रात वाला बचपन!

पतला-सा चादर से,
तन को ढककर,छत पे!
चैत-ज्येष्ठ-असाढ़ की पूर्णिमा...
को निहारना,,

एक दो तीन चार...
ये वाला मेरा,वो वाला तेरा,
तारों से भी सम्बन्द्ध जोड़ लेना मेरा,
और ऊंची तान का गान!

थोड़ी-सी मच्छर की भनभनाहट!
सियारों का सामुहिक क्रन्दन,
कुत्तों की चौंचाहट!
और झींगुर का कुकुआओ!

आसमान और गांव की वो छत!
शक्तिमान के रविवासरीय एपिसोड!
और फिर बाल सभा की चर्चाएं!
माई, बड़की माई के किस्से!

और फिर वो खूंखार झगड़े,
चार-पांच दिन बाद फिर सुलह!
न जाति न मजहब!
बस प्यारा-सा बचपन!

बरसीन की कटाई
चारे की बलाई!

बैलों से वो प्यारे सम्बंध,
हेंगा वाला खेत,
बैल-गाड़ी की सवारी,
गायों की चराई!

नदियों की नहाई!
ओह्ह रे! वो दिन!
तुम बड़े हसीन थे!
हमारे बड़े नसीब थें!


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