विरह के पार!...३

देखो अभी-अभी तुम्हारा-
मुकम्मल एहसास मेरी रूह को,
बड़े आहिस्ता छू के निकला,
देर-अबेर वो तुम तक पहुंचता होगा!

क्या हसीन नज़ारा है,
इस वीरान-ए-हृदय का,
अभी-अभी हसीन सागर का
हसीन किनारा हो कर रह गया!

मैं मस्त किनारे बैठ देखता
सागर के लहरों की हलचल,
गुदगुदी कर गया तन-मन मे!
वो रेशमी-मखमली! एहसास तेरा....

मुक़म्मल तो सच मे तुमसे ज्यादा..
तुम्हारे विरह में ही हुआ!
हाय! रे विरह और तुम्हारा-
राब्ता मेरे महबूब से भी हसीन निकला!

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