विरह के पार!..२

जो बात तुझमें भी नहीं,
वो बात तेरे विरह मे हैं,
कम-से-कम किसी नकचढ़ी
को झेलना तो नही पड़ता है!

और एक बात जो सबसे
हसीन है इस विरह में
कि जब भी तड़पती है ये रूह
मिलने को,तो हाथ सजदे करने
लगते है,आँसू की अजस्र गहरी
धारा मेरे दाढ़ी के बाल को
आहिस्ता-आहिस्ता भिगोती रहती है
मन धीरे-धीरे हल्का होते देख
रोआं-रोआं भरता है अनुग्रह के भाव से
तुमसे तो अब कभी नही मिलूंगा!
लेकिन इतना कहता हूं कि इस
विरह से हसीन और कुछ भी नहीं
तुम्हारा प्यार तुम्हारी मुस्कान भी नही
और स्वयं तुम समक्ष भी नही
क्योंकि वहाँ दो और दो के बाद पता
नही कितनों की गुंजाइश है
और मेरे इस हसीन विरह में
मैं ,मेरी नम आंखे,भींगी सी मुस्कान
और मेरे प्यारे श्याम की
दिलकश छाँव!
हहहह! ये विरह ये हसीन विरह....
अब तुम मत आना कभी
मैं बड़े मजे में हूँ, क्योंकि अब शायद किसी
का दिल तनिक भी नही दुखता मुझसे!
ओह्ह! ये हसीन विरह!
और ये विरह के रंग!....

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