साथी..८
एक तरफ था एक आक्रामक,
एक तरफ थी प्रतिक्षणीनी..
सौम्य विरहिणी, जिसको मात्र थी एक...
शांत-सी आस...
और फिर आक्रमण प्रेम
में पिघलने लगा,आक्रमण भी
प्रतिक्रमण की ओर बदला,
कैसी तेरी अद्भुत छाँव!
प्यार भी आहिस्ते-आहिस्ते
गगनचुंबी होता गया...
साथ,धागे से वस्त्र हो गया
ऐसा वस्त्र, कभी दिखा नही था...
कैसा ये साथ? क्यों ये साथ?
कबतक ये साथ?
इन सबसे परे बस एक
प्रगाढ़ता, जो दिव्यता की
ओर ले जा रही है, नित-नित
नूतन ...मंगल-मंगल
सर्व मंगल...कहाँ से? कैसे
समझ से परे...लेकिन
एहसास असीम...
दूसरे जगत के वासी
है ये दो साथी...
बस साथ दे रहे एक दूसरे का..
सब कुछ ताक पे रख
के ताकना बन्द हो गया..
अंतर्दर्शन और एक नहाई हुई
दुनिया...पहले कभी किसी..
जन्म में देखा था ये स्वर्णिम संसर्ग!
आज एक आँख ऐसी मिली
जो माथे से देखती है
सारी तपिश शीलत हो चुकी
और साथी का साथ...
है निर्विरोध, निर्विकार
परम् गंग, और दुर्मति का कूप
क्षेणी और कामधेनु...
फिर ये सब एक रास्ता साथी
हम दोनों एक दूसरे में
पूर्ण हुए,,,अब..
मुकम्मल-ए-जहाँ की मंज़िल
अलग अलग दो रास्ते...
तुम भी अलग हम भी अलग
एक पूरब एक पश्चिम..
किन्तु फिर चक्र पूरा होते
ही हम दोनों के पुनः मिलने से
हम दोनों अदृश्य हो जायेंगे...
क्योंकि पृथ्वी गोल है! है न!
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