प्रयाग-एक प्रारम्भ!

मेरा अनुभव है प्रयाग का!
इलाहाबाद जहां से अकबर भी दिन-ए-ईलाही का प्रारम्भ किये।
यूँ तो इलाहाबाद मैं कक्षा सातवी में ही गया प्रथम बार,और उसके बाद सैकड़ों बार..
किन्तु ये "प्रारंभ" वृत्तांत तब का है जब १० वर्ष तक वन्दनीय डॉ. कृपाशंकर पांडे(वर्तमान विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग ई.विश्वविद्यालय) जी के यहाँ आदरणीय भइया लोग रहकर,से सप्रेमविदा लेकर मैं दीदी और मम्मी उनके घर से कुछ दूरी पर एक दो कमरे वाले फ्लैट में शिफ्ट हुए..
क्योंकि गुरु जी के यहाँ समीक्षा प्रकाशन केंद्र प्रारंभ हुआ था और सारे कमरे किताबो  को रखने हेतु चयनित किये जा चुके थे। फिर भी वो हमलोगों को आने नही दे रहे थे वहां से...

मेरे वहाँ से आने के बाद दीदी(डॉ. समीक्षा पांडे) बराबर हम सबसे मिलने आया करती औऱ मेरी साहित्यिक पत्रिकाओं को नियमित ले जाती थी..तब वो पीएचडी नही की थी..
पांडे जी को गुरु जी ही कहते थे हमसब..हालांकि रिश्ते में वो हम तीनों भाइयों के दामाद लगते थे..
उनके परिवार से मेरे परिवार का स्नेह अनवरत जारी है..
यहाँ नए आवास पर एक मोर रहता था, खूब लम्बी पंख थी उसकी,दो चार दिन में वो मेरा अतुल्य सखा हो गया..
उस समय मेरी दिनचर्या नियमित थी,सुबह दी(स्मिता)
 कोचिंग जाती थी मेडिकल प्रवेश की..और ११ बजे मैं विश्वविद्यालय जाता था..तीन कक्षाएं ४०-४० मि. की होती और शेष समय मैं केंद्रीय पुस्तकालय में रहता था.. जहां का शांत वातावरण मुझे घण्टो बिताने के लिए बाध्य करता..

२ बजे दी आ जाती खाना बना देती और मैं शाम को खा लेता सुबह का नाश्ता दी ही बनाती किन्तु बर्तन मैं मांज देता,और शाम में सब्जी मैं बनाता एवं आटा सान देता,और दी रोटी सेक देती मैं बेल देता.. यही दिनचर्या थी..
उस समय तक मैं मितभाषी था.. समीक्षा दी से बात होती जब वो आती और भैया के कुछ मित्रजनों से,
विश्वविद्यालय में मैं मौन ही रहता..एक मित्र था केनिया के कैविन मांगी उससे मेरी खूब पटती थी..आते वक्त मैं इंटरनेशनल हाउस तक पैदल ही आता क्योंकि मैं उसके साथ आता था...वार्तालाप करते हुए..मेरे साथ अफगानिस्तान के १२ बच्चे थे,वो ज्यादा उद्धत थे सो उनसे मैं नही बोलता था और शेष सहपाठियों से कभी-कभार बात करता था...

खैर अब मुख्य चर्चा पे आते है,
भोर में उठने का बाद ११ बजे तक मैं फ्लैट पर ही रहता था..एकांत में उस वक़्त वो मोर मेरे कमरे में आता, मेरे अध्ययन मेज पर बैठ जाता,कभी-कभी मेरे सिर पर बैठ जाता, कुछ भी नुकसान नही करता,किन्तु उसके पंजे मेरे सिर पे खरोंच कर दिया करते थे..
मैं उसे रोटी देता तो कभी-कभार खा लेता..
किन्तु स्नेह मुझे अत्यधिक करता था,मुझे अपनी पँखे फैला कर नृत्य दिखता..मसलन उसकी कोशिश यही होती कि वो मेरा ध्यान भंग करे..
मैं जान-बूझकर उसे देख लेता, उसकी उत्कंठा को शांत करने के लिए...
एक दफा मम्मी के माथे पे बैठ गया,मम्मी बालकनी में चावल बीन रही थी,मम्मी के बालों में उसका पंजा फंस गया,बड़े आहिस्ता मैंने उसे निकाला,पापा की तबियत बिगड़ गयी,माँ को पापा जी के पास जाना पड़ा..
अब मैं दी और मोर तीन लोग रहते थे..
मेरा अध्ययन चरम पर था उस वक़्त,तीन घण्टे के करीब ध्यान भी करता था मैं,
मैं गौतम बुद्ध के दिये ध्यान पद्धति विपश्यना को अभ्यास करता रहता था..और अध्ययन संग में चलता रहता था..
वक़्त बीतता गया..
ये घटना दिसम्बर २०१० के आसपास की है,मेरा व्यवहार परिवर्तन प्रारम्भ हो चुका था..बिल्कुल प्रशांतपन आ गया था..अचानक मैंने विश्वविद्यालय जाना बंद कर दिया,अब सारा-समय मैं कमरे में ही गुजारता था...और शेष कार्य भी बदस्तूर जारी था...
किंतु एक महत्वपूर्ण तथ्य मैं विस्मृति के करीब पहुँच रहा था,मोर से मेरे सम्बन्ध विदा हो चुके थे,कई दिन तक मुझे न पाकर मोर अन्यत्र कहीं चला गया या उसकी मृत्यु हो गयी ज्ञात नही है,मुझे उसका ख्याल ही नही था...मैं अपने मे इतना डूब गया था..
और जनवरी की एक रात एक अभूतपूर्व घटना घटी...ठंड ज़्यादा थी,मैं और दी एक ही कमरे में रहने लगे..मैं अपने कमरे में मात्र ध्यान के हेतु ही जाता...ध्यान की अवधि अबतक 6-7 घण्टे हो चुकी थी प्रतिदिन...सन्ध्या गङ्गा जी के किनारे नरायण आश्रम में व्यतीत होती थी..
उस रात्रि मैं देर घर आया तकरीबन ११:३० रात्रि.. मेरे गली के अगले गली में धीरेंद्र त्रिपाठी भैया जो बड़े भैया के साले है,और सज्जन व्यक्ति है,एक कमरे में रहते थे,उनके यहाँ गया हुआ मैं ८ बजे का ही इतनी देर में लौटा था..
दीदी बहुत नाराज हुई मुझसे," उसने व्यग्र स्वर में मुझसे कहा ये कोई वक़्त है? आने क़ा।"
मैं क्षमा मांग अपने ध्यान कक्ष में चला गया दीदी खाना खा चुकी थी, मेरा खाना पड़ा हुआ था..दीदी सो गयी थी.. मैं अंदर ही अंदर बहुत अकुलाहट महसूस कर रहा था..एक दो रोटी खाकर मैं भी सोने गया नींद उड़ चुकी थी मेरी..
अतः मैं ध्यान करने लगा शव-आसन मे विपश्यना जारी था..
रात्रि में २ बजे के करीब मेरे शरीर के बन्धन छूटने लगे..जैसे कोई रॉकेट अंतरिक्ष मे जाता हो,मेरी आत्मा का मुक्त होना मैं देख पा रहा था... और भाररहित हो चला मैं...
इस अद्भुत अन्तस नज़ारे को देख मैं अट्टहास करके हंसने लग गया...
दीदी डर गयी थी..उसे सहज किया कि सो जाए किन्तु शायद वो नही सोयी थी,वो रजाई से चुपके मेरा हंसना देख रही थी...अभूतपूर्व थी ये हंसी..

कुछ वक़्त बाद मैं शांत हो गया,नींद आयी मैं सो गया... अगली सुबह मैं सोया ही रहा, दीदी दलिया बना कर कोचिंग चली गयी थी...
औऱ ७:३० प्रातः दरवाजे पर दस्तक छोटे भैया थे,दिल्ली से आये थे...मेरा व्यवहार उन्हें पूर्ण बदला हुआ लगा..
उसके कुछ समय बाद मेरे फ्लैट पर भीड़ जमा होने लगी कई लोग मुझे देखने आए,,मैं बहुत सहम गया था..कि मुझे ऐसा क्या हुआ है?
और उसी शाम को लोग मुझे डॉक्टर के पास ले गए,एक दो प्रश्न पूछकर डॉक्टर ने छोड़ दिया..
रात तक सब याद है,शाम तक पापा जी,माँ सब आ गए थे..
भोजन के बाद मुझे दवाई दी गई औऱ उसके बाद १५ दिन तक मेरे साथ क्या-क्या हुआ मुझे स्मरण नही क्योंकि मैं बिस्तर पर ही समस्त क्रिया कर्म करता था.. और गहरी नींद में था...बहुत लोग(रिश्तेदार मित्र) मिलने आते दीदी कोचिंग जाना बंद कर दी थी.. दिन भर मेरी देखभाल दीदी भैया,माँ करते रहते थे...
और अंततः कुछ दिनों बाद इलाहाबाद छोड़ना पड़ा...
अगले सत्र में दीदी कानपुर चली गयी..और मैं पापा जी के साथ अमेठी चला गया...
मेरी शरीर अत्यधिक कमजोर हो चुकी थी..
किन्तु एक प्रारम्भ हो चुका था मेरे अंदर
प्रयाग ने अपना कार्य कर दिया था..
मुझे सन्तुलित होने में ३-४ वर्ष लगें... किन्तु प्रारम्भ हो चुका था...मैं परिवर्तित हो गया था...


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