विरह के पार...४

आंखे बंद की अभी ज्योहीं..
अन्तस् में देखा..
तुम्हारा रूदन निर्विकार जारी...
आँखे तो खुल गयी...

किन्तु आँखे पुनः बन्द की..
भीतर गया खुली दीवारें...
और व्योममय स्थान..
पर तुम्हे भींच कर अपने...
उर-से,कंठ-से लगाया...
आहिस्ता-आहिस्ता तुम्हें रोने दे रहा था..बरबस..
मेरी उंगलियों ने तुम्हारे केसुओ में फेरे लगाए..
रुदन सिसकियों में परिवर्तित हुआ...
बेदखल-सा मैं...

कुछ देर बाद
पुनः तुम्हे ज्यादा तेज-से,
 मुस्कुराते हुए जाने दिया मैंने..
हाँ भावों को कलम लिखती रही मेरी..

जाओ उन्नति के पथ पर..
संगिनी....अनुभूति!
मैं विरह के पार चला जाऊंगा!...
पुनः आगमन नही होगा....

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