दुनिया के किनारे..३

उधर खारा सागर,
विशाल गहरा सागर,
इधर प्यारी सरिता
हमेशा बहती सरिता

झील मुझसे सम्वाद कर रही  थी!

तुम मेरे पास क्यों
आ जाते हो,रोज शाम को
और हाँ! आज तुम चुप ही रहना
तुम अजनबी जान पड़ते हो
लेकिन हो नही,मैं दुनिया के किनारे
हूँ इसलिए शायद तुम रोज आ जाते हो!

और तुम्हारी शांत छवि
बिलकुल बुद्धू-सी आज मैं तुम्हे
आलिंगन करने वाली हूँ इस एकांत निर्जन में
मुझे अर्पित करना है प्रेम तुम्हें
क्योंकि इस झील के हृदय में प्रेम उमड़ गया
एक प्रेम पथिक के निर्विकार भाव से!

झील बार-बार अपने कोमल आलिंगन में
मुझे प्यार से जकड़ रही थी,,,
मैं समय शून्य हो रहा था,इतना प्रेम पाकर
उस वक़्त भी हृदय से कृष्ण का ख्याल नही
छूटा! अचानक मैं फफक-फफक के
रोने लगा,अनायास ! झील थोड़ी घबराई
कहने लगी मेरे आलिंगन से आहत हो तुम!
क्षमा चाहती हूँ!

मैंने कहा अरे नही-री पगली,
ये फफककर रोना दरसल अहंकार का
बहना है तुम मुझे यूँही समेटे रहो!
अपने दामन में!
झील सहज थी,मेरे बालों में
बड़े स्नेह से उंगलियां फेर रही थी!

मैंने कहा की माँ की स्मृति हो
आयी,तुम्हारे प्रेम से!
और तत्क्षण
मेरी बहती आंखों
को झील अपने वक्षस्थल से लगा कर
बच्चे की तरह दुलारने लगी!
मैंने कहा उससे
मैं तुमसे कभी बन्धन में नही रहूँगा!
क्योंकि मैं पथिक हूँ!

उसने आलिंगन की पकड़
और तीव्र कर के मुझे समेट लिया!
........
मुझे मौन करके!


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