आदत-ए-इश्क़!

इश्क़ और आदत में फर्क है,
आदत कभी इश्क़ नही होती,
और इश्क़ कोई आदत नही!

आदत छूटती है मुश्किल से,
और इश्क़ तुम्हे छुड़ा दे हर मुश्किल से,
इसलिए आदत की मुश्किलें तमाम है,
रोग विभिन्न है!

बहुत पतली रेखा है,
इश्क़ और आदत में,
इसलिये बड़ा भ्रम भी है,
आशिकों और नशेड़ियों के जीवन में!

जब इश्क़ आदत बन जाए,
तो समझिए कि इश्क़ दूर चला गया,
और आदत तत्क्षण छूटती कहाँ है!
संसार के नशामुक्ति केंद्र कार्य कर रहे असफल-से!

इश्क़ इबादत है,
और आदत कुत्सित आदत है,
आदत गुनाह भी है,
क्योंकि ज्यादातर गुनाह आदत से ही होते है!

आदत आफत है,
इश्क़ दुआ है!
इश्क़ हमेशा मुक्त करता है,
जिससे मुक्तिबोध होता है,व्यक्ति!
आदत बन्धन है,जो माया है,भ्रम भी है!

इसलिये इश्क़ कभी-कभी
सदियों में किसी को होता है,
कोई मीरा,कोई जीसस कोई कबीर होता है!

और आदत तो आतंक है
अमूमन लोग आदत के ही बस में है!

इश्क़ और आदत में एक सम्बन्द्ध भी है,
जब हम आदतों से मुक्त होते है
तभी इश्क़ की अनुभूति होती है!

आदत बार-बार होती है
 और होती-ही रहती है यंत्रवत!
और इश्क़ सिर्फ और सिर्फ एक बार होता है,
जो संसार के सारे रोगों से एक पल में ही
मुक्त कर जाता है!

और इश्क़ तो इश्क़ है!
जो एक अनुपम निधि है!
सब कुछ त्यागने के बाद मिलता है!



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