स्वर्णिम-भारत!

मैं देख पा रहा हूँ
आते हुए एक स्वर्ण पुंज को,
धीरे-धीरे छाते हुए मेरे
देश की अनुपम धरा को।

आने वाला वक़्त और,
अभी का भी मेरे भारत का है,
मैं देख सकता हूँ
भारत को खिलते हुए
विश्व पटल पर...

मैं देख रहा हूँ सदियों पुराने,
नालन्दा औऱ तक्षशिला के वक़्त
के भारत को आते हुए
और भी विशिष्ट कलेवर में!

मैं देख रहा हूँ कि
भारत नारी शक्ति का दिव्य
प्रतीक बन रहा है..
मैं देख पा रहा हूँ भारत के
महान पुरुषों के दिव्य आभामंडल को।

मैं मिल रहा हूँ मेरे देश की
अदभुत विशिष्ट सम्मिलित संस्कृति के
उत्कृष्ट स्वरूप के बीज को,
पारिजात के वृक्ष में परिवर्तित होते हुए।

आप मे से भी कुछ निःसन्देह देख रहे होंगे
भारत के उभरते नेतृत्व को,
मैं देख रहा हूँ भारत मे ईमान को
बढ़ते हुए,
मैं देख रहा हूँ भारत के वीरों को
विश्व की रक्षा,समवर्धना करते हुए।

मैं देख रहा हूँ कलुषित लोगों
के हृदय को रत्नाकर से कालिदास,
अंगुलिमाल से सन्त बनते हुए।

मैं देख रहा हूँ...
दृष्टि सब को मिलेगी,
कुछ को नही मिली है
उनको भी मिलेगी।

मैं देख सकता हूँ
भारत को विशाल होते हुए!
जो सर्व ज़िंदाबाद करेगा व रहेगा।


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