मक समझता है और यदि जड़ चैतन्य को सकारात्मक या वास्तविक समझ ले तब तो फिर जड़ का अस्तित्व ही नष्ट हो जाएगा..
  बीज में विस्फोट होगा और बीज में विष्फोट होने से बीज गुरुत्व के विरुद्ध एक सुंदर यात्रा करता है और नीलगगन के समक्ष विस्तीर्ण होता है....
   किन्तु नष्ट होकर परिवर्तित होने की जहमत उठाने की हिम्मत मनुष्य में कहाँ?
और यथेष्ट वजह भी है,नियम है जड़त्व का,एक प्रमाणिक नियम है...
   "कोई भी पदार्थ अपने मूल अवस्था मे तबतक बना रहता है जबतक उसपर कोई बह्यबल आरोपित न हो,और प्रारंभ में तो बाह्य बल की तीव्रता अधिक होनी चाहिए जड़त्व को तोड़ने के लिए।"
 
   ये सब बातें मैं यहाँ अनायास नही कह रहा,ये बातें अनायास नही,गौर करेंगे तो ये बाते वो बह्यबल है जिसकी आवश्यकता होती है चेतना की यात्रा के लिए....वो बल मूलतः प्रेम है! समर्पण है!
    और प्रेम जितना तीव्र होगा चैतन्यता की सम्भावना उतनी ही ज्यादा है। इसलिये तो प्रेमी बदल जाते है,प्रेमिका बदल जाती है परिवर्तित हो जाते हैं!
   और ये बात भी पक्की है कि जड़! ही को लगेगा की परिवर्तन हुआ है...
   बीज वृक्ष में परिवर्तित हुआ तो बीज तुम्हे मिलेगा, कभी नही,मिल ही नही सकता। किन्तु हाँ यदि तुम्हारी दृष्टि बदल जाये तो वो बीज तुम्हे दिख सकता है....विशद रूप में...विस्तीर्ण रूप में....

  शायद इसलिए आज तुम्हे मैं परिवर्तित देखता हूँ हाँ मैं भी क़भी-क़भी यथार्थ और जड़ के भय से भयभीत जैसा हुआ किन्तु सेजल पवित्रता, दिव्यता का आभास मुझे होता है,परिवर्तित तुम भी हुई,परिवर्तित मैं भी हुआ...दृष्टिकोण भी परिवर्तित हुए....

  मैं आभार प्रकट किया,और कर रहा हूँ समस्त प्रक्रियाओं का...
   शिरीष आज प्रोफेसर शिरीष है किन्तु अब वो वही शिरीष न रहा,जिसको जो चखे न वो जान नही सकता है,
और जो जान गया वो बता न पायेगा,हाँ सेजल!
   शिरीष अब गूंगे का गुड़ हो गया है।

   वास्तव में गुरु होना न सेजल एक सामान्य प्रक्रिया नही है क्योंकि गुरु का कार्य है वो बल आरोपण करना जो नष्ट करे जड़त्व को,इसीलिए गुरु और शिष्य में दो ही भावना हो सकती है,जिसमे भावना भी शिष्य की होती है,क्योंकि गुरु तो भावनातीत होता है.....
  औऱ वो दो भावनाएं है
   1-घृणा,
   2-श्रद्धा
 इसलिए गुरुओं को गाली खाना, तिरस्कार सहना,बहिष्करण इत्यादि का कोई प्रभाव नही होता...
    क्योंकि उसके लिए वातावरण और सृजन की घटना के लिए नष्ट होने की सामर्थ्य होना चाहिए जो ७०० करोड़ लोगों में ७ लोगों से ज्यादा की न होगी ये नियम है...
   इसलिए गाली, इत्यादि घृणा से सम्बंधित भाव जड़मति के प्रतीक हैं!



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