विश्राम!
तुम्हारे आँचल की छाँव में
कितनी गहरी नींद में था,
आज तन्हाई की धूप में
मुझे मालूम हो रहा है!
अच्छा हुआ,मैं खुश हूँ
इस धूप से,तुम्हारी छाँव से,
कुछ सीलन ज्यादा हो गयी थी।।
बहुत दिन के बाद जब नींद
खुली हमारी, और उपर से ये
लहराती धूप,मुझे इज़ाज़त देती है..
कि फिर से मैं एक यायावर..
आज़ाद पंछी कि तरह पूरे विश्व मे
भ्रमण करूँ,न कोई अपना न पराया,
न कोई मुल्क,न मजहब..अल्हड़ आवारा,
न घर आने की जल्दी,
न जवाबदेही की जिम्मेदारी,
कि किससे मिले? क्यों मिले? कबतक मिले?
इन सारे थोक प्रश्नों से मुक्ति!
हाँ लेकिन हर बात का शुक्रिया
हर अदा की शुभासन्सा!
मेरे हृदय के किसी कोने में भी
तुम्हारे लिए न कोई शिकायत,
न जगह, दोनों नही है!
और इतनी गहरी नींद
कहा आती है आजकल की
कोई वर्षों मस्त मुद्रा में!
मलाई-मलाई ख्वाब ही ख्वाब देखे!
उस प्यारी शीतल छाँव के लिए,
इतने प्यारे एहसास के लिये तुम्हे शुक्रिया!
वरना हम जैसे की नसीब में ये बात कहाँ!
हर गली में मेरा एक"उपनाम" है
इतना यायावर हूँ, सब अपनी समझ
के अनुसार मुझे समझने में लगे है,
किन्तु मैं किसी को समझने में नही लगा हूँ!
नींद से जागा हूँ, नूतन मनोरम दुनिया देख रहा हूँ,
मन भी उजला है,
अपनी मस्ती में हूँ,
और कुछ हो चाहे न हो,
किन्तु इतना कहता हूं!
कि जब मृत्यु शैय्या पर मैं
अंतिम सांस ले रहा होऊंगा,
तो एक अद्भुत मुस्कान होगी मेरे
आभामंडल पर,किसी से भी रंचमात्र भी
कोई शिकायत ले के नही जाना है मुझे...
अल्हड़ हंसते हुए अनुभूति की दुनिया को
और,और, और प्रगाढ़ करके
आनंद से जाऊंगा! कि ले जाने वाले
यमदूत भी मस्ती में डूब जाये!
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