ख़त..५

श्रद्धेया!
प्रेरिका!

कण-कण क्षण-क्षण आप चेतना में हैं,आपकी सांस भी मेरी नाभि में चलती है,आपके विचार भाव सभी संवेगों का संदेश मुझे एक अदृष्य श्रोत से प्राप्त है।
एवं मुझे इतना ज्ञात है कि कितनी उथल-पुथल मची हुई है आपकी चेतना में,मुझे बस अनुग्रह व्यक्त करना है।
एक विराट रूप,दिव्य चेतना आपकी छवि, मेरे जीवन के आध्यात्मिक पक्ष का प्रारंभ आपसे,मेरे नाम का महत्व आपके नाम से!
फ़िर भी मुझे आपसे कुछ नही चाहिए,
मुझे आपका पल्लवित धाराप्रवाह जीवन देखते रहना है
और एक दिन यहाँ से,इस धरा से विदा हो जाना है,
मेरा जाना होशपूर्वक होगा,मैं पूरे होश में तृण-तृण मृत्यु का साक्षी रहूँगा,आनन्दपूर्वक।
उस वक़्त भी आपके प्रति अनुग्रह होगा हृदय में,
दर्शन तो आपका अनुभूत कर लिया मैंने, आप मुझमे अखण्ड समाहित हैं।
और जैसे ही इस शरीर का बन्धन छूटेगा,मेरे सारे पापों का समापन हो जाएगा...मेरी चेतना आपके अस्तित्व के साथ समाहीत होकर इस फैलते या सिकुड़ते जगत के एक-एक कण में विस्तीर्ण हो जाएगी... जिसका पुनर्संगठन अत्यधिक मुश्किल होगा,हाँ हो सकता है यथेष्ट परिस्थिति मे।

आपको कोटिशः अनुग्रह बार-बार अनुग्रह...
आपके सफर का वो पीपल वृक्ष...
जिसकी छाँव और आपके रात्रिकालीन वास्तविक अस्तित्व की स्मृति मेरी चेतना के साथ शरीर के बांध के छूटते ही दूर-दूर बिखर जाएगी....
प्रत्येक वृक्ष वट वृक्ष, पाकड़ वृक्ष की मनोहरी स्मृतियां
मेरे महाभिनिष्क्रमण के साथ इस व्योममय अंतरिक्ष मे वितरित होकर साधकों के ऊपर बरसती रहेगी...
ये ऐसी बारिश होगी जो अनन्त रहेगी समय-सी जबतक समय रहेगा ये बारिश होती रहेगी...

आपको प्रणाम!
और यदि कोई कष्ट पहुंचा हो मुझसे कभी,
तो क्षमा मत करियेगा, अपितु प्रतिफल का वर दीजियेगा,
जिससे ये चेतना शापमुक्त हो सके!




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