पुनर्जन्म!

पत्नी से रोज-रोज की लड़ाइयों से तंग आकर निधीश कही अज्ञात यात्रा पर निकल देता है,मसलन प्रेम तो मिलता है रिश्तों से किन्तु अत्यधिक कडुआहट भी मिलती है,यही आजकल नासूर बन गयी थी,निधीश के लिये इसलिए वो सबकुछ छोड़ कर सुकून से कही किसी अजनबी शहर की अजनबी गलियों मे घूमना चाहता है,क्योंकि उसे लगता है कि इस तरह वो अपने अंदर शांति ढूंढ लेगा!

दो-चार दिन लावारिस भटकने पे आज ये क्या हुआ निधीश को,उसे फिर से सौम्या याद आने लगी,उसे अब ये क्यों लग रहा है कि दरसल वो झगड़े नही थे, वो जीवंत होने के प्रमाण थे!...इन्ही सब बातों के उधेड़बुन में वो पुनः वापस आ जाता है
और उसे पश्चाताप भी हो रहा है!

यही जीवन है,सागर की लहरों-सा कभी खूब हलचल कभी प्रशांतपन ये बात जीवन भर लोग समझते रहते हैं! और प्रत्येक पड़ाव पे वो और पुष्ट होते जाते हैं! और फिर एक दिन उन्हें यहाँ से जाना होता हैं!
जीवन की सार्थकता इसमे हैं कि जाने के वक़्त होश रहे और उस होश की अवस्था मे भी एक
वास्तविक मुस्कान हो,जो रोम रोम से व्यक्त हो सके!
यदि इसके इतर कुछ है तो समझिए पुनः आना हैं,और फिर वही बातें, किरदार बदल जाते हैं,कहानियां बदल जाती हैं किन्तु मूल में वही असन्तुष्टि ही है जो पुनर्जन्म का हेतु बनती है।

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