संसार!
कोई कहे की फैल रहा है,
कोई कहता सिकुड़ रहा है,
बात दोनों एक-सी है
फैलाओ या सिकुड़ाओ!
चाहे फैले या फिर
सिकुड़े,होगा तो एक-
केन्द्र कही, वही केंद्र ही
अलग-अलग समझ औऱ
समुहों के द्वारा...
कभी कृष्ण, कभी राम
कभी जीसस कभी अल्लाह!
अलग-अलग है ये धाराएं
किन्तु केंद्र बस वही एक है!
अब ये तुमपर है कि तुम
शहर जलाओ या
फूलों से पाट दो,
गले लगाओ या
तलवार से काट दो....
तुम्हारी समझ,तुम्हारे संस्कार
जगत विस्तार
या नरसंहार....
जो चुन लो तुम स्वतन्त्र हो
वो केन्द्र एक ही है!
उसके चारो तरफ ये
समस्त ब्रह्मांड!
कोई कहता सिकुड़ रहा है,
बात दोनों एक-सी है
फैलाओ या सिकुड़ाओ!
चाहे फैले या फिर
सिकुड़े,होगा तो एक-
केन्द्र कही, वही केंद्र ही
अलग-अलग समझ औऱ
समुहों के द्वारा...
कभी कृष्ण, कभी राम
कभी जीसस कभी अल्लाह!
अलग-अलग है ये धाराएं
किन्तु केंद्र बस वही एक है!
अब ये तुमपर है कि तुम
शहर जलाओ या
फूलों से पाट दो,
गले लगाओ या
तलवार से काट दो....
तुम्हारी समझ,तुम्हारे संस्कार
जगत विस्तार
या नरसंहार....
जो चुन लो तुम स्वतन्त्र हो
वो केन्द्र एक ही है!
उसके चारो तरफ ये
समस्त ब्रह्मांड!
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