स्वर्णिम-संसार!

तुम मोहब्ब्त से भरो पहले,
मोहब्बत तुम्हे ढूंढ़ लेगी।।

तुम काबिलियत से भरो खुद को
सफलता तुमको चूम लेगी।।

तुम डर-डर के जीना तो छोड़ो,
वीरता तुमको चुन लेगी।।

तुम नफरत का दामन तो छोड़ो
दोस्तों का पैगाम भी आएगा।।

तुम खुद के साथ सबसे इश्क़ करो,
मानवता तुममे घर कर जाएगी।।

तुम आस-पास को स्वच्छ करो,
हृदय में ईश्वर उतर ही आएंगे।।

तुम बहनों को,बेटियों को आज़ाद तो करो,
मुल्क की काबिलियत झलक उठेगी।।

शर्त बस ये है कि तुम्हारी मोहब्बत,
सिद्दत से हो,तुम्हारी चाहत पूर्ण हो।।

माँ-बाप के माथे को चूमो रोज
भाई-बहन बेटी बेटा भाभी समाज सबके साथ झूमो रोज।।

शिकायतों को फेंको कूड़ेदान में,
प्रेम,श्रद्धा, करुणा से भर जाओ।।

फिर देखो खुद की चाल,
चमकेगा विश्व का भाल!
हर तरफ मोहब्बत होगी,
न मजहब न जाति, बस मानव और मानवीयता।।



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