अमेठी-एक संघर्ष सत्यकथा!

बात ४ अक्टूबर २०११ की है,उस वक़्त मैं अमेठी नरेश राजा संजय सिंह(पूर्व केंद्रीय खेल मंत्री, वर्तमान राज्यसभा सदस्य असम) के कॉलेज राजर्षि रणंजय सिंह आसलदेव महाविद्यालय पीपरपुर अमेठी में स्नातक प्रथम वर्ष का विद्यार्थी था।
संजय सिंह जी की पहली पत्नी गरिमा सिंह पुत्री विश्वामित्र प्रताप सिंह(पूर्व प्रधानमंत्री) हैं जो वर्तमान में अमेठी की विधायक है भाजपा से।
संजय सिंह जी की दूसरी पत्नी है अमिता सिंह(पूर्व कैबिनेट मंत्री उत्तर प्रदेश ,राष्ट्रीय बैडमिंटन खिलाड़ी) उस वक़्त अमेठी की विद्यायक थी कांग्रेस से,संजय सिंह जी भी कांग्रेस से ही है।
उस वक़्त संजय सिंह जी लोकसभा सुल्तानपुर से सांसद थे कांग्रेस से।
४ अक्टूबर को महारानी अमिता सिंह का जन्मदिन राजकीय उत्सव के रूप में मनाया जा रहा था।चुकि अमिता सिंह जी मेरे कॉलेज की चेयरपर्सन थी।
अतः मेरे कॉलेज के कुछ चयनित छात्रों को भी अमेठी जाने का अवसर मिला,उनमे मैं भी एक था।
उस दिन नवरात्रि की अष्टमी थी।
हम लोग गए रणवीर रणंजय सिंह स्नातकोत्तर महाविद्यालय अमेठी के मैदान में हजारों लोगों का जनसैलाब महारानी के जन्मदिन के दिन पर उपस्थित था।
महारानी के उद्घोष की कुछ पंक्तियां
"अभी हाल ही में मैं लंदन से आयी, अपनी बेटी आकांक्षा सिंह का LLM में प्रवेश कराकर,मुझे अपार हर्ष हो रहा है कि अमेठी की एक बिटिया लंदन से शिक्षा हासिल कर रही है...।"
फिर संजय सिंह के उद्गोष का कुछ अंश
" मैं मुंबई से आया हूँ तुरन्त प्लेन से ,मुझे एक बात का अफसोस है कि किसी विकसित देश के शौचालय भी हमारी तरह होते है किन्तु वहाँ लोग उसे स्वच्छ रखते है और हमारे यहाँ वो अत्यधिक गन्दा रहता है...."
 फिर राजर्षि समूह के सभी कॉलेजों ने अपने-अपने सांस्कृतिक कार्यक्रमों को प्रस्तुत किया..

सब कुछ बहुत भव्य था
अंत मे मुझे भी मंच पर महारानी जी से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ..
मैंने उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं दी और प्रणाम किया
और उनसे कहा,
"महोदया, आज दुर्गाष्टमी है मैं आपको माँ का एक रूप समझ कर एक बात कहना चाहता हुँ।"
"कहिये बिलकुल।" उन्होने कहा
मैंने कहना प्रारम्भ किया
" महोदया मैं आपके ही जनपद में करीब ३०० से ज्यादा बच्चों का मुफ़्त निःस्वार्थ  अध्यापन करता हूँ,और आज ४ अक्टूबर है,उन्हे सरकारी पुस्तकें नही मिली! और आपको हर्ष हो रहा है अपनी बेटी के विदेशी शिक्षा से,मैं यदि आपके स्थान पर होता तो लज्जित होता!"
वो बिलकुल अवाक थी मेरे इस जवाब से किन्तु उन्होंने तत्क्षण मेरे गाल पर हाथ रखकर कर स्नेहवत पूछा,"आप कहाँ रहते हैं?"
मैंने कहा,"पीपरपुर थाने में।"
उन्होने मुझे पहले तो धन्यवाद किया मेरे कार्य के लिये और मुझे आस्वस्त किया कि किताबे एक हफ्ते के अंदर वितरित हो जाएंगी।
और उन्होने कहा
"मैं जब भी पीपरपुर आऊंगी आपसे जरूर मिलूंगी,आप बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं।"
फिर मैंने उन्हें आदर से प्रणाम किया और पुनः जन्मदिन की शुभकमाएं दी और विदा लिया।
मेरे समस्त सहपाठी बिलकुल सन्न थें मेरे इस व्यवहार से,किन्तु मेरे प्राचार्य आदरणीय डॉ. सत्यकाम आर्य ने मुझे सहज किया और मेरी प्रशंसा भी की।
शाम को हमसब कॉलेज की बस से कॉलेज आये।
और फिर मैं अपनी दिनचर्या में लग गया।
मैं रोज ५ बजे सुबह उठकर ६ से १० बजे तक बच्चो को पढ़ाकर कॉलेज जाया करता था। और शाम को ४ से ६ फिर सायंकालीन कक्षाओं में अद्यापन करता था।

खैर धन्यवाद योगेश्वर को! महारानी जी ने अपना काम किया एक सप्ताह के भीतर ही समस्त जनपद में पुस्तकें वितरित कर दी गयी।
बाद में २८ नवंबर को मेरे १८ वे जन्मदिन की रात्रि को ही मेरी तबियत भयंकर बिगड़ गयी और मैं इलाहाबाद मेडिकल कॉलेज में ८ दिन तक एडमिट रहा..और उसके बाद दिसम्बर में पिता जी का स्थानांतरण हो गया और हमलोग जगदीशपुर आ गए...पीपरपुर की दुनिया से बहुत दूर...
मैंने दूसरे कॉलेज में प्रवेश लिया
राजीव गांधी स्नातकोत्तर महाविद्यालय जगदीशपुर अमेठी..और वहाँ अस्वस्थ रहते हुए..अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की..

आज भी पीपरपुर के लोग मुझे बहुत याद आते हैं वो लोग मुझे बहुत स्नेह करते थे।
मेरी आँख नम हो जाती है वो ५ महीनों के सफर को याद कर के।



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