अंजान-सी एक नज़र
मैं किसी बात में मसगूल था,
औऱ तुम्हारी नज़रे मेंरे मुखमण्डल.
पर कुछ विश्लेषण कर रही थी...
कब क्यो कैसे...?
वैज्ञानिक नज़रें एकटक देखे जा रही थी...
किसी खोये हुए-से दार्शनिक को
मुझे खबर थी,
किन्तु मैं और मशगूल हो गया...
जिससे तुम्हे बाधा न हो कोई...
लेकिन जब मिली यकायक तेरी नज़र
मुझसे....
मैं ढेर-हो गया ढेर सारा ज्ञान लेकर...
कैसा ये भाव,कैसा ये बन्धन...
नज़रें पहचान ही नही पायी मुझको...तेरी
और मेरी पहचान ही मिट गयी...
कैसी है तेरी नज़र...
इतनी गहरी क्यों है वो नज़रें
कि मेरी हर नज़र तुमसे अलग नही..
नही...हाय रे नज़र...ये नज़र कभी न उतरे!....
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