ईश्वर-अल्लाह!

मैं मंदिर में तभी जाऊं जब अपने अन्तस् की समस्त मैल धूल लूँ!
मैं पांच वक़्त की नमाज़ तभी करू जब मन मे कोई पाप शेष न रहे!
मैं धर्म के नाम पर तलवार तभी उठाऊं जब मेरे आस-पड़ोस में सब लोगों से एक जैसे सम्बन्द्ध हो,भाई,बहन,माँ, बाप,समाज प्रत्येक से बराबर प्रेम हो!
नही तो कचहरी-कचहरी भी खेलूं और धार्मिक भी रहूँ बात बेमानी है!
संसार की प्रत्येक वस्तु जीवित या अजीव सब का स्रोत एक है,फिर भी यदि तुम किसी समुदाय विशेष से घृणा रखते हो तो
तुम अज्ञानी हो!
और पाप समस्त कर्म अंधकार में है!।


Comments

Popular posts from this blog

परिचय!

समर्पित प्रेयसी!

आधुनिक अकड़!