संघर्ष और तुम्हारी ईप्सा!

ये जो भी हो रहा है,उल्टा-सीधा, अच्छा-बुरा, आड़ा-तिरछा, सुखदायक-दुःखदायक-शून्यायक...यही न है तुम्हारे सारे संघर्षों के मूल में।
हा-क्योंकि इसके ऊपर अभी तुममें से कदाचित मिलता है कोई,निःसंदेह उपरवर्णीत सारे कारण ही है समस्त संघर्षों के मूल में...इसी में तुम सब का डूबना-उतिराना मचा है...
उत्पात मचा हुआ है ९८% लोगों में...थोड़ा ज्यादा थोड़ा कम
लेकिन बात वही है!
और बस में तुम्हारे तुम्हारी सांस भी नही,फिर भी अहंकार इतना की.... हे राम!...या अल्लाह!....

अब बस इतना करो की छोड़ो चोंचलेबाजी, सूकून से बहो सरिता के धार में,और एक दिन फिर सागर में मिलो...
नही तो ये जो सिलसिला है न तुम्हारे अरमानों का एक दलदल है,फंसते ही जाओगे।
बाकी आप सब स्वतंत्र है!
धन्यवाद!

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