दुनिया के किनारे!...४

मज़हबी-जटिल जातीयता के
दुनिया से, तुम आये प्रिय!
मैं तुम्हारी राह देख रही थी,,
क्योंकि आज तुम्हारे समस्त पाप,
कुंठा और कोफ़्त मुक्त हो जाएंगे...
मेरे प्रेम से...

झील की निर्विकार बातें मैं!
सुने जा रहा था,...

आज मैं तुम्हे स्नान कराऊंगी,
अपने सानिध्य में,
झील ने दिव्य-जल एवं दिव्य गन्ध युक्त..
लेपों से मेरा स्नान प्रारम्भ कर दिया...

झरनों से जल बरस भी रहा था,
झील के कोमल हस्त मेरे शरीर,
से आत्मतत्व तक प्रत्येक स्थान
पर दस्तखत कर रहे थे...

मुझे बिल्कुल शांत देखकर,
झील अपना प्यारा चुम्बन मुझे
अर्पित करती जा रही थी...
और मेरे मय को मैं इस स्नान से धुलते महसूस कर रहा था..

अप्रतीम स्नान,अप्रतीम स्नेह..
मैं बिल्कुल विरोध-रहित था..
स्नान में प्रेम,स्नान में विरह,,
स्नान में पाप,क्षोभ सर्वविकार..
धूल रहे थे..बोझिल चैतन्य मुक्त हो रहा था..

झील कह रही थी
"मेरा तुमसे कोई बन्धन नही,
हा सम्बन्ध है,मैं प्रकृति हूँ और तुम पुरुष हो,
मैं अपने कर्तव्यों का वहन कर रही हूं
आज इस स्नान के बाद तुम संसार
के प्रत्येक कण के साथ सम्यक सम्बन्द्ध
स्थापित करोगे..
औऱ प्रत्येक को प्रेमपूर्वक मिल सकोगे..
समता का वास्तविक भाव भर रही हूँ
मेरे अनमोल पुरूष! अब तुम स्वयं में अधिस्थित रहोगे,
प्रत्येक वार को क्षमा करते रहोगे,
त्रिगुणमयी माया में रंगमंचीय अभिनय करते हुए
भी तुम गुणातीत रहोगे...
तुम बहुत कष्टों को पार कर
आये हो...अब तुम्हारे अंदर महामौन
उद्भवित हो चुका है,,
जाओ प्रिय अब तुम पूर्ण हुए..
और तुम्हारा व्यवहार सबको
पूर्ण करता जाएगा...
अब तुम विरह के पार आ चुके..
सम्मिलित हो गया सर्वस्व तुम्हारा
प्रकृति में,,
अब तुम याचक नही हो..
मैं अनुग्रह व्यक्त करूंगी प्रत्येक का
जिसने तुम्हे दुनिया के किनारे मुझतक भेजा!।"

मैं प्रशांत था
स्नान होने के बाद
झील ने अपने दूत एक काली
चिड़िया को भेजा,मुझे सकुशल
पहुंचाने को...

नमन-नमन परमात्म-नमन!
हे! नाथ नमन! हे! नाथ नमन!.






Comments

Popular posts from this blog

परिचय!

समर्पित प्रेयसी!

आधुनिक अकड़!