दुनिया के किनारे-२

आज फिर बैठा उसी झील के
किनारे,पहले सहज हो कर बिल्कुल
आराम के वास्तविक मुद्रा में होकर!
देख रहा हूँ छटा मनोहर!
मन मे प्रेम उभर रहा, आज थोड़ा
विपरीत होगा,आज झील निकली
और मुझसे भी कही की निकलो अपने शरीर से
चलो ऊपर पेड़ पे बैठते है!
मैं अनुग्रह व्यक्त किया झील को,आमंत्रण के लिए,
आज झील कही की आज मैं
कुछ कहूंगी तुम सुनना!
मैंने हामी भर दी,पेड़ पे मस्ती में झील के उद्घोष सुनने लगा!

तुम चमड़ी के अंदर क्या,
 घुस के कभी देखे!
सारे लोग एक जैसे हैं,
रोगी,भोगी,योगी कोई भी हो!
चमड़ी के अंदर सब एक जैसे है!
किन्तु तुमने देखा तो बस
चमड़ी बस चमड़ी,
उससे अंदर जाने की औकात नही
तुम्हारी,इसीलिए तो कभी
मजहब, जाति, विरादरी,लिंग,
इत्यादि पर पागल कुत्तों-से लड़ते रहते हो,
और कभी-कभी तो हद तब करते हो,
जब इन सब से आजिज आकर अकेले
में तुम्हारे-से कई लोग आत्महत्या तक करते हो!
और तुम खुद को सूट-बूट पहन कर बड़े
गर्व से पढ़ा लिखा समझदार कहते हो,
अरे तुम जाहिल हो,जाहिल हो!
औऱ जाहिलो की बस्ती में रहते हो!
तुम्हारे नगर में प्रेम! प्रेम के अतिरिक्त
सब,सब समझते हैं!

मैं सुनता रहा झील की बाते
बिल्कुल चुप होकर,शांत होकर,
फिर वही उसके गोद मे सर रखकर सो
गया,आंख भी सुख गयी थी,काश! की आंसू निकल जाते!

मैं जगा कुछ देर में तो कहा झील से मैंने भी
सत्य कहती हो तुम किन्तु पूर्ण नही,
हैं मेरी बस्ती में भी हैं कुछ लोग!
जो चमड़ी के अंदर भी देखते हैं!
उन्ही के कारण तो आज मानवता ज़िंदा है
और हम कुछ कम शर्मिंदा है!




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