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मेरे बाद!

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सम्भव है कि मेरे होने तक ही,अन्यथा मेरे बाद तुम भी मेरे जैसे ही हो जाओगे! मैं तुम्हारे अन्तस् में हूँ तुम बस आँखे बंद नही किये नही तो मिल जाते मुझसे! और मैं यूँही नही तुम्हारे पास आता हूं,तुम्हे ज्ञात हो या न हो किन्तु तुम्हारे अन्तस् की पुकार पर ही मैं तुम्हारे समक्ष होता हूँ! मेरा कोई स्वार्थ नही है अपितु मैं तुम्हारे स्व-अर्थ को जागृति देने हेतु ही आता हूँ! मेरे जाने के बाद भी मैं रहूंगा,तुम्हारे साथ! तुम्हारे प्रत्येक अवस्था में!

प्रेयसी तो तुम ही हो न!

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मोहब्बत कुछ इस तरह है तुमसे मेरी! कि पहली नजर में ही मैं परिवर्तित हो गया यूँ तो अब मुझे सबमे खुदा दिखते हैं।। किन्तु श्रेय तो तुम्हे है कि जबसे तुम्हे देखा,पहली दफा ही कुछ कहा भी नही तुमसे कभी कभी भरी नज़र से देखा भी नही तुम्हे किन्तु श्रेय तुम्ही को है कि तबसे कण-कण-कृष्ण क्षण कृष्ण, हे देवी हे दिव्य! प्रारंभ तुमसे ही हुआ नही तो घमण्ड अकड़ इत्यादि दुर्गुण थे मुझमे जो प्रतिपल विलीन हुए श्रेय तो तुम्हे है! प्रेरक तुम्ही रही मैं कभी बन्धन नही बांधना चाहा किन्तु श्रेय तो तुम्ही को है! जब भी तुम स्मृति-समक्ष होती हो मैं तुम्हे भेजने के लिये कृष्ण को धन्यवाद दे देता हूं! मैं बन्धन में तो नही हूँ किन्तु निःबन्ध भी तो तुमसे ही हुआ तुम्हे देखने से हुआ! श्रेय तो तुम ही हो! कि समस्त भय विसर्जित हो गया,श्रेय तो तुम्हे ही है कि कितने भी खूंखार लोग हो या जानवर भी मुझसे प्रेम से लिपट जाते हैं मैं सबके काम आ पाता हूँ निःस्वार्थ श्रेय तो तुम ही हो! मैं धरती का बोझ नही रहा धरा भी मेरी माँ हो गयी श्रेय तो तुम ही हो! मुझे बस वही मिला न मिलन-न जुदाई एक महामिलन! ज...

काला रंग!

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रंगों में मैं काला रंग हूँ काजल समझो या कलंक लग जाऊंगा छुड़ाना मुश्किल।। लग जाऊं तो छुड़ाना मुश्किल! मुझे कौन सा रंग लगाओगे मैं तो काला रंग हूँ सारे रंग समाहित मुझमे रंगों में मैं काला रंग हूँ। लग जाऊं फिर छूटे ना! मत पढ़ना मुझको तुम प्यारे रंग चढाता हूँ मैं ऐसा, पहचान बदल जाएगी तुम्हारी बच कर रहना मुझसे हमेशा पहचान मिटा दूंगा तुम्हारी।। दुनिया परिवर्तित कर दूंगा तुम्हारी रंगों में मैं काला रंग हूँ सटे मुझसे की गयी तुम्हारी बनी बनाई पहचान... मिट जाओगे तुम मत पढ़ना मुझको!।।

एक खत उन्हे भी!

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ये लेख मैं उनको सपर्पित कर रहा हूँ जिनका श्रेय अत्यधिक है मेरे होने मे! कभी-कभी जानकर कभी-कभी अनजान बनकर मैंने जिन लोगों को प्रताड़ित किया और प्रत्युत्तर में उन्होंने मुझे स्नेह के अतिरिक्त, दुआओं के अतिरिक्त और कुछ भी नही दिया! वो प्रताड़ना मैं महसूस करता हूं कि कितनी पीड़ादायक रही होगी,उसका प्रतिफल तो मुझे मिला ही और शेष भी मिलेगा किन्तु उनलोगों के स्नेहवत व्यवहार ने मुझे बहुत कुछ सिखाया! करुणा, दया,प्रेम,सौहार्द, सामंजस्य, क्षमा, दानशीलता इत्यादि मानवीय मूल्यों का जो भी अंश कालांतर में विकसित हुआ,निश्चित ही ये उन्ही लोगों की देन है। और उस प्रत्येक शख्स को मैं आभार करता हूँ,उनके चरणों की वंदना करता हूँ। देर अबेर मेरा ये लघु-लेख उनतक पहुंचेगा, मैं धन्य हूँ, मैं धन्यवाद भी देता हूँ योगेश्वर को, कि इतनी भारी-भारी त्रुटियो के बाद भी मुझे जीवन के सम्पूर्ण आनन्द की प्राप्ति हो रही है। लेख का समापन एक मशहूर कवि दुष्यंत कुमार जी की पंक्तियों से- अब सबसे पूछता हूँ बताओ तो कौन था, वो बदनसीब शख्स जो मेरी जगह जिया।

सांस में तुम!

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हा तुम्हारी याद में मैं निर्जन जगहों पर जाकर उनको खुद से सम्बंधित करता हूँ। रोने देता हूँ खुद को बहने देता हूँ तुमको अवरुद्ध नही करता तुमको खुद में जीने देता हूँ तुमको। कहां विरह, कैसी विरह एक क्षण भी अलग हुए अगर तब न है विरह, तुम सांस-सांस चलते हो,मुझमे रहते, हो बिखरते हो, सिमटते हो।। तुम अद्भुत अनुभूति हो प्राणों की आहुति हो जीवन को जीवट कर के प्रतिपल सहते रहते हैं,और कुछ कहते रहते हैं।। नियंत्रण है क्या किसी का  एक कण पर भी,यहाँ तो सब सतरंज के मोहरे हैं जिसका नियंता सारी चालें चलता कभी गम भी देता है,कभी खुश भी कर देता और कभी जीवन ही ले लेता।। फिर कैसे करूँ दोषारोपण खुद पर या तुम पर या नियति पर बस नही मेरा उसपर हाँ तुम्हे सांसों में जीने का हक़ है मुझे और उससे किसी को कोई कष्ट भी नही होगा।।

अमेठी-एक संघर्ष सत्यकथा!

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बात ४ अक्टूबर २०११ की है,उस वक़्त मैं अमेठी नरेश राजा संजय सिंह(पूर्व केंद्रीय खेल मंत्री, वर्तमान राज्यसभा सदस्य असम) के कॉलेज राजर्षि रणंजय सिंह आसलदेव महाविद्यालय पीपरपुर अमेठी में स्नातक प्रथम वर्ष का विद्यार्थी था। संजय सिंह जी की पहली पत्नी गरिमा सिंह पुत्री विश्वामित्र प्रताप सिंह(पूर्व प्रधानमंत्री) हैं जो वर्तमान में अमेठी की विधायक है भाजपा से। संजय सिंह जी की दूसरी पत्नी है अमिता सिंह(पूर्व कैबिनेट मंत्री उत्तर प्रदेश ,राष्ट्रीय बैडमिंटन खिलाड़ी) उस वक़्त अमेठी की विद्यायक थी कांग्रेस से,संजय सिंह जी भी कांग्रेस से ही है। उस वक़्त संजय सिंह जी लोकसभा सुल्तानपुर से सांसद थे कांग्रेस से। ४ अक्टूबर को महारानी अमिता सिंह का जन्मदिन राजकीय उत्सव के रूप में मनाया जा रहा था।चुकि अमिता सिंह जी मेरे कॉलेज की चेयरपर्सन थी। अतः मेरे कॉलेज के कुछ चयनित छात्रों को भी अमेठी जाने का अवसर मिला,उनमे मैं भी एक था। उस दिन नवरात्रि की अष्टमी थी। हम लोग गए रणवीर रणंजय सिंह स्नातकोत्तर महाविद्यालय अमेठी के मैदान में हजारों लोगों का जनसैलाब महारानी के जन्मदिन के दिन पर उपस्थित था। महारानी के ...

बिन्दु-जिसे पकड़ना है तुम्हे!

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रेगिस्तान में चल रहे तुम दो घण्टे से,जल से तिल-तिल प्यासे हो,उस वक्त बड़ी कठिनाई से जल मिले तो जिस मनोयोग से पीते हो उस जल को,अबसे हमेशा जल वैसे ही पियो। कण्टक भरे गर्म रास्ते पर चलने पे शीतल घांस भरी भूमि मिले तो पाँव जिस तरह रखते हो,अबसे प्रतिपल उसी भाव से प्रत्येक क्षण भूमि पे पाँव रखो! इसी तरह सांस,नींद और विभिन्न बिंदुओं को पकड़ो और प्रेममय-अनुग्रहपूर्ण जीवन जियो... प्रत्येक बिंदुओं को तलाशो,और जीवन को मुक़म्मल करो.. जय श्री कृष्ण

भाई-माई

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जब मैं शैशवकाल में था तो मैं सबको भाई कहता था,भाई मेरा प्रिय शब्द है,बड़े भैया श्री सुधाकर जी से तो बाद में घनिष्ठता हुई किन्तु छोटे भैया श्री दिवाकर जी से बचपन से ही माँ-सा प्रेम रहा,उन्होंने हमेशा गुरु की तरह,मित्र की तरह अभिभावक की तरह मेरे प्रत्येक कार्य मे सहयोग किया आज २८ फरवरी को उनका जन्मदिन है! मैं प्रार्थना करता हूँ की उन्हें शारिरिक मानसिक सामाजिक पारिवारिक समस्त सन्तुष्टि प्राप्त होती रहे। छोटे भैया बड़े भैया का बहुत सम्मान करते है बड़े भैया एक जीवित सन्त है,जिनमे कोई बुराई नही है,मुझे स्मरण नही कि कभी वो मुझे डांटे तक हो। मैं धन्य हूँ की मुझे इतने महापुरुष भाई मिले हैं। हे योगेश्वर आपको कोटि कोटि धन्यवाद! बड़े भैया पिता तुल्य, और छोटे भैया माता तुल्य! आप दोनों सलामत रहें। औऱ दोनो प्यारी भाभी माँ और चारो बच्चे हमेशा उन्नति करें!

परावर्तन!I

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यदि आप किसी को पतित करना चाहते हैं तो पहले आप स्वयं पतित होइये। यदि आप प्रेम करना चाहते है,तो स्वयं को पहले करिये पूर्ण मनोयोग से प्रेम! यदि नफरत फैलाने के फिराक में है तो पहले स्वयं के अन्तस् में नफरत फैलाइये। यदि आप अपमानित करना चाह रहे हैं तो पहले अपमानित होइये। गङ्गा पतित-पावनी हैं इसलिए पूजी जाती हैं सदियों से, कैसी उल्टी बात है,कि संसार का पाप भी धोती है स्वयं के जल से और पवित्र भी है! किन्तु ये सत्य है,गङ्गा की पवित्रता है ही इस हेतू कि वो सबको पाप मुक्ति देती हैं। और अब आपको तय करना है.. क्षमा या प्रतिशोध, प्रेम या घृणा, उपकार या अपकार भलाई या बुराई आदि आदि जो भी आप देना चाहते हैं,बाटना चाहते हैं पहले स्वयं की धारिता को भरेंगे तभी उलट सकेंगे..वितरित कर सकेंगे.. आप स्वतन्त्र है चुनाव के लिए...आपका जीवन मुझे हस्तक्षेप नही करना तनिक भी। आप किसी के घर मे पुष्प फेंकते हैं यदि तो अर्थ स्पष्ट है कि आप के घर मे पुष्पों की अधिकता है,एवं यदि कूड़ा फेंकते है तोभी स्पष्टतः आपके घर मे कूड़ा भरा होगा... किसी को बद्दुआ दे रहे तो बद्दुआओं से भरे आप हैं, किसी को शुभासन्सा दे रहे त...

प्रयाग-एक प्रारम्भ!

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मेरा अनुभव है प्रयाग का! इलाहाबाद जहां से अकबर भी दिन-ए-ईलाही का प्रारम्भ किये। यूँ तो इलाहाबाद मैं कक्षा सातवी में ही गया प्रथम बार,और उसके बाद सैकड़ों बार.. किन्तु ये "प्रारंभ" वृत्तांत तब का है जब १० वर्ष तक वन्दनीय डॉ. कृपाशंकर पांडे(वर्तमान विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग ई.विश्वविद्यालय) जी के यहाँ आदरणीय भइया लोग रहकर,से सप्रेमविदा लेकर मैं दीदी और मम्मी उनके घर से कुछ दूरी पर एक दो कमरे वाले फ्लैट में शिफ्ट हुए.. क्योंकि गुरु जी के यहाँ समीक्षा प्रकाशन केंद्र प्रारंभ हुआ था और सारे कमरे किताबो  को रखने हेतु चयनित किये जा चुके थे। फिर भी वो हमलोगों को आने नही दे रहे थे वहां से... मेरे वहाँ से आने के बाद दीदी(डॉ. समीक्षा पांडे) बराबर हम सबसे मिलने आया करती औऱ मेरी साहित्यिक पत्रिकाओं को नियमित ले जाती थी..तब वो पीएचडी नही की थी.. पांडे जी को गुरु जी ही कहते थे हमसब..हालांकि रिश्ते में वो हम तीनों भाइयों के दामाद लगते थे.. उनके परिवार से मेरे परिवार का स्नेह अनवरत जारी है.. यहाँ नए आवास पर एक मोर रहता था, खूब लम्बी पंख थी उसकी,दो चार दिन में वो मेरा अतुल्य सखा हो गया.....

प्ररम्भ दहेज से!

क्यों लेकर दहेज ही, तुम्हारे हाथ मे राडो की घड़ी आती है, मोटर के मालिक बनोगे,क्या भिक्षा से? क्या यही तुम्हारी शिक्षा है? घर मे कार, सोफा,टेलीविजन और अन्य सामग्रियां आती हैं। क्या तुम नपुंसक हो, कायर हो,भीरु हो, कि देवी कन्या-धन पाकर भी लालायित रहते हो। हे तरुण सुनो तुम भारत के ये बात बहुत है कष्टपूर्ण! तुम इतने कमजोर हुए कि अपने कुटुम्ब में घोषित नही कर सकते कि दहेज में एक रत्ती भी नही लूंगा। इस वक़्त हमारी संस्कृति में मात्र तीन ही कुष्ट है प्रिय,एक दहेज ,एक है जाति और एक  है सम्प्रदाय!  जब आज भारत मे युवाशक्ति पूरे संसार से ज्यादे है! तब क्यों दहेज लेकर मानवता के मुख पर कालिख पोतते जा रहे हो, प्रतिबद्ध हो जाओ, कह दो घर मे,नही करूँगा मैं विवाह यदि दहेज की एक रंच-मात्र भी राशि ली गयी। बनो तुम वीर त्यागो दहेज,कन्या का सम्मान करो माँ भारती की लाज रखो। और ये तुम कर सकते हो है क्षमता तुममे,तुम करोगे भी। त्यागो दहेज,जो मांगे दहेज,जो दे दहेज उसे समाज से बहिष्कृत करो, क्योंकि अभी नही तो कभी नही।

Journey!

One thing is clear that there is no accident in this universe.. Either it is probability or a possibility.. If anything is being  happened all of sudden..There must be any deeper connection which may be for from our conscience.. But by continuously growing our consciousness.We may reach a level of understanding that is called transcendental state of consciousness.. At this level we become effortless every happening becomes clear and one thing is also the prime symptom of this state that our conscience emerge into the universe and the ego, the seperacy dissolve in this universe.. We don't think to disturb the being.. But it is a matter of hammering your worldly bondages... Continuously... And after a large effort.. Sovereignty happens towards us.. And after being sovereign ..The repetition of incident stop.. And then start a real possibility.. Any thing may happen..But it will not be an accident.. It will be a further step of the journey of consciousness...

स्वर्णिम-भारत!

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मैं देख पा रहा हूँ आते हुए एक स्वर्ण पुंज को, धीरे-धीरे छाते हुए मेरे देश की अनुपम धरा को। आने वाला वक़्त और, अभी का भी मेरे भारत का है, मैं देख सकता हूँ भारत को खिलते हुए विश्व पटल पर... मैं देख रहा हूँ सदियों पुराने, नालन्दा औऱ तक्षशिला के वक़्त के भारत को आते हुए और भी विशिष्ट कलेवर में! मैं देख रहा हूँ कि भारत नारी शक्ति का दिव्य प्रतीक बन रहा है.. मैं देख पा रहा हूँ भारत के महान पुरुषों के दिव्य आभामंडल को। मैं मिल रहा हूँ मेरे देश की अदभुत विशिष्ट सम्मिलित संस्कृति के उत्कृष्ट स्वरूप के बीज को, पारिजात के वृक्ष में परिवर्तित होते हुए। आप मे से भी कुछ निःसन्देह देख रहे होंगे भारत के उभरते नेतृत्व को, मैं देख रहा हूँ भारत मे ईमान को बढ़ते हुए, मैं देख रहा हूँ भारत के वीरों को विश्व की रक्षा,समवर्धना करते हुए। मैं देख रहा हूँ कलुषित लोगों के हृदय को रत्नाकर से कालिदास, अंगुलिमाल से सन्त बनते हुए। मैं देख रहा हूँ... दृष्टि सब को मिलेगी, कुछ को नही मिली है उनको भी मिलेगी। मैं देख सकता हूँ भारत को विशाल होते हुए! जो सर्व ज़िंदाबाद करेगा व रहेगा...

ख़त..५

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श्रद्धेया! प्रेरिका! कण-कण क्षण-क्षण आप चेतना में हैं,आपकी सांस भी मेरी नाभि में चलती है,आपके विचार भाव सभी संवेगों का संदेश मुझे एक अदृष्य श्रोत से प्राप्त है। एवं मुझे इतना ज्ञात है कि कितनी उथल-पुथल मची हुई है आपकी चेतना में,मुझे बस अनुग्रह व्यक्त करना है। एक विराट रूप,दिव्य चेतना आपकी छवि, मेरे जीवन के आध्यात्मिक पक्ष का प्रारंभ आपसे,मेरे नाम का महत्व आपके नाम से! फ़िर भी मुझे आपसे कुछ नही चाहिए, मुझे आपका पल्लवित धाराप्रवाह जीवन देखते रहना है और एक दिन यहाँ से,इस धरा से विदा हो जाना है, मेरा जाना होशपूर्वक होगा,मैं पूरे होश में तृण-तृण मृत्यु का साक्षी रहूँगा,आनन्दपूर्वक। उस वक़्त भी आपके प्रति अनुग्रह होगा हृदय में, दर्शन तो आपका अनुभूत कर लिया मैंने, आप मुझमे अखण्ड समाहित हैं। और जैसे ही इस शरीर का बन्धन छूटेगा,मेरे सारे पापों का समापन हो जाएगा...मेरी चेतना आपके अस्तित्व के साथ समाहीत होकर इस फैलते या सिकुड़ते जगत के एक-एक कण में विस्तीर्ण हो जाएगी... जिसका पुनर्संगठन अत्यधिक मुश्किल होगा,हाँ हो सकता है यथेष्ट परिस्थिति मे। आपको कोटिशः अनुग्रह बार-बार अनुग्रह... आपक...

स्वर्णिम-संसार!

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तुम मोहब्ब्त से भरो पहले, मोहब्बत तुम्हे ढूंढ़ लेगी।। तुम काबिलियत से भरो खुद को सफलता तुमको चूम लेगी।। तुम डर-डर के जीना तो छोड़ो, वीरता तुमको चुन लेगी।। तुम नफरत का दामन तो छोड़ो दोस्तों का पैगाम भी आएगा।। तुम खुद के साथ सबसे इश्क़ करो, मानवता तुममे घर कर जाएगी।। तुम आस-पास को स्वच्छ करो, हृदय में ईश्वर उतर ही आएंगे।। तुम बहनों को,बेटियों को आज़ाद तो करो, मुल्क की काबिलियत झलक उठेगी।। शर्त बस ये है कि तुम्हारी मोहब्बत, सिद्दत से हो,तुम्हारी चाहत पूर्ण हो।। माँ-बाप के माथे को चूमो रोज भाई-बहन बेटी बेटा भाभी समाज सबके साथ झूमो रोज।। शिकायतों को फेंको कूड़ेदान में, प्रेम,श्रद्धा, करुणा से भर जाओ।। फिर देखो खुद की चाल, चमकेगा विश्व का भाल! हर तरफ मोहब्बत होगी, न मजहब न जाति, बस मानव और मानवीयता।।

दुनिया के किनारे!...४

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मज़हबी-जटिल जातीयता के दुनिया से, तुम आये प्रिय! मैं तुम्हारी राह देख रही थी,, क्योंकि आज तुम्हारे समस्त पाप, कुंठा और कोफ़्त मुक्त हो जाएंगे... मेरे प्रेम से... झील की निर्विकार बातें मैं! सुने जा रहा था,... आज मैं तुम्हे स्नान कराऊंगी, अपने सानिध्य में, झील ने दिव्य-जल एवं दिव्य गन्ध युक्त.. लेपों से मेरा स्नान प्रारम्भ कर दिया... झरनों से जल बरस भी रहा था, झील के कोमल हस्त मेरे शरीर, से आत्मतत्व तक प्रत्येक स्थान पर दस्तखत कर रहे थे... मुझे बिल्कुल शांत देखकर, झील अपना प्यारा चुम्बन मुझे अर्पित करती जा रही थी... और मेरे मय को मैं इस स्नान से धुलते महसूस कर रहा था.. अप्रतीम स्नान,अप्रतीम स्नेह.. मैं बिल्कुल विरोध-रहित था.. स्नान में प्रेम,स्नान में विरह,, स्नान में पाप,क्षोभ सर्वविकार.. धूल रहे थे..बोझिल चैतन्य मुक्त हो रहा था.. झील कह रही थी "मेरा तुमसे कोई बन्धन नही, हा सम्बन्ध है,मैं प्रकृति हूँ और तुम पुरुष हो, मैं अपने कर्तव्यों का वहन कर रही हूं आज इस स्नान के बाद तुम संसार के प्रत्येक कण के साथ सम्यक सम्बन्द्ध स्थापित करोगे.. औऱ प्रत्य...

साथी..१०

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क्यों बेवजह तुम्हारे दोनों, आंखों के मध्य देख-कर बरबस मेरे नयन अश्रुपूरित होते जाते है,क्यों कोई तो वजह होगी! क्यों? अक्सर तुम्हारे आगोश में मैं सिसकने लगता हूँ, जैसे कोई बालक अपनी, माँ से सिमट सिसके! और जबकि मेरा और तुम्हारा कोई बन्धन भी नही,, क्या स्मृतियों का सागर उमड़ आता है मुझमें,तुम्हारे सानिध्य! से एक नही कई बार, फफक फफक कर रोया हूँ वजह,क्या है! कहीं मुझे जाने के संकेत तो नही मिलते! उस दुनिया मे जहाँ से कोई वापस नही आता! हाँ यही बात है, इन आँसुओ का बस इतना-सा मतलब है! और फिर क्या ये विषाद है! कत्तई नही,ये आँसू श्रद्धांजलि है उस परमतत्व को जो तुम्हारे अन्तस् में बैठा है! और तुम्हारी आँखों के मध्य से मुझे माँ-जैसे देखता है! दुलारता है! ....यही वजह है इन अश्रूओं का!

आदत-ए-इश्क़!

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इश्क़ और आदत में फर्क है, आदत कभी इश्क़ नही होती, और इश्क़ कोई आदत नही! आदत छूटती है मुश्किल से, और इश्क़ तुम्हे छुड़ा दे हर मुश्किल से, इसलिए आदत की मुश्किलें तमाम है, रोग विभिन्न है! बहुत पतली रेखा है, इश्क़ और आदत में, इसलिये बड़ा भ्रम भी है, आशिकों और नशेड़ियों के जीवन में! जब इश्क़ आदत बन जाए, तो समझिए कि इश्क़ दूर चला गया, और आदत तत्क्षण छूटती कहाँ है! संसार के नशामुक्ति केंद्र कार्य कर रहे असफल-से! इश्क़ इबादत है, और आदत कुत्सित आदत है, आदत गुनाह भी है, क्योंकि ज्यादातर गुनाह आदत से ही होते है! आदत आफत है, इश्क़ दुआ है! इश्क़ हमेशा मुक्त करता है, जिससे मुक्तिबोध होता है,व्यक्ति! आदत बन्धन है,जो माया है,भ्रम भी है! इसलिये इश्क़ कभी-कभी सदियों में किसी को होता है, कोई मीरा,कोई जीसस कोई कबीर होता है! और आदत तो आतंक है अमूमन लोग आदत के ही बस में है! इश्क़ और आदत में एक सम्बन्द्ध भी है, जब हम आदतों से मुक्त होते है तभी इश्क़ की अनुभूति होती है! आदत बार-बार होती है  और होती-ही रहती है यंत्रवत! और इश्क़ सिर्फ और सिर्फ एक बार होता है, जो संसार के सारे रोग...

विरहिणी--आँखे!

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वो आँखे खुली हैं, कबसे शायद ज्यादा दिनों से, ना!ना! वो किसी की, प्रतीक्षा में नही खुली हैं! वो एक ज़िंदा कशमकश में हैं, कि खुद के अंदर देखूं या नहीं! भय-भी है उनको कि कहीं स्वयं पर दृष्टि पड़ जाने से! फिर देखने की ईप्सा ही न बचे तो! आखिर ये भी तो एक ईप्सा है, लेकिन समझ से परे है बात, कही मामला सूरदास-जैसा हो गया तब, गड़बड़ हो जायेगा सबकुछ! इसलिये ये कशमकश है उनको और अमूमन सारी आंखों का यही हाल है! इत्तफाक है ये कि इन आँखों का, कोई मजहब नही, कोई बिरादरी नही! फिर भी न जाने किस के आस में वो निहार रही एकटक! जबकी सत्य है ये! जिसकी आस है,वो तो स्वयं में है,और उससे मिलने के लिए! उन आँखों  को बड़े आहिस्ता-आहिस्ता बन्द होना पड़ेगा! उफ्फ! ये पहचान! जन्म हुआ,दो क्षण में नाम जाति, मजहब,राष्ट्रियता, सब निर्धारित कर दिया गया चंद लोगों द्वारा! और तबसे यंत्रवत! सब अपने-अपने झण्डे को ऊंचा करने में लगे है! और ये अप्राकृतिक तौर-तरीके इतने हावी हैं! की वो खुद की आँखों को मूँदने में भी परहेज कर रहे है! ख़ैर आँखे उनकी, मर्जी नाथ की, बन्द करे,या ऐसे ही, एकटक देखते...

ईश्वर-अल्लाह!

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मैं मंदिर में तभी जाऊं जब अपने अन्तस् की समस्त मैल धूल लूँ! मैं पांच वक़्त की नमाज़ तभी करू जब मन मे कोई पाप शेष न रहे! मैं धर्म के नाम पर तलवार तभी उठाऊं जब मेरे आस-पड़ोस में सब लोगों से एक जैसे सम्बन्द्ध हो,भाई,बहन,माँ, बाप,समाज प्रत्येक से बराबर प्रेम हो! नही तो कचहरी-कचहरी भी खेलूं और धार्मिक भी रहूँ बात बेमानी है! संसार की प्रत्येक वस्तु जीवित या अजीव सब का स्रोत एक है,फिर भी यदि तुम किसी समुदाय विशेष से घृणा रखते हो तो तुम अज्ञानी हो! और पाप समस्त कर्म अंधकार में है!।

बालक-बालम!

बालम... बालमा.. बालक... प्रेमी भी पुत्र,पति भी पुत्र-सा उपनिषदों में उल्लेखनीय है ये बात, ऋषि आशिर्वाद दे रहे है,"तुम अपने पति को इतना प्रेम,इतना प्रेम करना कि दस सन्तान के बाद तुम्हे 11 वा पुत्र अपने पति जैसा प्राप्त हो!" स्त्री के प्रेम का शिखर तभी है जब वो आपको पुत्र स्वीकार करे बेशर्त! और पुरूष का शिखरतम प्रेम उसको जनक औऱ लक्षिता को जानकी बना देता है! और ये बेशर्त दशा सर्वथा त्याग के बाद प्राप्त होती है बालम.. बालमा.. हे प्रिय तुम बालक मैं माँ! ये प्रेम का स्तर है जहाँ से प्रेम विदा होकर.. विशुद्ध कर्म में परिणीत होता है!

सम्यक-स्मृति

याद रहना कोई तथ्य अच्छी बात है, किन्तु यदि भूले ही न कुछ भी तो, बात तकलीफ देती है, यदि आपको आपकी चेतना की आयु स्मृति में आ जाये, फिर सम्बंधित हो पाना किसी से बहुत मुश्किल हो जाता है! प्रत्येक व्यक्ति, जीवित हो या मृत समान सम्बन्ध होते है... इस बिंदु पर आने के उपरांत, प्रत्येक तथ्य(चेतन,अवचेतन, अचेतन) से सम्यक सम्बंधित रहना आवश्यक है,नही तो भयंकर निद्रा में जाने की बात हो जाती है... सायकोसिस होना प्रारंभ होता है! आसपास लोग आपके बिलकुल सद्धह-स्नात व्यवहार से असहज होते है! अतः सम्यकता आवश्यक है आपके रंगमंचीय अभिनय के लिए! क्योंकि फिर एक ही भौतिक क्रिया शेष रहती है, महाभिनिष्क्रमण! की! और उसके लिए भी सम्यकता आवश्यक है!

सूर्य-चन्द्र...एक लोककथा!

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भैया श्री सुधाकर,श्री दिवाकर..आदरणीय पिता जी के साथ ही रहते थे,बहन सु.श्री स्मिता और मैं राज(प्रभाकर) मम्मी के साथ और दादी  राजदेई देवी जी के साथ गांव में ही रहता था, गांव के प्राथमिक विद्यालय में मेरा और दीदी का पठन-पाठन हुआ,भैया लोग अत्यधिक स्नेह करते थे,गुरु अभिभावक सब वही थे, पिता जी से हम लोग(मैं और दी) बहुत बेतकल्लुफी से बात करते थे, पिता जी भैया लोगो की बहुत पिटाई किये थे,लेकिन मुझे और दी को कभी भी स्नेह के अतिरिक्त और कुछ नही... पिता जी अकेले पुत्र है दादी के, जो अब नही हैं हमलोगो के मध्य...स्वर्गीया राजदेई देवी पिता जी का मूल नाम तो मनोज रखा गया था,किन्तु एक योगी आये और जबरदस्ती लालमणि नाम रखकर चले गए.. एक मामले की विवेचना में एक न्यायाधीश जिनका नाम खुद लालमणि था... अपने नाम का अर्थ पूछे..पिता जी को तबतक नही मालूम था.. कोर्ट से निकलने के बाद पिता जी मुझसे पूछे तो मैंने बताया कि "कृष्ण" होता है...न्यायधीश महोदय को भी पता चला.. उन्होंने धन्यवाद अर्पण किया... दादी ढेर सारी कहानियां सुनाती थी, मै और दीदी माँ के पास ही सोते थे, बीच मे सोने की जिद मेरी हमेशा पू...

फितरत!

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निगाहो की फितरत है साहब, सत्ता में नशे में रहने की.... और सत्ता की भी फितरत है, दहलीज कभी भी लाँघने की... चरम है उत्थान तो समझो, प्रारंभ-पतन भी निकट ही है! किस्मत की भी एक फितरत है, क्षण-क्षण परिवर्तित होने की... तय कर लो तुम क्या करना...है! वक़्त की भी फितरत है बस बहने की..हाँ चलने की... बस चलने की...हाँ चलने की...!

विरह के पार...४

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आंखे बंद की अभी ज्योहीं.. अन्तस् में देखा.. तुम्हारा रूदन निर्विकार जारी... आँखे तो खुल गयी... किन्तु आँखे पुनः बन्द की.. भीतर गया खुली दीवारें... और व्योममय स्थान.. पर तुम्हे भींच कर अपने... उर-से,कंठ-से लगाया... आहिस्ता-आहिस्ता तुम्हें रोने दे रहा था..बरबस.. मेरी उंगलियों ने तुम्हारे केसुओ में फेरे लगाए.. रुदन सिसकियों में परिवर्तित हुआ... बेदखल-सा मैं... कुछ देर बाद पुनः तुम्हे ज्यादा तेज-से,  मुस्कुराते हुए जाने दिया मैंने.. हाँ भावों को कलम लिखती रही मेरी.. जाओ उन्नति के पथ पर.. संगिनी....अनुभूति! मैं विरह के पार चला जाऊंगा!... पुनः आगमन नही होगा....

साथी...९

गंगा भी दूर तक चलकर, यमुना भी दूर तक चलकर... संगम में आ मिलती है! अब आगे गङ्गा हैं.. या यमुना... समझ पाना कठिन है....किन्तु दोनों एक होकर.... अन्य में परिवर्तित "एक" हो जाती हैं.... और यहाँ सरस्वती जैसा विवेक स्वतः आ जाता है! दो मिलकर देखो एक हुए... परिवर्तन भी हुआ विराट.. किन्तु शिकायत तो छोड़ो... प्रसन्नता के पार.... आनन्द अजस्र स्रोत... फिर तुम गर परिवर्तन के.. भय से...साथी का साथ छोड़ भागे.. देखो कही कायरता तो नही है न!

वृक्ष पिता जननी पृथ्वी!

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पिता जी कहते हैं, "जिस रोग का इलाज किसी भी वैद्य के पास नही, उसका इलाज भी बाप के पास होता है!" क्योंकि बाप हमेशा बाप होता है! और बाप का सार बाप बनकर ही प्राप्त होता है! माँ की अद्भुत मुस्कान! सृजन करती ही जाती है!

निगाहें!

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निगाहें आजकल सड़कों पर पोस्टमार्टम करती हैं, इसीलिए बेटियाँ मुँह बांध- घर से आजकल निकलती है! निगाहें नीची भी होती, निगाहें ऊंची भी होती! कोई-कोई निगाह तो, बस काम-भर उठती! निगाहें  होती है मुखबीर, निगाहे, सुरवीर भी हैं, निगाहें-भीरु, भी है! बेशर्म निगाहें, बेबाक निगाहें, अवाक निगाहें, आगाज निगाहें! नापाक निगाहें,बेपनाह निगाहें! कहीं पर लुच्चा, कहीं पर कुत्ता, कहीं भेड़िया, कहीं कुकुरमुत्ता! निगाहें शबनमी! कही, कहीं पर कमलनयन भी हैं कहीं पर मृगनयनी है तो कहीं बिल्कुल ही सरल... निगाहें मां की भी होती, निगाहें बहन की भी है! निगाहों में ही है कुटुंब, निगाहों में नफरत भी है! निगाहों की कशिश मे, ही कही बर्बाद जीवन है! कई निगाहों ने तो,बस निरा-इंतज़ार जाना, निगाहें बन्धन में डाले कभी ये मुक्त भी कर दे! जरूरत है निगाहों को निगाहों की खबर बस हो!

सुर्ती औऱ प्रेम!

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प्रेम और सुर्ती एक जैसे ही हैं! एक की लगन और दूसरे की लत, छूटती नही!.तिलिस्म..अनवरत... एक से मुख में कर्क, दूजे से सारा बेड़ा गर्क!. प्रारंभ दोनों का नशीला, कुछ वक्त बाद आदत की मार.. और छूटने के सारे उपाय! दोनों समान है, ज्यादतर लोग चोरी से, दोनों से मिलकर...हल्के होते हैं! दोनों के सेवक को एक- ही डर, बदनामी का होता है! मौत दोनों में शामिल होती हैं लेकिन ये मोहब्बत है, छूट पाना मुश्किल है! हाँ नामुमकिन नही है! असावधानी एक मे तो मुंह मे छाले, दूसरे में हो तो हृदय-रोग लगा डाले! दोनों भिक्षुक बनाते है! दोनों का कोई मजहब, और जाति नही होता है! प्रेम बिल्कुल सुर्ती जैसा होता है!!!...

प्रेम का ढंग!

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प्रेम दरसल दूसरी मृत्यु है, प्रेम में नित-नित मृत्यु होती है, अकड़,शान-ओ-शौक़त,घमण्ड ईर्ष्या,स्पृहा,घृणा,द्वेष ,आत्माभिमान स्वाभिमान.... सबकी मृत्यु होती है! यदि आप प्रेम में है और इनमें से कुछ भी शेष है आपमें, तो आवश्यकता है आप अपने समर्पण की विवेचना करें, सब लुटा नही गर, तो प्रेम कैसा,पाखण्ड है यदि शेष बचा है कुछ तो! एक क्षण का प्रेम ही इतना काबिल है की मृत्यु हो, और मृत्यु आवश्यक है! क्योंकि उसके बाद आपका एक नया जन्म होता है,तब पहली दफा आप द्विज होते है! इसलिये मोहब्बत आपको यदि वैसी ही जिंदगी बख्शे तो! वो मोहब्बत नही रही होगी... साहचर्य,व्यापार या कुछ और अनेक नाम है उसके... हो सकते है,किन्तु प्रेम नही! प्रेम आपको द्वैत से अद्वैत की तरफ ले जाता है! और प्रेम प्रारम्भ ही है मात्र! उसके बाद अनन्त व्योम आपका स्वागत करेगा! अगली बार अपने प्रेमी या प्रेमिका से ढंग से मिलिये! जिससे मृत्यु का प्रारंभ हो सके!

साथी..८

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एक तरफ था एक आक्रामक, एक तरफ थी प्रतिक्षणीनी.. सौम्य विरहिणी, जिसको मात्र थी एक... शांत-सी आस... और फिर आक्रमण प्रेम में पिघलने लगा,आक्रमण भी प्रतिक्रमण की ओर बदला, कैसी तेरी अद्भुत छाँव! प्यार भी आहिस्ते-आहिस्ते गगनचुंबी होता गया... साथ,धागे से वस्त्र हो गया ऐसा वस्त्र, कभी दिखा नही था... कैसा ये साथ? क्यों ये साथ? कबतक ये साथ? इन सबसे परे बस एक प्रगाढ़ता, जो दिव्यता की ओर ले जा रही है, नित-नित नूतन ...मंगल-मंगल सर्व मंगल...कहाँ से? कैसे समझ से परे...लेकिन एहसास असीम... दूसरे जगत के वासी है ये दो साथी... बस साथ दे रहे एक दूसरे का.. सब कुछ ताक पे रख के ताकना बन्द हो गया.. अंतर्दर्शन और एक नहाई हुई दुनिया...पहले कभी किसी.. जन्म में देखा था ये स्वर्णिम संसर्ग! आज एक आँख ऐसी मिली जो माथे से देखती है सारी तपिश शीलत हो चुकी और साथी का साथ... है निर्विरोध, निर्विकार परम् गंग, और दुर्मति का कूप क्षेणी और कामधेनु... फिर ये सब एक रास्ता साथी हम दोनों एक दूसरे में पूर्ण हुए,,,अब.. मुकम्मल-ए-जहाँ की मंज़िल अलग अलग दो रास्ते... तुम भी अलग हम भी अलग एक पूरब एक पश्चिम.. किन्तु फिर चक्र ...

अंजान-सी एक नज़र

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मैं किसी बात में मसगूल था, औऱ तुम्हारी नज़रे मेंरे मुखमण्डल. पर कुछ विश्लेषण कर रही थी... कब क्यो कैसे...? वैज्ञानिक नज़रें एकटक देखे जा रही थी... किसी खोये हुए-से दार्शनिक को मुझे खबर थी, किन्तु मैं और मशगूल हो गया... जिससे तुम्हे बाधा न हो कोई... लेकिन जब मिली यकायक तेरी नज़र मुझसे.... मैं ढेर-हो गया ढेर सारा ज्ञान लेकर... कैसा ये भाव,कैसा ये बन्धन... नज़रें पहचान ही नही पायी मुझको...तेरी और मेरी पहचान ही मिट गयी... कैसी है तेरी नज़र... इतनी गहरी क्यों है वो नज़रें कि मेरी हर नज़र तुमसे अलग नही.. नही...हाय रे नज़र...ये नज़र कभी न उतरे!....

साथी...७

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नीले-गगन के तले  प्यारी-सी पवन चले खिड़की से सूरज दिखे..  कुछ इस तरह हम मिले... दो किनारे यहाँ मिल रहे हैं, देखो नये आयाम बन रहे हैं, एक तरफ है ख़ाली-सा आकाश, दूसरी ओर काली जुल्फों की बदली मन मे खिली एक प्यारी-सी रजनी!, कुछ तरंगे देखो बह रही है... एक वृत्त है बना है परितः केंद्र हम दोनों की है नाड़ी एक तरफ एक ठंडा किनारा दूजे तरफ एक गर्म पताका, दोनो ही मिल रहे है एक दूजे से देखो है कैसा ये संयोग न्यारा... सारी घटाए..प्यारा-सा बादल और तुम्हारा न्यारा-सा आँचल बन्धन से मुझको मुक्त है करती, अंतरिक्ष का दर्शन कराती... ये साथ तुम्हारा  संयोग नही... विधान है.... इतने प्यारे एहसासों का... ढलने का वक़्त फिर सूरज का आया.. फिर वही खिड़की और तेरा साया.. किन्तु देखो ये क्या हो रहा है?... एक सूर्योदय और एक सूर्यास्त... सन्ध्या ये कैसी.. भ्रम है या माया न भ्रम है ये और न ही ये माया... बस प्रवहित-सी है एक धारा.. और है ये अंतस-आकाश.. टूटे हैं सारे पड़ाव.. बिखरी पड़ी है रश्मि! और अंतहीन भवधार!.....

संघर्ष और तुम्हारी ईप्सा!

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ये जो भी हो रहा है,उल्टा-सीधा, अच्छा-बुरा, आड़ा-तिरछा, सुखदायक-दुःखदायक-शून्यायक...यही न है तुम्हारे सारे संघर्षों के मूल में। हा-क्योंकि इसके ऊपर अभी तुममें से कदाचित मिलता है कोई,निःसंदेह उपरवर्णीत सारे कारण ही है समस्त संघर्षों के मूल में...इसी में तुम सब का डूबना-उतिराना मचा है... उत्पात मचा हुआ है ९८% लोगों में...थोड़ा ज्यादा थोड़ा कम लेकिन बात वही है! और बस में तुम्हारे तुम्हारी सांस भी नही,फिर भी अहंकार इतना की.... हे राम!...या अल्लाह!.... अब बस इतना करो की छोड़ो चोंचलेबाजी, सूकून से बहो सरिता के धार में,और एक दिन फिर सागर में मिलो... नही तो ये जो सिलसिला है न तुम्हारे अरमानों का एक दलदल है,फंसते ही जाओगे। बाकी आप सब स्वतंत्र है! धन्यवाद!

रात वाला बचपन!

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पतला-सा चादर से, तन को ढककर,छत पे! चैत-ज्येष्ठ-असाढ़ की पूर्णिमा... को निहारना,, एक दो तीन चार... ये वाला मेरा,वो वाला तेरा, तारों से भी सम्बन्द्ध जोड़ लेना मेरा, और ऊंची तान का गान! थोड़ी-सी मच्छर की भनभनाहट! सियारों का सामुहिक क्रन्दन, कुत्तों की चौंचाहट! और झींगुर का कुकुआओ! आसमान और गांव की वो छत! शक्तिमान के रविवासरीय एपिसोड! और फिर बाल सभा की चर्चाएं! माई, बड़की माई के किस्से! और फिर वो खूंखार झगड़े, चार-पांच दिन बाद फिर सुलह! न जाति न मजहब! बस प्यारा-सा बचपन! बरसीन की कटाई चारे की बलाई! बैलों से वो प्यारे सम्बंध, हेंगा वाला खेत, बैल-गाड़ी की सवारी, गायों की चराई! नदियों की नहाई! ओह्ह रे! वो दिन! तुम बड़े हसीन थे! हमारे बड़े नसीब थें!

विरह के पार!...३

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देखो अभी-अभी तुम्हारा- मुकम्मल एहसास मेरी रूह को, बड़े आहिस्ता छू के निकला, देर-अबेर वो तुम तक पहुंचता होगा! क्या हसीन नज़ारा है, इस वीरान-ए-हृदय का, अभी-अभी हसीन सागर का हसीन किनारा हो कर रह गया! मैं मस्त किनारे बैठ देखता सागर के लहरों की हलचल, गुदगुदी कर गया तन-मन मे! वो रेशमी-मखमली! एहसास तेरा.... मुक़म्मल तो सच मे तुमसे ज्यादा.. तुम्हारे विरह में ही हुआ! हाय! रे विरह और तुम्हारा- राब्ता मेरे महबूब से भी हसीन निकला!

जड़त्व-एक प्रेम कथा!..

सेजल! उस दिन की सारी घटनाएं मुझे याद हैं और अभी तक याद है,उस दिन बिल्कुल अकस्मात मैं यूनिवर्सिटी का कार्यक्रम बीच मे छोड़ा था, लोग अवाक थे मेरे इस बर्ताव से सेजल! मैं वहाँ से घर आया,माँ ने कहा था मुझसे,याद है मुझको सेजल, "शिरीष कपड़ा गंदा हो गया है निकाल दो मैं धूल दूंगी।" मैं तुरन्त हरी टी-शर्ट और व्हाइट वाली जीन्स पहनकर कैंटोनबोर्ड की तरफ चला गया,जहाँ से होते हुए अक्सर मैं गंगा एवं यमुना नाम वाले इंजिनीरिंग कॉलेज के द्वारों से होकर संगम जाकर वास्तविक गङ्गा और यमुना के दर्शन किया करता था,किन्तु उस दिन...     यकायक मैं मुड़ा न जाने क्या सुझा मैं तुम्हारे यहाँ चला गया और अंकल-आंटी से थोड़ी देर बातचीत के बाद मैं तुम्हारे स्टडी-रूम में आया था! सब याद है मुझे "अर्रे...शिरीष! तुम कब आये" बस अभी यूँही...मैंने कहा। अच्छा प्रोफेसर शिरीष सुना है आजकल ज्योतिष का सोध चल रहा है तुम्हारा... हाँ चल रहा है किन्तु तुमसे किसने कहा हम्म...अवनि ने। सेजल ने अपना हाथ मेरे हाथ में देते हुए कहा... तब फिर देखो मेरा हाथ! और हाथ देखते हुए पहले तो मैंने बेहतरीन नेल पॉलिश और नेल्स क...

खत...४

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श्रद्धेया! मेरा चक्र पूर्ण होना था,मुझे जाना था,आपने कहा मुझसे की मैं प्रभाकर हूँ, मुझे किसी को अंधेरे में छोड़ नही जाना चाहिए! प्रकाश तो था किंतु थोड़ा भ्रम था आपको,आप परछाई की तरफ देख रही थी! मैं भी बहुत पतित हुआ आपके जीवन मे प्रकाश लाने के वास्ते मुझे उस वक़्त कठोर वचन कहना पड़ा! "आप अपनी सड़ी हुई सूरत मुझे कभी न  दिखाए! और न ही मुझसे सम्पर्क जोड़ने का प्रयास करे!" इतना अहंकार युक्त वचन मैं बोला जीवन भर ये कष्ट सालता रहेगा मुझे! किन्तु असत्य नही बोला था,मैंने आपके अंदर आत्मविश्वास और तेज भरा हुआ है जब, तो सड़ी-सी शिकायती सूरत क्यों! आपको अपनी मंज़िल हासिल करनी है उस चेहरे को सूरज-सा चमकदार बनाना है मैं नही हूँ अब आपके साथ! किन्तु मुझे अटल श्रद्धा है कि आपको आपकी मन्ज़िल मिलेगी, एक करारा तमाचा मारना है आपको मुझे भी,और उन्हें भी जिन्होंने आपको कमतर आंका! मुझे इसलिये कि मैंने कटु वचन बोले! निःसंदेह आपके जीवन का सूर्योदय होने वाला है,पौ-फट रही है अभी मैं देख सकता हूँ! मैं रहूँ या न रहूँ , ये बात होनी चाहिए! वक़्त बस अब आ गया, सूरत बदलनी चाहिए! चमचमाते एक सितारे ...

दुनिया के किनारे..३

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उधर खारा सागर, विशाल गहरा सागर, इधर प्यारी सरिता हमेशा बहती सरिता झील मुझसे सम्वाद कर रही  थी! तुम मेरे पास क्यों आ जाते हो,रोज शाम को और हाँ! आज तुम चुप ही रहना तुम अजनबी जान पड़ते हो लेकिन हो नही,मैं दुनिया के किनारे हूँ इसलिए शायद तुम रोज आ जाते हो! और तुम्हारी शांत छवि बिलकुल बुद्धू-सी आज मैं तुम्हे आलिंगन करने वाली हूँ इस एकांत निर्जन में मुझे अर्पित करना है प्रेम तुम्हें क्योंकि इस झील के हृदय में प्रेम उमड़ गया एक प्रेम पथिक के निर्विकार भाव से! झील बार-बार अपने कोमल आलिंगन में मुझे प्यार से जकड़ रही थी,,, मैं समय शून्य हो रहा था,इतना प्रेम पाकर उस वक़्त भी हृदय से कृष्ण का ख्याल नही छूटा! अचानक मैं फफक-फफक के रोने लगा,अनायास ! झील थोड़ी घबराई कहने लगी मेरे आलिंगन से आहत हो तुम! क्षमा चाहती हूँ! मैंने कहा अरे नही-री पगली, ये फफककर रोना दरसल अहंकार का बहना है तुम मुझे यूँही समेटे रहो! अपने दामन में! झील सहज थी,मेरे बालों में बड़े स्नेह से उंगलियां फेर रही थी! मैंने कहा की माँ की स्मृति हो आयी,तुम्हारे प्रेम से! और तत्क्षण मेरी बहती आंखों ...

अनुग्रह अर्पण नाथ को!

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मेरी खुशनसीबी की संसार मे मुझे इतने प्यारे लोग मिले, जो बेहद सरल और सुलझे हुए लोग हैं! धन्यवाद मेरे माधव के प्रत्यक्ष सुंदर स्वरूपों

समस्त-सूत्र!

प्रत्येक हाड़-मांस की पोटली पहली दफा अमीबा ही होती है,उसके बाद विभिन्न प्रजातियों के साथ अनन्त रूप..... और सबसे छोटे स्तर पर क्वांटा या उससे भी छोटा कोई सम्भावित कड़, ये पदार्थ के स्तर पर है यहीं से आइंस्टीन साहब की सापेक्षता विदा हो जाती है! और आता है प्रकाश में एक काला छेद!... ये काला छेद मूलतः समय औऱ स्थान का सम्बंध निर्धारित करता है! और यहीं से एक संपूर्ण सूत्र प्रतिपादित होता है जो हमारे समस्त प्रश्नों का उत्तर देने की क्षमता लिए हुए है चाहे अध्यात्म हो या विज्ञान!

भगवान!

कैसे कह दु तुम्हे, खुद कृष्ण पधारे हैं और संग में उनके माँ राधिका आयी इतना दुलार किये! मैं बालक बन देखा! रास-रचाते रहें स्वयं- भोजन भी पकाते रहे, आज पेट भर खाया! माँ की ममता पाया! अब बस अनुग्रह में ये रोम-रोम मेरा! और हो भी क्यों ना ऐसा नारायण हैं आयें! हे नाथ तुम्ही तुम हो! अब बस तुम्ही तो हो! मैं दीन हूँ! तुम दीनानाथ हो! दीनानाथ हो!

खत..३

ये समझ ना, बड़ी नासमझ होती है, बिल्कुल क्वांटम भौतिकी की तरह,छोटे-छोटे कण जिसके ब्लैक होल के विचार में स्टीफ़न साहब fully paralised हो गये! निःसंदेह जीनियस हैं!अतिशय जीनियस हैं बड़े बड़े का पसीना छूट जाता है उन्हें समझने में ये समझ की नासमझी ही तो है की जो ज्ञान की बात करे वो प्रेम में पड़ के कांप नही सकता अगर कांप दे तो खैर नही उसकी, हैं न! ये समझ है...ये नासमझ होती है मैं भी दुनियादारी से परिचित हूँ अभी तक तकरीबन 10 वर्ष से मेरी चेतना ने लगातार ढेर सारे दिव्य ख्याल आप पर प्रक्षेपित किये आगे भी करती रहेगी आप भले स्वयं को हाड़ मांस मज़्ज़ा की पोटली समझे,लेकिन मेरे अन्तस् ने आपको उसके पार ब्रह्मांड के उम्र जितनी दूर तक महसूस किया है! जरूरी था कि मुलाकात हो अब दिव्य कल्पनाओं को समक्ष देख जो कम्पन था दरसल वो भय का प्रतिरूप है, इतने खण्ड हुए मेरी रूह के, इतनी उपेक्षा, इतनी घृणा से गुजरी है ये रूह.... जैसे किसी बजबजाती नाली में रहने वाले को, कोई नगर के महाराज के चमचमाती कालीन पर खड़ा कर दे तो उसे भय होगा, की कही कोई गुस्ताखी न हो जाये राजमहल उसके दुर्गंध से दू...

पुकार..३

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कोई आगे की योजनाओं में गुमसुम कोई पीछे की जलन में मशगूल, मुझे एक शख्स दो, जो अभी इसी वक्त जी रहा हो।। कि खिले हुए गुलाब को देख रोमांचित हो रहा हो, अपनी चलती सांसों से सुकून पा रहा हो! इन चलती हुई सांसों की कीमत वो ही बता पाएंगे जो अस्पताल में अभी आखिरी सांस ले रहे हो! सुहाना समीर जिसे इस वक़्त कर रहा हो....मस्त मुझे वो दो तुम बस वही शख्स! शायद विरले ही होंगे जिनको उनकी रजाई भी प्यारी.. लग रही हो,और मस्ती मे ओढ़े हुए हो! नही तो किसी की कम है किसी की ज्यादा! मुझे वो एक शख्स दो जो अभी बस अभी के सिवा कुछ और न चाहता हो! और हर बात पे मुस्कुराता हो! अगर मिले कोई तो उसे मेरा पता दे-देना कई जन्मों से पुकार रहा हूँ अभी तक तो कोई नही आया!

संसार!

कोई कहे की फैल रहा है, कोई कहता सिकुड़ रहा है, बात दोनों एक-सी है फैलाओ या सिकुड़ाओ! चाहे फैले या फिर सिकुड़े,होगा तो एक- केन्द्र कही, वही केंद्र ही अलग-अलग समझ औऱ समुहों के द्वारा... कभी कृष्ण, कभी राम कभी जीसस कभी अल्लाह! अलग-अलग है ये धाराएं किन्तु केंद्र बस वही एक है! अब ये तुमपर है कि तुम शहर जलाओ या फूलों से पाट दो, गले लगाओ या तलवार से काट दो.... तुम्हारी समझ,तुम्हारे संस्कार जगत विस्तार या नरसंहार.... जो चुन लो तुम स्वतन्त्र हो वो केन्द्र एक ही है! उसके चारो तरफ ये समस्त ब्रह्मांड!

विरह के पार!..२

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जो बात तुझमें भी नहीं, वो बात तेरे विरह मे हैं, कम-से-कम किसी नकचढ़ी को झेलना तो नही पड़ता है! और एक बात जो सबसे हसीन है इस विरह में कि जब भी तड़पती है ये रूह मिलने को,तो हाथ सजदे करने लगते है,आँसू की अजस्र गहरी धारा मेरे दाढ़ी के बाल को आहिस्ता-आहिस्ता भिगोती रहती है मन धीरे-धीरे हल्का होते देख रोआं-रोआं भरता है अनुग्रह के भाव से तुमसे तो अब कभी नही मिलूंगा! लेकिन इतना कहता हूं कि इस विरह से हसीन और कुछ भी नहीं तुम्हारा प्यार तुम्हारी मुस्कान भी नही और स्वयं तुम समक्ष भी नही क्योंकि वहाँ दो और दो के बाद पता नही कितनों की गुंजाइश है और मेरे इस हसीन विरह में मैं ,मेरी नम आंखे,भींगी सी मुस्कान और मेरे प्यारे श्याम की दिलकश छाँव! हहहह! ये विरह ये हसीन विरह.... अब तुम मत आना कभी मैं बड़े मजे में हूँ, क्योंकि अब शायद किसी का दिल तनिक भी नही दुखता मुझसे! ओह्ह! ये हसीन विरह! और ये विरह के रंग!....

प्रेम-पखवाड़ा!

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प्रेम से अधिकार का सम्बंध ही रिश्तों की उम्र निर्धारित करता है,प्रेम पखवाड़े को समर्पित है ये लेख,मेरे कुछ मित्र लगातार पोस्ट किए जा रहे हैं कि उसी दिन भगत, राजगुरु, सुखदेव जी को फांसी की सजा मुक़र्रर की गयी थी,अतः ये घोर अनैतिक है कि हम इस पखवाड़े में प्रेम का प्रदर्शन सरेआम करें! मैं पूछता हूँ की शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि कैसे दिया जाए,मुँह गिरा के रोनी-सी सूरत बना कर उनके प्रतिमाओं पर माल्यर्पण करके! या फिर फक्र से प्रेम के इतने बीज बोएं जाए,की मुल्क में प्रेम की हवा चले, और हमेशा आग लगाने की फितरत में रहने वालों का हृदय जले,जले ही नही बल्कि भस्मीभूत हो जाये तो अच्छा है। भगतसिंह जी अपनी माँ से कहते हैं कि वो नही चाहते कि मां के आँख से एक बूंद भी आंसू गिरे, क्योंकि वो दिखाना चाहते थे की वो वतन से मोहब्बत में हंसते हंसते फंदे पर झूलेंगे! और आज चंद लोग प्रेम को ही लगाम लगा रहे हैं,जैसे कोई कुकर्म हो,अरे बच्चा मां से प्रेम करता है,तरुण तरुणी से प्रेम करता है,और वही प्रेम परिष्कृत होकर राष्ट्रप्रेम में बदलता है! और ये लोग प्रेम पर पाबंदी लगाने चले हैं,लोगो को भावनात्मक रूप से पर...

दफ़्तर!

मेरे मुल्क में आम आदमी, दफ़्तर-दर-दफ्तर आवारा हैं, और ख़ास आदमियों के यहाँ आवारा दफ्तर पालतू कुत्ता है! यूँ तो शहर में मेरे भीड़ बहुत है, दफ्तरों तक लेकिन दो चार घरों की ही पहुंच हैं! वो अपनी तरह से इन दफ्तर को चलाते है! हर दफ्तर में एक पान चबाता हुआ बाबू है जो जलील मालूम पड़ता है, लेकिन अंदर-ही-अंदर बड़े रसूख वाला साहब है, हें-हें करता है,लेकिन होता बड़ा खतरनाक है! सरकारी दफ्तर और निजी दफ्तरों में बड़ा भेद हैं, एक कि चाल कछुआ है और एक खरगोश है,लेकिन कुछ भी हो अंत में कछुआ ही भारी पड़ता है! और आम-आदमी दफ्तर-दर-दफ़्तर, भटकता ही रहता है! मरता ही रहता है!

दुनिया के किनारे-२

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आज फिर बैठा उसी झील के किनारे,पहले सहज हो कर बिल्कुल आराम के वास्तविक मुद्रा में होकर! देख रहा हूँ छटा मनोहर! मन मे प्रेम उभर रहा, आज थोड़ा विपरीत होगा,आज झील निकली और मुझसे भी कही की निकलो अपने शरीर से चलो ऊपर पेड़ पे बैठते है! मैं अनुग्रह व्यक्त किया झील को,आमंत्रण के लिए, आज झील कही की आज मैं कुछ कहूंगी तुम सुनना! मैंने हामी भर दी,पेड़ पे मस्ती में झील के उद्घोष सुनने लगा! तुम चमड़ी के अंदर क्या,  घुस के कभी देखे! सारे लोग एक जैसे हैं, रोगी,भोगी,योगी कोई भी हो! चमड़ी के अंदर सब एक जैसे है! किन्तु तुमने देखा तो बस चमड़ी बस चमड़ी, उससे अंदर जाने की औकात नही तुम्हारी,इसीलिए तो कभी मजहब, जाति, विरादरी,लिंग, इत्यादि पर पागल कुत्तों-से लड़ते रहते हो, और कभी-कभी तो हद तब करते हो, जब इन सब से आजिज आकर अकेले में तुम्हारे-से कई लोग आत्महत्या तक करते हो! और तुम खुद को सूट-बूट पहन कर बड़े गर्व से पढ़ा लिखा समझदार कहते हो, अरे तुम जाहिल हो,जाहिल हो! औऱ जाहिलो की बस्ती में रहते हो! तुम्हारे नगर में प्रेम! प्रेम के अतिरिक्त सब,सब समझते हैं! मैं सुनता रहा झील की बाते ब...

खत..2

देर-अबेर ही सही, एक क्षण आएगा जब तुम्हे, ये एहसास होगा,कि मैं तुम्हारे जीवन मे यूँही फेंक नही दिया गया था! कुछ पददलित पड़ी तुम्हारी, प्रतिभा को निखारने आया था, औऱ इतना तो निश्चित है कि तुम्हे एक दिन चमकना है! तुम्हे जोर की चमाट मारनी है उन बुझदिलो को जो, हमेशा हर मोड़ पे एक रोड़ा ही डाले,कभी हंस कर तो कभी रो-रो कर।। हांलाकि ये क्षण कठिन है किन्तु मेरे पके हुए बाल और आंख में लगे मोटे लेंस की कसम, तुम्हे तुम्हारी मंज़िल तुम्हारी ख्वाहिश निश्चित मिलेगी, निश्चित मिलेगी! तुम्हे तुम्हारे जीवन के सारे, उत्कर्ष प्राप्त होंगे,और वो जिन्होंने हर कदम पर तुम्हे रोका, निराशा के बीज बोएं, उनकी गोबर भरी अक्ल में भी पुष्प खिलेंगे! मैं रहूँ या न रहूँ, ये बात जरूर होगी, जरूर होगी! जरूर होगी!

विश्राम!

तुम्हारे आँचल की छाँव में कितनी गहरी नींद में था, आज तन्हाई की धूप में मुझे मालूम हो रहा है! अच्छा हुआ,मैं खुश हूँ इस धूप से,तुम्हारी छाँव से, कुछ सीलन ज्यादा हो गयी थी।। बहुत दिन के बाद जब नींद खुली हमारी, और उपर से ये लहराती धूप,मुझे इज़ाज़त देती है.. कि फिर से मैं एक यायावर.. आज़ाद पंछी कि तरह पूरे विश्व मे  भ्रमण करूँ,न कोई अपना न पराया, न कोई मुल्क,न मजहब..अल्हड़ आवारा, न घर आने की जल्दी, न जवाबदेही की जिम्मेदारी, कि किससे मिले? क्यों मिले? कबतक मिले? इन सारे थोक प्रश्नों से मुक्ति! हाँ लेकिन हर बात का शुक्रिया हर अदा की शुभासन्सा! मेरे हृदय के किसी कोने में भी तुम्हारे लिए न कोई शिकायत, न जगह, दोनों नही है! और इतनी गहरी नींद  कहा आती है आजकल की कोई वर्षों मस्त मुद्रा में! मलाई-मलाई ख्वाब ही ख्वाब देखे! उस प्यारी शीतल छाँव के लिए, इतने प्यारे एहसास के लिये तुम्हे शुक्रिया! वरना हम जैसे की नसीब में ये बात कहाँ! हर गली में मेरा एक"उपनाम" है इतना यायावर हूँ, सब अपनी समझ के अनुसार मुझे समझने में लगे है, ...

ख्वाहिशें!

एक रावण जैसा अधर्मी जिसने सीता को स्पर्श तक नही किया, और एक राम जैसा धर्म संस्थापक जिसने भरे बाजार जानकी को अग्नि में धकेल दिया! ये जो हमारी ख्वाहिशें हैं न! अच्छी हो या बुरी ये होती है इसलिये की हमें एक इतना अमिट कलंक लगा सके जिसे मिटाने के लिए पुनः कुछ ख्वाहिशें पाली जाएँ... जीवन कि एक कड़वी सच्चाई ये भी है कि कुछ लोग हमेशा काले होते हैं जो हमारा छिटपुट नुकसान करते हैं किन्तु कुछ गोरे लोग भी होते है-तथाकथित सॉफिस्टिकेटेड लोग जिनको प्रसन्न करने में हम जीवन भर कोम्प्रोमाईज़ करते रहते हैं किसी वक़्त थोड़ा चुके कि ऐसा डंक मारते हैं कि काला कोबरा भी लज्जा से डूब मरे उस विष की तीव्रता को देखकर इसलिए सन्तुलन बना कर रहिये... मुझे फक्र है कि मैं काला हुँ, चरित्रहीन हुँ ,मैंने धर्म के ठेकेदार पंडितों को प्रत्येक क्षण मानवीय सम्बन्धों का कत्ल कर के भी बड़े ठाट से मुस्कुराते देखा है... वक़्त वक़्त की बात है मेरे दोस्त .......... वक़्त वक़्त की बात है! पत्नी को जुए में हार जाए ऐसे व्यक्ति को भी हमने धर्मराज कहा है! वक़्त वक़्त की बात है! मेरे दोस्त!

खत!

तेरे ख्वाबों की दुनिया में, अगर मैं फिर मिल भी जाऊं, अजनबी जानकर मुझको किनारे छोड़ देना! दीवानों की मेहफिल में मैं रहता हूँ मेरे यारा, दीवाना जानकर मुझको अकेला छोड़ जाना।। अब तो मयकदे में ही कटती हर शाम मेरी.. शराबी जान कर मुझको अकेला छोड़ जाना।। दुनिया की ठोकरें भी तुमसे हसीन है मेरे दोस्त,कम से कम यकीन तो है उनको मुझपर!!

विरह के पार!

तुमसे न कोई शिकवा, न गिला,न कोई भाव ही, अब हर निकलने वाली सांस, तुमसे जुड़ी हर तथ्यों की।। और प्रत्येक आने वाली सांस मेरे कृष्ण की अनुभूति! दो-चार-दस दिन, या फिर जितना भी वक़्त लगे निकलती हुई साँसों के साथ तुमसे मेरी रूह छूट जाएगी! और धीरे-धीरे इन निकलने वाली सांसों की जलन भी शीतल हो जाएगी!

Ultimate goal!

Why is this so? Why is this being with me? Am I a culprit.. And so on.. There are a number of questions arising in our mind.. But just listen that your work is to go with the flow..Just go with the flow without any complain..Just accept whatever is happening..And try to be happy as it is the key of so many possibility... Happiness is related with the new journey... Happiness is the changed way of fear.. But only then when you stop complaining and start accepting.. Ohh dear just go with the flow Nor right nor left but to the goal.. The ultimate goal!