साथी...९

गंगा भी दूर तक चलकर,
यमुना भी दूर तक चलकर...
संगम में आ मिलती है!

अब आगे गङ्गा हैं..
या यमुना... समझ पाना
कठिन है....किन्तु
दोनों एक होकर....
अन्य में परिवर्तित "एक"
हो जाती हैं....

और यहाँ सरस्वती जैसा
विवेक स्वतः आ जाता है!
दो मिलकर देखो एक हुए...

परिवर्तन भी हुआ विराट..
किन्तु शिकायत तो छोड़ो...
प्रसन्नता के पार....
आनन्द अजस्र स्रोत...
फिर तुम गर परिवर्तन के..
भय से...साथी का साथ छोड़ भागे..

देखो कही कायरता तो नही है न!

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