दुनिया के किनारे!

बैठा हूँ मैं यूँ ही
किनारे एक झील के
कोलाहल है जल में
कुछ ऐसा देखता हूँ,

फिर खुद से ही निकल,
के खुद को भी देखता हूँ
एक पथिक,
 भरा है प्रेम हृदय से
ऐसा देखता हूँ
नही शिकायत उसे किसी से
भरा मात्र अनुग्रह से!

फिर थोड़ा ऊपर उठ कर
इस धरा को देखता हूँ
हजारों-लाखों सीमाएं,
सीमाओं पे मरते मानव
मानवता से खेलते कुछ दानव

हर शहर के एक कोने में
वेश्यालय देखता हूँ
जिस्मों से बिकते-खेलते
कुछ मानव देखता हूँ

फिर दूर-दूर विचर के
सबको देख समझ के
खुदमे जो बैठा था,वजह
उससे पूछता हूँ
वो शांत स्मित से
बस मौन ही रहता,
बस मौन ही रहता!
हां! अब ये किनारा!
मेरा प्रिय मित्र है,
सानिध्य इसका मुझको
लगता पवित्र है!
निश्चय पवित्र है!

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