प्रेम-पखवाड़ा!

प्रेम से अधिकार का सम्बंध ही रिश्तों की उम्र निर्धारित करता है,प्रेम पखवाड़े को समर्पित है ये लेख,मेरे कुछ मित्र लगातार पोस्ट किए जा रहे हैं कि उसी दिन भगत, राजगुरु, सुखदेव जी को फांसी की सजा मुक़र्रर की गयी थी,अतः ये घोर अनैतिक है कि हम इस पखवाड़े में प्रेम का प्रदर्शन सरेआम करें!

मैं पूछता हूँ की शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि कैसे दिया जाए,मुँह गिरा के रोनी-सी सूरत बना कर उनके प्रतिमाओं पर माल्यर्पण करके!
या फिर फक्र से प्रेम के इतने बीज बोएं जाए,की मुल्क में प्रेम की हवा चले, और हमेशा आग लगाने की फितरत में रहने वालों का हृदय जले,जले ही नही बल्कि भस्मीभूत हो जाये तो अच्छा है।
भगतसिंह जी अपनी माँ से कहते हैं कि वो नही चाहते कि मां के आँख से एक बूंद भी आंसू गिरे, क्योंकि वो दिखाना चाहते थे की वो वतन से मोहब्बत में हंसते हंसते फंदे पर झूलेंगे!
और आज चंद लोग प्रेम को ही लगाम लगा रहे हैं,जैसे कोई कुकर्म हो,अरे बच्चा मां से प्रेम करता है,तरुण तरुणी से प्रेम करता है,और वही प्रेम परिष्कृत होकर राष्ट्रप्रेम में बदलता है!

और ये लोग प्रेम पर पाबंदी लगाने चले हैं,लोगो को भावनात्मक रूप से परेशान करके!
अरे नादानों बिना प्रेम के तुम उत्पन्न तक नही होते,जो चले हो प्रेम प्रतिबंधित करने!

दीवानों को तुम दो प्रश्रय
दीवाने काम आएंगे!
आज महबूबा है तो!
जरूरत पड़ने पर,
शान-ए-वतन में,कफ़न
तिरंगा ओढ़ आएंगे।।
ये नादान बच्चे प्रेम कर रहें हैं
और तुम उनपर लाठियां बरसाओ
ये निकृष्ट काम करने को
तुम्हे कौन इज़ाज़त दे देता है यार!
अरे बहुत गर्मी है रक्त में,
तो संगठित होकर,गंदी जगहों को स्वच्छ कर लो,
शायद मन के भी कलंक धूल जाएं!
दो-चार और नेक काम कर लो!
औऱ तसल्ली मिल जाएगी।।
औऱ जो शहीद हुए हैं उनकी
आत्मा को तृप्ति मिलेगी
कि उनकी शहादत बर्बाद नही हुई!
मुल्क में अमन-चैन-स्नेह और बन्धुत्व
कायम है!

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