दफ़्तर!

मेरे मुल्क में आम आदमी,
दफ़्तर-दर-दफ्तर आवारा हैं,
और ख़ास आदमियों के यहाँ
आवारा दफ्तर पालतू कुत्ता है!

यूँ तो शहर में मेरे भीड़ बहुत है,
दफ्तरों तक लेकिन दो चार
घरों की ही पहुंच हैं!
वो अपनी तरह से इन दफ्तर को चलाते है!

हर दफ्तर में एक पान चबाता हुआ बाबू है
जो जलील मालूम पड़ता है,
लेकिन अंदर-ही-अंदर बड़े रसूख वाला
साहब है, हें-हें करता है,लेकिन होता बड़ा खतरनाक है!

सरकारी दफ्तर और निजी दफ्तरों में
बड़ा भेद हैं,
एक कि चाल कछुआ है और एक
खरगोश है,लेकिन कुछ भी हो अंत
में कछुआ ही भारी पड़ता है!
और आम-आदमी दफ्तर-दर-दफ़्तर,
भटकता ही रहता है! मरता ही रहता है!



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