खत..३
ये समझ ना,
बड़ी नासमझ होती है,
बिल्कुल क्वांटम भौतिकी की
तरह,छोटे-छोटे कण
जिसके ब्लैक होल के विचार
में स्टीफ़न साहब fully paralised हो गये!
निःसंदेह जीनियस हैं!अतिशय जीनियस हैं
बड़े बड़े का पसीना छूट जाता है उन्हें समझने में
ये समझ की नासमझी ही तो है
की जो ज्ञान की बात करे
वो प्रेम में पड़ के कांप नही सकता
अगर कांप दे तो खैर नही उसकी,
हैं न!
ये समझ है...ये नासमझ होती है
मैं भी दुनियादारी से परिचित हूँ
अभी तक तकरीबन 10 वर्ष
से मेरी चेतना ने लगातार ढेर
सारे दिव्य ख्याल आप पर प्रक्षेपित किये
आगे भी करती रहेगी
आप भले स्वयं को हाड़ मांस मज़्ज़ा
की पोटली समझे,लेकिन
मेरे अन्तस् ने आपको उसके पार
ब्रह्मांड के उम्र जितनी दूर तक महसूस किया है!
जरूरी था कि मुलाकात हो
अब दिव्य कल्पनाओं को समक्ष देख
जो कम्पन था दरसल वो भय का
प्रतिरूप है,
इतने खण्ड हुए मेरी रूह के,
इतनी उपेक्षा, इतनी घृणा
से गुजरी है ये रूह....
जैसे किसी बजबजाती नाली में
रहने वाले को, कोई
नगर के महाराज के चमचमाती
कालीन पर खड़ा कर दे तो
उसे भय होगा, की कही कोई गुस्ताखी न हो जाये
राजमहल उसके दुर्गंध से दूषित न हो जाये
फिर कंपन तो लाजमी है!
बस वही हाल हुआ उस दिन
उसके अतिरिक्त और कुछ नही
आप से शायद फिर कभी किसी मोड़
पर मुलाकात हो,
लेकिन सम्बन्ध वही रहेंगे
चरणों की धूल-सा ही रहूँगा
इसमे सुकून है मुझे,आराम है!
शुक्रिया उस महाराज को
जिसने इतने दूषित को भी
अपने समक्ष रखा,उसका भिक्षा पात्र भरा!
और रही बात प्रश्नों के उत्तर की
तो वो सारे प्रश्न गलत है
गलतफहमी हुई है,आपकी डॉल
के लिये आप आज भी पूज्यनीय है
कही से गलत समझा आपने
मेरे नसीब के सारे रिश्ते आपको
बहुत दिव्य समझते है!
मुझे कोई सम्बन्ध नही
रखना क्योंकि मेरी इतनी अर्हता नही
आप निश्चिंत रहे,प्रसन्न रहे
आपको वो समग्र अनुभूतियों
का बोध हो,जो आपकी कल्पना में हो
धन्यवाद! कोटिशः धन्यवाद!
जहाँ समझ शून्य हो जाये
जहां ज्ञानी भी रंक हो जाये
और अनुभूति से कांपने लगे...
वो जगह होती है प्रेम की, परमात्मा की!
बड़ी नासमझ होती है,
बिल्कुल क्वांटम भौतिकी की
तरह,छोटे-छोटे कण
जिसके ब्लैक होल के विचार
में स्टीफ़न साहब fully paralised हो गये!
निःसंदेह जीनियस हैं!अतिशय जीनियस हैं
बड़े बड़े का पसीना छूट जाता है उन्हें समझने में
ये समझ की नासमझी ही तो है
की जो ज्ञान की बात करे
वो प्रेम में पड़ के कांप नही सकता
अगर कांप दे तो खैर नही उसकी,
हैं न!
ये समझ है...ये नासमझ होती है
मैं भी दुनियादारी से परिचित हूँ
अभी तक तकरीबन 10 वर्ष
से मेरी चेतना ने लगातार ढेर
सारे दिव्य ख्याल आप पर प्रक्षेपित किये
आगे भी करती रहेगी
आप भले स्वयं को हाड़ मांस मज़्ज़ा
की पोटली समझे,लेकिन
मेरे अन्तस् ने आपको उसके पार
ब्रह्मांड के उम्र जितनी दूर तक महसूस किया है!
जरूरी था कि मुलाकात हो
अब दिव्य कल्पनाओं को समक्ष देख
जो कम्पन था दरसल वो भय का
प्रतिरूप है,
इतने खण्ड हुए मेरी रूह के,
इतनी उपेक्षा, इतनी घृणा
से गुजरी है ये रूह....
जैसे किसी बजबजाती नाली में
रहने वाले को, कोई
नगर के महाराज के चमचमाती
कालीन पर खड़ा कर दे तो
उसे भय होगा, की कही कोई गुस्ताखी न हो जाये
राजमहल उसके दुर्गंध से दूषित न हो जाये
फिर कंपन तो लाजमी है!
बस वही हाल हुआ उस दिन
उसके अतिरिक्त और कुछ नही
आप से शायद फिर कभी किसी मोड़
पर मुलाकात हो,
लेकिन सम्बन्ध वही रहेंगे
चरणों की धूल-सा ही रहूँगा
इसमे सुकून है मुझे,आराम है!
शुक्रिया उस महाराज को
जिसने इतने दूषित को भी
अपने समक्ष रखा,उसका भिक्षा पात्र भरा!
और रही बात प्रश्नों के उत्तर की
तो वो सारे प्रश्न गलत है
गलतफहमी हुई है,आपकी डॉल
के लिये आप आज भी पूज्यनीय है
कही से गलत समझा आपने
मेरे नसीब के सारे रिश्ते आपको
बहुत दिव्य समझते है!
मुझे कोई सम्बन्ध नही
रखना क्योंकि मेरी इतनी अर्हता नही
आप निश्चिंत रहे,प्रसन्न रहे
आपको वो समग्र अनुभूतियों
का बोध हो,जो आपकी कल्पना में हो
धन्यवाद! कोटिशः धन्यवाद!
जहाँ समझ शून्य हो जाये
जहां ज्ञानी भी रंक हो जाये
और अनुभूति से कांपने लगे...
वो जगह होती है प्रेम की, परमात्मा की!
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