साथी..१०

क्यों बेवजह तुम्हारे दोनों,
आंखों के मध्य देख-कर
बरबस मेरे नयन अश्रुपूरित होते
जाते है,क्यों कोई तो वजह होगी!

क्यों? अक्सर तुम्हारे आगोश में
मैं सिसकने लगता हूँ,
जैसे कोई बालक अपनी,
माँ से सिमट सिसके!

और जबकि मेरा और तुम्हारा
कोई बन्धन भी नही,,
क्या स्मृतियों का सागर उमड़ आता
है मुझमें,तुम्हारे सानिध्य! से

एक नही कई बार,
फफक फफक कर रोया हूँ
वजह,क्या है!
कहीं मुझे जाने के संकेत तो नही मिलते!
उस दुनिया मे जहाँ से कोई वापस नही आता!

हाँ यही बात है,
इन आँसुओ का बस इतना-सा मतलब है!
और फिर क्या ये विषाद है!
कत्तई नही,ये आँसू श्रद्धांजलि है
उस परमतत्व को जो तुम्हारे अन्तस् में बैठा है!
और तुम्हारी आँखों के मध्य से
मुझे माँ-जैसे देखता है!
दुलारता है! ....यही वजह है इन अश्रूओं का!


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