सुर्ती औऱ प्रेम!
प्रेम और सुर्ती एक जैसे ही हैं!
एक की लगन और दूसरे की लत,
छूटती नही!.तिलिस्म..अनवरत...
एक से मुख में कर्क,
दूजे से सारा बेड़ा गर्क!.
प्रारंभ दोनों का नशीला,
कुछ वक्त बाद आदत की मार..
और छूटने के सारे उपाय!
दोनों समान है,
ज्यादतर लोग चोरी से,
दोनों से मिलकर...हल्के होते हैं!
दोनों के सेवक को एक-
ही डर, बदनामी का होता है!
मौत दोनों में शामिल होती हैं
लेकिन ये मोहब्बत है,
छूट पाना मुश्किल है!
हाँ नामुमकिन नही है!
असावधानी एक मे तो मुंह मे छाले,
दूसरे में हो तो हृदय-रोग लगा डाले!
दोनों भिक्षुक बनाते है!
दोनों का कोई मजहब,
और जाति नही होता है!
प्रेम बिल्कुल सुर्ती जैसा होता है!!!...
एक की लगन और दूसरे की लत,
छूटती नही!.तिलिस्म..अनवरत...
एक से मुख में कर्क,
दूजे से सारा बेड़ा गर्क!.
प्रारंभ दोनों का नशीला,
कुछ वक्त बाद आदत की मार..
और छूटने के सारे उपाय!
दोनों समान है,
ज्यादतर लोग चोरी से,
दोनों से मिलकर...हल्के होते हैं!
दोनों के सेवक को एक-
ही डर, बदनामी का होता है!
मौत दोनों में शामिल होती हैं
लेकिन ये मोहब्बत है,
छूट पाना मुश्किल है!
हाँ नामुमकिन नही है!
असावधानी एक मे तो मुंह मे छाले,
दूसरे में हो तो हृदय-रोग लगा डाले!
दोनों भिक्षुक बनाते है!
दोनों का कोई मजहब,
और जाति नही होता है!
प्रेम बिल्कुल सुर्ती जैसा होता है!!!...

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