विरहिणी--आँखे!

वो आँखे खुली हैं,
कबसे शायद ज्यादा दिनों से,
ना!ना! वो किसी की,
प्रतीक्षा में नही खुली हैं!

वो एक ज़िंदा कशमकश में हैं,
कि खुद के अंदर देखूं या नहीं!
भय-भी है उनको कि कहीं
स्वयं पर दृष्टि पड़ जाने से!
फिर देखने की ईप्सा ही न बचे तो!

आखिर ये भी तो एक ईप्सा है,
लेकिन समझ से परे है बात,
कही मामला सूरदास-जैसा हो गया
तब, गड़बड़ हो जायेगा सबकुछ!

इसलिये ये कशमकश है उनको
और अमूमन सारी आंखों का यही हाल है!
इत्तफाक है ये कि इन आँखों का,
कोई मजहब नही,
कोई बिरादरी नही!
फिर भी न जाने किस के आस में
वो निहार रही एकटक!

जबकी सत्य है ये!
जिसकी आस है,वो तो
स्वयं में है,और उससे मिलने के लिए!
उन आँखों  को बड़े आहिस्ता-आहिस्ता
बन्द होना पड़ेगा!

उफ्फ! ये पहचान!
जन्म हुआ,दो क्षण में नाम
जाति, मजहब,राष्ट्रियता,
सब निर्धारित कर दिया गया
चंद लोगों द्वारा!

और तबसे यंत्रवत!
सब अपने-अपने झण्डे को
ऊंचा करने में लगे है!
और ये अप्राकृतिक तौर-तरीके
इतने हावी हैं!
की वो खुद की आँखों को
मूँदने में भी परहेज कर रहे है!

ख़ैर आँखे उनकी,
मर्जी नाथ की,
बन्द करे,या ऐसे ही,
एकटक देखते रहे!
सबकी अपनी-अपनी पहचान!

मानवीयता तो दूर है!
इस कृत्तिम व्यवस्था से परे!
उसतक पहुंचना है तो!
आँख बड़े प्रेम से मूँदनी होंगी!

जो सम्भव नही है!
असम्भव है! मुश्किल है!

Comments

Popular posts from this blog

परिचय!

समर्पित प्रेयसी!

आधुनिक अकड़!