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विरह में प्रेम

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विरह में प्रेम संवर्द्धित होता, जो-न विकसित हो, वो वासना मात्र का प्रतिरूप होता है! प्रत्येक विरह प्रेम को मजबूत करने हेतु ही है,और यदि वासना का हो अंश तो उसे करने आता है विरह.. नष्ट! विरह आत्मिक सम्पदा के श्री वृद्धि हेतु होता है! और कल्मष को धुलने हेतु होता है।। विरह की अपनी एक विशिष्ट रूपरेखा होती है जो अध्य्यात्मिक ढांचे के श्रीवृद्धि के लिए ही परमात्मा द्वारा रचित है।। प्रेम सर्वत्र व्याप्त होकर भी मनुष्य कृत होता है और विरह प्रत्येक दशा में परमात्मा का प्रसाद होता है!।।

अट्ठहास!

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रास्ते-से जा रहा था, गुरुवर से मिलने! उनका सामीप्य ही मुझे सहजावस्था में बहुत कुछ सीखा देता है।। ज्योहीं रुस्तमपुर से आगे रामगढ़-झील के निकट पहुंचा चक्रवात प्रारम्भ हो गया प्रचण्ड तूफान प्रारम्भ हुआ मुझे गरीबों के झोपड़ियों की फिक्र सालने लगी।। गुरु जी ने तो ऋतुराज का रूदन कहा(भूमि से विदाई का) किन्तु मैंने निर्भीक हँसी देखी बदतमीजी मानवता की है अम्लीय-वर्षा ओलावृष्टि देखी।। प्रकृति अजेय है एक ही मार्ग है इसे विजित करने का कि विजित होने की अभिलाषा त्याग प्रकृति को महत्ता देकर छायादार वृक्ष लगाए जाएं जल-संरक्षण किया जाए।। और जो अमीर एयर-कंडीशनर से अपने को शीतलता प्रदान कर रहे हैं उनसे टैक्स लेकर वृक्षारोपण करने वालों को दिया जाए तब यथार्थ साम्यवाद स्थापित होगा अन्यथा नही।। प्रकृति के प्रकोप तब जाकर कम प्रभावी होगी।।

पुकार माँ भारती का!

ये स्मित तेरा हे पुत्र! करे कुछ कमाल इस तरह कोई देख कलाम हो जाये, कोई कृष्ण कबीर! अहंकार का भक्षण करना पथ में मिले गर कोई शूल! मानवता-परचम समृद्धि की अभिवृद्धि! हे भारत अब जगो तुम भी सुनो पुकार विश्व की तुम!

मुक्तिबोध!

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बेवजह-सी छटपटाहट है तुम्हारे विरह में प्रिय।। महसूस तो तुम हो ही, आती-जाती साँस के साथ।। फिर मुझे पता करना है कि ये छटपटाहट हैं क्यों आखिर।। जीवन का अगला-क्षण कैसा होगा अनुभूति का विषय है ये।। निःसंदेह ये छटपटाहट उधर भी है मैं आँखों से अपनी देख सकता हूँ।। जब तय है अब की तुम मात्र 'याद' ही हो तो क्यों न कर समझौता इनसे मैं भी मुक्त हो ही जाऊं! कोई प्रणय निवेदन नही मेरी दुनिया मेरे भीतर ही है।। तुम जहां भी रहो प्रसन्नचित रहो! मेरा क्या? अभी जख्म नया है-पुराना हो जाएगा! वक़्त-दर-वक़्त कारवाँ गुजर ही जायेगा!

रोग!

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मुझे रोग है, भारत के रोग जैसा ५.५ टैबलेट रात्रि ३.५ सुबह, और १ दोपहर! उसके बाद भी नींद नही मेरा परिवार मुझे,मनोवैज्ञानिक मनोचिकित्सक के पास लेकर जाता है! और वो चिकित्सक मुझे दवाएँ देता है,जब दवाएँ प्रभावित कर मुझे अपाहिज बना देती हैं तब मेरे अपने चैन की नींद सोते है! फिर भी कांपती शरीर के साथ मैं हौसले को बुलंद रखता हूँ और मुझे बस अनुग्रहपूर्ण रहना आता है चाहे कोई विष दे,अपशब्द कहे सबके प्रति अनासक्त अनुग्रहपूर्ण रहना है मुझे! क्योंकि इसी जीवन मे मुझे मोक्ष मिलना निश्चित है,सारे जन्मों के कुकर्मों के प्रतिफल मुझे इसी जन्म में भोग! आवागमन से मुक्त होना हैं! कुछ लोग मुझे पागल भी कहते हैं मैं उसे भी स्वीकार करता हूँ पा-पाने के लिए ग-गतिशील है जो व्यक्ति ल-लक्ष्य! दरसल कोई मुझे क्या दे सकता है जब सृस्टि के जनक ही मेरे पालक हैं! इस दुनिया के अबतक की यात्रा में मिले प्रत्येक व्यक्ति को अनुग्रह! सृस्टि के प्रत्येक कण-क्षण-स्थान सबको अनुग्रह!

भारती..१

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मैं अपने अंतिम सांस तक विश्व की समृद्धि लिखता रहूंगा आसक्ति वश नही,कर्तव्य,निष्काम कर्तव्य वश।। और पूरे विश्व का मुखिया मेरा भारत है,ऐसा सनातन काल से है! चंद नफरती, और चोरों को भी सब त्याग भारत के मुखिया बनने में सहयोग करना होगा।। भारत और भ्रष्टाचार का दूर-दूर तक कोई नाता नही, जो छिटपुट लोग है,उन्हें भी बोध होगा वो भी सुधरेंगे!

भारती!

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फट रही है पौ हिमालय गा रहा गीत इक।। कश्मीर से कन्याकुमारी बह रही है गीत प्यारी तुम भी सुन लो,मैं भी सुन लूं गान ये अद्भुत यहाँ।। जो हैं अज्ञानी यहाँ ओछी है जिनकी-प्रवृत्ति उनको भी तुम करुणा दे दो प्रेम से भर दो हृदय।। बेटियों और माओं को सम्मान देकर प्यारे तुम करो फ़र्ज़ अदा तुम माँ भारतीय स्वभाव का।। निश्चित ही ये होगा हो रहा है और हुआ भी है! विश्व के हो मार्गदर्शक तुम, शांति के हो अग्रदूत ।। समृद्धि होगी धरा पर संगठित ज्यों ही हुए तुम एक भारत-भारतीय के अतिरिक्त कुछ नही हो तुम।। बह चुका है तमस सारा खिल-रही है ज्योत्सना आ रहा है विश्व भारत को बनाने गणपति! सुन लो प्यारे,गुण लो प्यारे आ गयी समृद्धि अब!!

सनक से संकल्प!

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इतिहास में कोई व्यक्ति जो विशिष्ट रहा हो,सनक के बगैर ये असंभव है।अब यदि आप सनकी है तो प्रथमतः ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित करिये।द्वितीयतः आप लोगों का प्रतियुत्तर देना बंद करिये;अर्थात उद्दंडतापूर्वक रहना बन्द करके अपनी सनक में ही रहना सीखिये एवं प्रसन्नचित रहिये अपनी सनक में। जब आप पूर्ण सनकी हो जाये एक विशिष्ट संकल्प जागृत होगा, विशुद्ध सनक,इसी को सनकल्पगीत बनाइये एवं अपने आपका,होने के मर्म को जानिये। फिर आप स्वयम्प्रकाश हो जाएंगे। पूरी दुनिया आप भ्रमण कर लेंगे एक झटके में क्योंकि अब आप योगस्थः हो गए है। असम्भव विलीन होगा एवं सम्भव की संभावनाएं और प्रगाढ़ हो जाएंगी।

माया!

कुछ तो हो तुम,सबब या सबक! कि तुम्हारी स्मृति प्रत्यक्ष  होते ही बरबस नयन अश्रुपूरित होता जाता है! सबक या सबब लाघव या अतिरेक कुछ तो है तुमसे सम्बंधित मेरा! इतने अरषों तक एक भी सांस तुम्हारे बगैर नही! मेरे विश्लेषण में तुम मध्या हो! उत्तप्त-छाँव की सन्ध्या हो! जीवंत जगत की माया भी! जो मुक्त करे वो काया भी!

नशा!I

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मैं क्यों लिखता हूँ इसलिए कि जिस पुनरावृत्ति से मैं परेशानी में पड़ा वो मेरे पाठकों को न उठानी पड़े! एक सहज इंसान हूं कि नही ये मैं कैसे उद्घोष करूँ किन्तु सहज-सरल-विनीत बनने के मार्ग मे जो चौराहें आते हैं वहाँ मैं आपका मार्गदर्शक बन सकूँ! और एक सत्य,मेरी अनुभूति है कि प्रत्येक व्यक्ति जीनियस हैं और किसी को मैं कुछ सीखा पाऊँ इस भाव से नही लिखता हूँ! जैसे कुतिया अपने पिल्लों को भोजन उल्टी कर खिलाती है, मैं भी विचारों की उल्टी करता हूँ ताकि दस्त न हो! मेरे होने तक ही या मेरे जाने के बाद एक बड़ी संख्या जागृत हो रही है एवं होगी भी! इसमे मेरा कोई श्रेय नही हैं! मैं मात्र एक अनुवादक हुँ, और एक धोबी भी हूं जो कहने से गधे पर नही बैठता अपितु अपने-आप बैठ जाता हैं,मैं वहीं बैठ भी पाता हूँ जहाँ जागृति होने की सम्भावना होती है! मैं विचित्र धोबी हूँ मैं कपड़ा नही धोता, मन-के-मैल को धोता हूँ जिससे कि आप खुद से मिल लें! औऱ ज्योंही आप जागृत हुए मैं स्थुल रूप से अदृश्य होकर चेतन-रूप में सर्वस्व व्यापित हो जाता हूँ। तुम्हारी नसों में आत्मबोध का एक नशा चढ़ता हैं जो आपके अध्य्यात्...

तूफ़ान के बाद!

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आज फिर तूफान आया! मातम छाया! किन्तु कल फिर फुर्सत में होगी ज़िन्दगी! पुष्प खिलेंगे बसन्त के खेत लहल्हायेंगे जीवन में सारे गीले-शिक़वे फिर... फिर दूर होंगे जीवन से.. तूफ़ानी बवंडर की आयु नही है थोड़ी भी! हा किन्तु ये बवंडर तुम्हे मज़बूत स्तम्भ बनाने आयी थी! मज़बूत  करो खुद को! अभी घोर तपस्या शेष ही है!

सन्देश!

मुझमें और तुममें बस फर्क इतना-सा है, तुम्हे चैन से जीना है,मुझे चैन से मरना हैं! माँ, मदिरा, मैथुन,मत्स्य और मुद्रा! जब आप इन पञ्च मकारों से मुक्त होते है तो विद्या,विनय,विवेक, वय,वीरता इन पञ्च वकारों से युक्त होते हैं!

भारत और समृद्धि!

सन-सनन-सन-सन-सन सन्नाटा बोलेगा!........... जिस दिन जागृत भारत बस अपने उर में देखेगा..... जो नेता, अफसर-अधिकारी जीते हैं भारत के धन से... गर थोड़ी भी नियत बिगड़ी...उनका सिंहासन डोलेगा! अब भारत बोलेगा,समृद्धि बोलेगी!

नाभिक!

नाभिक में जब प्रोटान टकराते है तो परमाणु विस्फोट होता है! इसी सिद्धांत पर परमाणु बम बनता है! और जब दो प्रोटान या कण आपस मे मिलते है तो एक जबरदस्त ऊर्जा बनती है, इसे नाभिकीय संलयन कहते हैं सूर्य की अजस्र ऊर्जा के पीछे यही वजह है! इसी तरह जबतक भारत मे विभिन्न मजहब जाति इत्यादि अलग कण रहेंगे भारत का विखण्डन होता रहेगा! किन्तु जिस दिन भारत के लोग मात्र भारतीय होकर सनलयित हो जाएंगे! भारत सूर्य की तरह विश्व को पोसने लगेगा! मर्जी आप की है आप स्वतन्त्र हैं!

उर्वशी!

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मुझमें और तुझमें एक रिश्ता तो है.. कि जब मैं डूबता हूँ इश्क़ में तुम्हारे.. निर्जन रातों में मेरे श्वांसों की ध्वनियाँ, सुगंध तुम्हारी रग-रग में मेरे! प्रिय! इस कदर.. समहित होती हैं... मुझमें तुममे अभेद सम्बंध निर्जन रैन, रंग बरसावे तेरे संग हे मेरे प्रिय! स्पर्श तुम्हारा मेरे पाषाण-हृदय को पिघला-पिघला के पारस बनाता जाता.. चुम्बन तुम्हारा,आहिस्ता-आहिस्ता मय को विलीन करता कृष्ण में एक-एक बूंद प्रेम की यूँ स्पर्श करती हमें प्रिय! मैं सन्यस्त होता जाता! बर्फ के हैं ये स्वर्णिम पल कि पिघल-पिघल के मेघ निर्मित कर जाते! और अब एक बारिश होगी जो विश्व की समस्त लकीरों को मिटा देगी! एक विश्व,एक धर्म का उदय हो रहा है! एक धर्म जो निर्ग्रन्थ होगा सहज होगा! पूरा विश्व एक परिवार हो गया। मुझमे और तुममे एक रिश्ता तो है जो दिखता ही दिखता है पर दिखता नही! बस रैना आये... ले जाये मुझको तेरी ओर,उस छोर उड़कर, उछलकर, तैरकर बस रैना आये ले जाये मुझको मुझी से दूर... कर दे रिहा मुझे मुझसे ही... तुम्हारा चुम्बन हहहह! प्रिय! मुझमे और तुझमे एक रिश्ता तो है!

लड़कियाँ!

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माँ को कौन छल सकता है, लड़कियां टूटने के लिये नही; सृजन, सम्वर्धन, के लिये जानी जाती है! औऱ बड़े-बड़े छलियों को गर्भ में पाल, उनको जगतोद्धार के लिये के वात्सल्य भी प्रदान करती हैं! लड़कियां देवी होती हैं,दिव्य होती है, माँ होती हैं,ये लड़कियां! और यदि तुम खुद को धूर्त,दुष्ट,मनबढ़ समझते हो, तो रक्तबीज को भी निगल जाएं ऐसी माँ होती हैं लड़कियां! "अहिंष्य"

कैवल्यकामी!

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यात्रा करते-करते अब इस बिंदु पर हूं कि यहाँ से मात्र एक क्षलाँग, और मुक्त! मोक्ष नगरी में गया! किन्तु नही ये क्षलाँग लगेगी नही,इतनी शीघ्रता नही करनी है,अभी तुम सब को यहाँ लाना है,सबके साथ क्षलाँग लगेगी! अब तुम्हे रोगों से मुक्ति देने हेतु अनन्त पुनरावृत्ति हो,फर्क नही पड़ता। किन्तु क्षलाँग तो तुम्हारे संग ही लगेगी। ये निश्चित है... देखते है तुम्हारे "मय" में कितना जोर है!

साथी..११

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मेरी इस अनन्त चेतन यात्रा में साथी,मात्र तुम ही नही हो; अपितु अंनत परिस्थितियों में अनन्त लोग हैं। किन्तु तुम भी हो,तुम भी हो उनमे से एक जिनके साथ मेरी चेतना पूर्ण प्रस्फुटित होती है। मेरे अनुमान में तुम ही हो जो मुझे अनन्त जन्मों से मुकम्मल करते आयी हो। ये साथ स्थूल रूप से तो द्वैत प्रतीत होता है,किन्तु है नही द्वैत। निश्चित उद्घोष है मेरा ये कि मैं परमात्मा के निकट पहुंचा बिना परिश्रम के,उसमे तुम्हारा निःस्वार्थ प्रेम सहायक हुआ। तुम मुझमे सांस लेती हो,और मैं तुममें समाहित हूँ.. अब हम अद्वैत हो गए.. मैं औऱ तुम इस जीवनरूपी रंगमंच के पात्र मात्र है.. कबतक कहां तक इन प्रश्नों से बहुत दूर.. जन्नत के सरोवर में एक नौका पे बैठे हम,चांदनी चमकती तारों वाली रात्रि में प्रेम के बहाव में बह रहे हैं! दूर शहर में लोगों में उपद्रव मचा हुआ है। शुक्र है कि हम दूर है सरोवर रूपी परमात्मा के आश्रय में अभय होकर।आधे तुम आधा मैं डोर कृष्ण की और पूरे हुए हम।
बहू ही बहुत है सम्भ्रांत जनों के लिए,.......... वरना दहेज से तो भिखमंगे पलते ही आ रहे हैं अहिंष्य

मातृ-बोध!

नमन-नमन हे मातृ नमन तुमको अर्पित है ये जीवन तुमसे ही हैं सारे उपवन नभ-जल-थल में तुम ही तुम। ये शीश तुम्हारे चरणों में गर अर्पित कर दे मेरी प्यारी फिर भी कर्ज रहेगा बाकी सहस्त्र जन्मो में भी माता तुमसे निर्वाण असम्भव है।। कण-कण अपना अर्पित करके निर्माण किया तुमने ये तन तुमही तो भारत माता हो जननी हो विश्वविधाता हो।। माँ हरपल तेरी गोद मे ही रहते तेरे पुत्र सभी हे माँ! हमसब वीर बने मानवता का उद्धार करे वन्दन है तुमको क्षण-प्रतिक्षण।। गर उठी किसी की आंख तुमपर सर-कलम तो उसका निश्चित है दुष्टों को निर्वासित कर ये राष्ट्र अमर हो,है ऐसा प्रण! नमन-नमन है मातु नमन.... अहिंष्य

अंत्येष्टि!

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मेरा जन्म १९९३ के नवंबर २८ को शनिवार की रात्रि और रविवार के भोर में ३ बजे हुए हुआ,कार्तिक की पूर्णिमा के दिन! जन्म से लगभग डेढ़ वर्ष तक मुझे कुछ भी स्मरण नही है,दीदी मुझसे १८ महीने की बड़ी है! अतः हमदोनों साथ-साथ स्तनपान करते थे,एक बार मैं गुस्से में दीदी को दांत से काट लिया दीदी पिता जी के साथ चली गयी! उस वक़्त मैं कोई बीस महीने का रहा होऊँगा!... एक स्मृति जो मुझे अनवरत रहती थी वो ये की मुझे खुली आँखों से चिता जलना दिखाई देता था,और मुझे जोर का ज्वर हो जाता,जो माँ के वक्ष से लिपटे-लिपटे समाप्त भी हो जाता! अध्ययन में मुझे कोई रुचि नही थी,हाँ ४ वर्ष की उम्र तक मैं सामाजिक हो चुका था,उस वक़्त मेरा बैल मेरा प्रिय सखा था! और दो चार कुत्ते! सर्प को छोड़ मुझे सारे जानवर प्रिय थे,सर्प से भी भय नही लगता लेकिन उसकी चिकनी त्वचा मुझे अजीब लगती थी! दादी की सारी कहानियां मुझे स्मरण है,बड़की माई भी कहानी सुनाया करती थी! विद्यालय जाना मुझे प्रिय था,किन्तु पढ़ाई अपने हिसाब से ही करता था! मेरे यहाँ हरवाह हैं पलटु दादा! उनको मैं दादा ही कहता था! जब वो बैल लेकर खेत जाते तो उनके साथ मैं भी जाता,और सारी ...

मेरे बाद!

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सम्भव है कि मेरे होने तक ही,अन्यथा मेरे बाद तुम भी मेरे जैसे ही हो जाओगे! मैं तुम्हारे अन्तस् में हूँ तुम बस आँखे बंद नही किये नही तो मिल जाते मुझसे! और मैं यूँही नही तुम्हारे पास आता हूं,तुम्हे ज्ञात हो या न हो किन्तु तुम्हारे अन्तस् की पुकार पर ही मैं तुम्हारे समक्ष होता हूँ! मेरा कोई स्वार्थ नही है अपितु मैं तुम्हारे स्व-अर्थ को जागृति देने हेतु ही आता हूँ! मेरे जाने के बाद भी मैं रहूंगा,तुम्हारे साथ! तुम्हारे प्रत्येक अवस्था में!

प्रेयसी तो तुम ही हो न!

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मोहब्बत कुछ इस तरह है तुमसे मेरी! कि पहली नजर में ही मैं परिवर्तित हो गया यूँ तो अब मुझे सबमे खुदा दिखते हैं।। किन्तु श्रेय तो तुम्हे है कि जबसे तुम्हे देखा,पहली दफा ही कुछ कहा भी नही तुमसे कभी कभी भरी नज़र से देखा भी नही तुम्हे किन्तु श्रेय तुम्ही को है कि तबसे कण-कण-कृष्ण क्षण कृष्ण, हे देवी हे दिव्य! प्रारंभ तुमसे ही हुआ नही तो घमण्ड अकड़ इत्यादि दुर्गुण थे मुझमे जो प्रतिपल विलीन हुए श्रेय तो तुम्हे है! प्रेरक तुम्ही रही मैं कभी बन्धन नही बांधना चाहा किन्तु श्रेय तो तुम्ही को है! जब भी तुम स्मृति-समक्ष होती हो मैं तुम्हे भेजने के लिये कृष्ण को धन्यवाद दे देता हूं! मैं बन्धन में तो नही हूँ किन्तु निःबन्ध भी तो तुमसे ही हुआ तुम्हे देखने से हुआ! श्रेय तो तुम ही हो! कि समस्त भय विसर्जित हो गया,श्रेय तो तुम्हे ही है कि कितने भी खूंखार लोग हो या जानवर भी मुझसे प्रेम से लिपट जाते हैं मैं सबके काम आ पाता हूँ निःस्वार्थ श्रेय तो तुम ही हो! मैं धरती का बोझ नही रहा धरा भी मेरी माँ हो गयी श्रेय तो तुम ही हो! मुझे बस वही मिला न मिलन-न जुदाई एक महामिलन! ज...

काला रंग!

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रंगों में मैं काला रंग हूँ काजल समझो या कलंक लग जाऊंगा छुड़ाना मुश्किल।। लग जाऊं तो छुड़ाना मुश्किल! मुझे कौन सा रंग लगाओगे मैं तो काला रंग हूँ सारे रंग समाहित मुझमे रंगों में मैं काला रंग हूँ। लग जाऊं फिर छूटे ना! मत पढ़ना मुझको तुम प्यारे रंग चढाता हूँ मैं ऐसा, पहचान बदल जाएगी तुम्हारी बच कर रहना मुझसे हमेशा पहचान मिटा दूंगा तुम्हारी।। दुनिया परिवर्तित कर दूंगा तुम्हारी रंगों में मैं काला रंग हूँ सटे मुझसे की गयी तुम्हारी बनी बनाई पहचान... मिट जाओगे तुम मत पढ़ना मुझको!।।

एक खत उन्हे भी!

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ये लेख मैं उनको सपर्पित कर रहा हूँ जिनका श्रेय अत्यधिक है मेरे होने मे! कभी-कभी जानकर कभी-कभी अनजान बनकर मैंने जिन लोगों को प्रताड़ित किया और प्रत्युत्तर में उन्होंने मुझे स्नेह के अतिरिक्त, दुआओं के अतिरिक्त और कुछ भी नही दिया! वो प्रताड़ना मैं महसूस करता हूं कि कितनी पीड़ादायक रही होगी,उसका प्रतिफल तो मुझे मिला ही और शेष भी मिलेगा किन्तु उनलोगों के स्नेहवत व्यवहार ने मुझे बहुत कुछ सिखाया! करुणा, दया,प्रेम,सौहार्द, सामंजस्य, क्षमा, दानशीलता इत्यादि मानवीय मूल्यों का जो भी अंश कालांतर में विकसित हुआ,निश्चित ही ये उन्ही लोगों की देन है। और उस प्रत्येक शख्स को मैं आभार करता हूँ,उनके चरणों की वंदना करता हूँ। देर अबेर मेरा ये लघु-लेख उनतक पहुंचेगा, मैं धन्य हूँ, मैं धन्यवाद भी देता हूँ योगेश्वर को, कि इतनी भारी-भारी त्रुटियो के बाद भी मुझे जीवन के सम्पूर्ण आनन्द की प्राप्ति हो रही है। लेख का समापन एक मशहूर कवि दुष्यंत कुमार जी की पंक्तियों से- अब सबसे पूछता हूँ बताओ तो कौन था, वो बदनसीब शख्स जो मेरी जगह जिया।

सांस में तुम!

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हा तुम्हारी याद में मैं निर्जन जगहों पर जाकर उनको खुद से सम्बंधित करता हूँ। रोने देता हूँ खुद को बहने देता हूँ तुमको अवरुद्ध नही करता तुमको खुद में जीने देता हूँ तुमको। कहां विरह, कैसी विरह एक क्षण भी अलग हुए अगर तब न है विरह, तुम सांस-सांस चलते हो,मुझमे रहते, हो बिखरते हो, सिमटते हो।। तुम अद्भुत अनुभूति हो प्राणों की आहुति हो जीवन को जीवट कर के प्रतिपल सहते रहते हैं,और कुछ कहते रहते हैं।। नियंत्रण है क्या किसी का  एक कण पर भी,यहाँ तो सब सतरंज के मोहरे हैं जिसका नियंता सारी चालें चलता कभी गम भी देता है,कभी खुश भी कर देता और कभी जीवन ही ले लेता।। फिर कैसे करूँ दोषारोपण खुद पर या तुम पर या नियति पर बस नही मेरा उसपर हाँ तुम्हे सांसों में जीने का हक़ है मुझे और उससे किसी को कोई कष्ट भी नही होगा।।

अमेठी-एक संघर्ष सत्यकथा!

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बात ४ अक्टूबर २०११ की है,उस वक़्त मैं अमेठी नरेश राजा संजय सिंह(पूर्व केंद्रीय खेल मंत्री, वर्तमान राज्यसभा सदस्य असम) के कॉलेज राजर्षि रणंजय सिंह आसलदेव महाविद्यालय पीपरपुर अमेठी में स्नातक प्रथम वर्ष का विद्यार्थी था। संजय सिंह जी की पहली पत्नी गरिमा सिंह पुत्री विश्वामित्र प्रताप सिंह(पूर्व प्रधानमंत्री) हैं जो वर्तमान में अमेठी की विधायक है भाजपा से। संजय सिंह जी की दूसरी पत्नी है अमिता सिंह(पूर्व कैबिनेट मंत्री उत्तर प्रदेश ,राष्ट्रीय बैडमिंटन खिलाड़ी) उस वक़्त अमेठी की विद्यायक थी कांग्रेस से,संजय सिंह जी भी कांग्रेस से ही है। उस वक़्त संजय सिंह जी लोकसभा सुल्तानपुर से सांसद थे कांग्रेस से। ४ अक्टूबर को महारानी अमिता सिंह का जन्मदिन राजकीय उत्सव के रूप में मनाया जा रहा था।चुकि अमिता सिंह जी मेरे कॉलेज की चेयरपर्सन थी। अतः मेरे कॉलेज के कुछ चयनित छात्रों को भी अमेठी जाने का अवसर मिला,उनमे मैं भी एक था। उस दिन नवरात्रि की अष्टमी थी। हम लोग गए रणवीर रणंजय सिंह स्नातकोत्तर महाविद्यालय अमेठी के मैदान में हजारों लोगों का जनसैलाब महारानी के जन्मदिन के दिन पर उपस्थित था। महारानी के ...

बिन्दु-जिसे पकड़ना है तुम्हे!

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रेगिस्तान में चल रहे तुम दो घण्टे से,जल से तिल-तिल प्यासे हो,उस वक्त बड़ी कठिनाई से जल मिले तो जिस मनोयोग से पीते हो उस जल को,अबसे हमेशा जल वैसे ही पियो। कण्टक भरे गर्म रास्ते पर चलने पे शीतल घांस भरी भूमि मिले तो पाँव जिस तरह रखते हो,अबसे प्रतिपल उसी भाव से प्रत्येक क्षण भूमि पे पाँव रखो! इसी तरह सांस,नींद और विभिन्न बिंदुओं को पकड़ो और प्रेममय-अनुग्रहपूर्ण जीवन जियो... प्रत्येक बिंदुओं को तलाशो,और जीवन को मुक़म्मल करो.. जय श्री कृष्ण

भाई-माई

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जब मैं शैशवकाल में था तो मैं सबको भाई कहता था,भाई मेरा प्रिय शब्द है,बड़े भैया श्री सुधाकर जी से तो बाद में घनिष्ठता हुई किन्तु छोटे भैया श्री दिवाकर जी से बचपन से ही माँ-सा प्रेम रहा,उन्होंने हमेशा गुरु की तरह,मित्र की तरह अभिभावक की तरह मेरे प्रत्येक कार्य मे सहयोग किया आज २८ फरवरी को उनका जन्मदिन है! मैं प्रार्थना करता हूँ की उन्हें शारिरिक मानसिक सामाजिक पारिवारिक समस्त सन्तुष्टि प्राप्त होती रहे। छोटे भैया बड़े भैया का बहुत सम्मान करते है बड़े भैया एक जीवित सन्त है,जिनमे कोई बुराई नही है,मुझे स्मरण नही कि कभी वो मुझे डांटे तक हो। मैं धन्य हूँ की मुझे इतने महापुरुष भाई मिले हैं। हे योगेश्वर आपको कोटि कोटि धन्यवाद! बड़े भैया पिता तुल्य, और छोटे भैया माता तुल्य! आप दोनों सलामत रहें। औऱ दोनो प्यारी भाभी माँ और चारो बच्चे हमेशा उन्नति करें!

परावर्तन!I

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यदि आप किसी को पतित करना चाहते हैं तो पहले आप स्वयं पतित होइये। यदि आप प्रेम करना चाहते है,तो स्वयं को पहले करिये पूर्ण मनोयोग से प्रेम! यदि नफरत फैलाने के फिराक में है तो पहले स्वयं के अन्तस् में नफरत फैलाइये। यदि आप अपमानित करना चाह रहे हैं तो पहले अपमानित होइये। गङ्गा पतित-पावनी हैं इसलिए पूजी जाती हैं सदियों से, कैसी उल्टी बात है,कि संसार का पाप भी धोती है स्वयं के जल से और पवित्र भी है! किन्तु ये सत्य है,गङ्गा की पवित्रता है ही इस हेतू कि वो सबको पाप मुक्ति देती हैं। और अब आपको तय करना है.. क्षमा या प्रतिशोध, प्रेम या घृणा, उपकार या अपकार भलाई या बुराई आदि आदि जो भी आप देना चाहते हैं,बाटना चाहते हैं पहले स्वयं की धारिता को भरेंगे तभी उलट सकेंगे..वितरित कर सकेंगे.. आप स्वतन्त्र है चुनाव के लिए...आपका जीवन मुझे हस्तक्षेप नही करना तनिक भी। आप किसी के घर मे पुष्प फेंकते हैं यदि तो अर्थ स्पष्ट है कि आप के घर मे पुष्पों की अधिकता है,एवं यदि कूड़ा फेंकते है तोभी स्पष्टतः आपके घर मे कूड़ा भरा होगा... किसी को बद्दुआ दे रहे तो बद्दुआओं से भरे आप हैं, किसी को शुभासन्सा दे रहे त...

प्रयाग-एक प्रारम्भ!

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मेरा अनुभव है प्रयाग का! इलाहाबाद जहां से अकबर भी दिन-ए-ईलाही का प्रारम्भ किये। यूँ तो इलाहाबाद मैं कक्षा सातवी में ही गया प्रथम बार,और उसके बाद सैकड़ों बार.. किन्तु ये "प्रारंभ" वृत्तांत तब का है जब १० वर्ष तक वन्दनीय डॉ. कृपाशंकर पांडे(वर्तमान विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग ई.विश्वविद्यालय) जी के यहाँ आदरणीय भइया लोग रहकर,से सप्रेमविदा लेकर मैं दीदी और मम्मी उनके घर से कुछ दूरी पर एक दो कमरे वाले फ्लैट में शिफ्ट हुए.. क्योंकि गुरु जी के यहाँ समीक्षा प्रकाशन केंद्र प्रारंभ हुआ था और सारे कमरे किताबो  को रखने हेतु चयनित किये जा चुके थे। फिर भी वो हमलोगों को आने नही दे रहे थे वहां से... मेरे वहाँ से आने के बाद दीदी(डॉ. समीक्षा पांडे) बराबर हम सबसे मिलने आया करती औऱ मेरी साहित्यिक पत्रिकाओं को नियमित ले जाती थी..तब वो पीएचडी नही की थी.. पांडे जी को गुरु जी ही कहते थे हमसब..हालांकि रिश्ते में वो हम तीनों भाइयों के दामाद लगते थे.. उनके परिवार से मेरे परिवार का स्नेह अनवरत जारी है.. यहाँ नए आवास पर एक मोर रहता था, खूब लम्बी पंख थी उसकी,दो चार दिन में वो मेरा अतुल्य सखा हो गया.....

प्ररम्भ दहेज से!

क्यों लेकर दहेज ही, तुम्हारे हाथ मे राडो की घड़ी आती है, मोटर के मालिक बनोगे,क्या भिक्षा से? क्या यही तुम्हारी शिक्षा है? घर मे कार, सोफा,टेलीविजन और अन्य सामग्रियां आती हैं। क्या तुम नपुंसक हो, कायर हो,भीरु हो, कि देवी कन्या-धन पाकर भी लालायित रहते हो। हे तरुण सुनो तुम भारत के ये बात बहुत है कष्टपूर्ण! तुम इतने कमजोर हुए कि अपने कुटुम्ब में घोषित नही कर सकते कि दहेज में एक रत्ती भी नही लूंगा। इस वक़्त हमारी संस्कृति में मात्र तीन ही कुष्ट है प्रिय,एक दहेज ,एक है जाति और एक  है सम्प्रदाय!  जब आज भारत मे युवाशक्ति पूरे संसार से ज्यादे है! तब क्यों दहेज लेकर मानवता के मुख पर कालिख पोतते जा रहे हो, प्रतिबद्ध हो जाओ, कह दो घर मे,नही करूँगा मैं विवाह यदि दहेज की एक रंच-मात्र भी राशि ली गयी। बनो तुम वीर त्यागो दहेज,कन्या का सम्मान करो माँ भारती की लाज रखो। और ये तुम कर सकते हो है क्षमता तुममे,तुम करोगे भी। त्यागो दहेज,जो मांगे दहेज,जो दे दहेज उसे समाज से बहिष्कृत करो, क्योंकि अभी नही तो कभी नही।

Journey!

One thing is clear that there is no accident in this universe.. Either it is probability or a possibility.. If anything is being  happened all of sudden..There must be any deeper connection which may be for from our conscience.. But by continuously growing our consciousness.We may reach a level of understanding that is called transcendental state of consciousness.. At this level we become effortless every happening becomes clear and one thing is also the prime symptom of this state that our conscience emerge into the universe and the ego, the seperacy dissolve in this universe.. We don't think to disturb the being.. But it is a matter of hammering your worldly bondages... Continuously... And after a large effort.. Sovereignty happens towards us.. And after being sovereign ..The repetition of incident stop.. And then start a real possibility.. Any thing may happen..But it will not be an accident.. It will be a further step of the journey of consciousness...

स्वर्णिम-भारत!

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मैं देख पा रहा हूँ आते हुए एक स्वर्ण पुंज को, धीरे-धीरे छाते हुए मेरे देश की अनुपम धरा को। आने वाला वक़्त और, अभी का भी मेरे भारत का है, मैं देख सकता हूँ भारत को खिलते हुए विश्व पटल पर... मैं देख रहा हूँ सदियों पुराने, नालन्दा औऱ तक्षशिला के वक़्त के भारत को आते हुए और भी विशिष्ट कलेवर में! मैं देख रहा हूँ कि भारत नारी शक्ति का दिव्य प्रतीक बन रहा है.. मैं देख पा रहा हूँ भारत के महान पुरुषों के दिव्य आभामंडल को। मैं मिल रहा हूँ मेरे देश की अदभुत विशिष्ट सम्मिलित संस्कृति के उत्कृष्ट स्वरूप के बीज को, पारिजात के वृक्ष में परिवर्तित होते हुए। आप मे से भी कुछ निःसन्देह देख रहे होंगे भारत के उभरते नेतृत्व को, मैं देख रहा हूँ भारत मे ईमान को बढ़ते हुए, मैं देख रहा हूँ भारत के वीरों को विश्व की रक्षा,समवर्धना करते हुए। मैं देख रहा हूँ कलुषित लोगों के हृदय को रत्नाकर से कालिदास, अंगुलिमाल से सन्त बनते हुए। मैं देख रहा हूँ... दृष्टि सब को मिलेगी, कुछ को नही मिली है उनको भी मिलेगी। मैं देख सकता हूँ भारत को विशाल होते हुए! जो सर्व ज़िंदाबाद करेगा व रहेगा...

ख़त..५

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श्रद्धेया! प्रेरिका! कण-कण क्षण-क्षण आप चेतना में हैं,आपकी सांस भी मेरी नाभि में चलती है,आपके विचार भाव सभी संवेगों का संदेश मुझे एक अदृष्य श्रोत से प्राप्त है। एवं मुझे इतना ज्ञात है कि कितनी उथल-पुथल मची हुई है आपकी चेतना में,मुझे बस अनुग्रह व्यक्त करना है। एक विराट रूप,दिव्य चेतना आपकी छवि, मेरे जीवन के आध्यात्मिक पक्ष का प्रारंभ आपसे,मेरे नाम का महत्व आपके नाम से! फ़िर भी मुझे आपसे कुछ नही चाहिए, मुझे आपका पल्लवित धाराप्रवाह जीवन देखते रहना है और एक दिन यहाँ से,इस धरा से विदा हो जाना है, मेरा जाना होशपूर्वक होगा,मैं पूरे होश में तृण-तृण मृत्यु का साक्षी रहूँगा,आनन्दपूर्वक। उस वक़्त भी आपके प्रति अनुग्रह होगा हृदय में, दर्शन तो आपका अनुभूत कर लिया मैंने, आप मुझमे अखण्ड समाहित हैं। और जैसे ही इस शरीर का बन्धन छूटेगा,मेरे सारे पापों का समापन हो जाएगा...मेरी चेतना आपके अस्तित्व के साथ समाहीत होकर इस फैलते या सिकुड़ते जगत के एक-एक कण में विस्तीर्ण हो जाएगी... जिसका पुनर्संगठन अत्यधिक मुश्किल होगा,हाँ हो सकता है यथेष्ट परिस्थिति मे। आपको कोटिशः अनुग्रह बार-बार अनुग्रह... आपक...

स्वर्णिम-संसार!

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तुम मोहब्ब्त से भरो पहले, मोहब्बत तुम्हे ढूंढ़ लेगी।। तुम काबिलियत से भरो खुद को सफलता तुमको चूम लेगी।। तुम डर-डर के जीना तो छोड़ो, वीरता तुमको चुन लेगी।। तुम नफरत का दामन तो छोड़ो दोस्तों का पैगाम भी आएगा।। तुम खुद के साथ सबसे इश्क़ करो, मानवता तुममे घर कर जाएगी।। तुम आस-पास को स्वच्छ करो, हृदय में ईश्वर उतर ही आएंगे।। तुम बहनों को,बेटियों को आज़ाद तो करो, मुल्क की काबिलियत झलक उठेगी।। शर्त बस ये है कि तुम्हारी मोहब्बत, सिद्दत से हो,तुम्हारी चाहत पूर्ण हो।। माँ-बाप के माथे को चूमो रोज भाई-बहन बेटी बेटा भाभी समाज सबके साथ झूमो रोज।। शिकायतों को फेंको कूड़ेदान में, प्रेम,श्रद्धा, करुणा से भर जाओ।। फिर देखो खुद की चाल, चमकेगा विश्व का भाल! हर तरफ मोहब्बत होगी, न मजहब न जाति, बस मानव और मानवीयता।।

दुनिया के किनारे!...४

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मज़हबी-जटिल जातीयता के दुनिया से, तुम आये प्रिय! मैं तुम्हारी राह देख रही थी,, क्योंकि आज तुम्हारे समस्त पाप, कुंठा और कोफ़्त मुक्त हो जाएंगे... मेरे प्रेम से... झील की निर्विकार बातें मैं! सुने जा रहा था,... आज मैं तुम्हे स्नान कराऊंगी, अपने सानिध्य में, झील ने दिव्य-जल एवं दिव्य गन्ध युक्त.. लेपों से मेरा स्नान प्रारम्भ कर दिया... झरनों से जल बरस भी रहा था, झील के कोमल हस्त मेरे शरीर, से आत्मतत्व तक प्रत्येक स्थान पर दस्तखत कर रहे थे... मुझे बिल्कुल शांत देखकर, झील अपना प्यारा चुम्बन मुझे अर्पित करती जा रही थी... और मेरे मय को मैं इस स्नान से धुलते महसूस कर रहा था.. अप्रतीम स्नान,अप्रतीम स्नेह.. मैं बिल्कुल विरोध-रहित था.. स्नान में प्रेम,स्नान में विरह,, स्नान में पाप,क्षोभ सर्वविकार.. धूल रहे थे..बोझिल चैतन्य मुक्त हो रहा था.. झील कह रही थी "मेरा तुमसे कोई बन्धन नही, हा सम्बन्ध है,मैं प्रकृति हूँ और तुम पुरुष हो, मैं अपने कर्तव्यों का वहन कर रही हूं आज इस स्नान के बाद तुम संसार के प्रत्येक कण के साथ सम्यक सम्बन्द्ध स्थापित करोगे.. औऱ प्रत्य...

साथी..१०

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क्यों बेवजह तुम्हारे दोनों, आंखों के मध्य देख-कर बरबस मेरे नयन अश्रुपूरित होते जाते है,क्यों कोई तो वजह होगी! क्यों? अक्सर तुम्हारे आगोश में मैं सिसकने लगता हूँ, जैसे कोई बालक अपनी, माँ से सिमट सिसके! और जबकि मेरा और तुम्हारा कोई बन्धन भी नही,, क्या स्मृतियों का सागर उमड़ आता है मुझमें,तुम्हारे सानिध्य! से एक नही कई बार, फफक फफक कर रोया हूँ वजह,क्या है! कहीं मुझे जाने के संकेत तो नही मिलते! उस दुनिया मे जहाँ से कोई वापस नही आता! हाँ यही बात है, इन आँसुओ का बस इतना-सा मतलब है! और फिर क्या ये विषाद है! कत्तई नही,ये आँसू श्रद्धांजलि है उस परमतत्व को जो तुम्हारे अन्तस् में बैठा है! और तुम्हारी आँखों के मध्य से मुझे माँ-जैसे देखता है! दुलारता है! ....यही वजह है इन अश्रूओं का!

आदत-ए-इश्क़!

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इश्क़ और आदत में फर्क है, आदत कभी इश्क़ नही होती, और इश्क़ कोई आदत नही! आदत छूटती है मुश्किल से, और इश्क़ तुम्हे छुड़ा दे हर मुश्किल से, इसलिए आदत की मुश्किलें तमाम है, रोग विभिन्न है! बहुत पतली रेखा है, इश्क़ और आदत में, इसलिये बड़ा भ्रम भी है, आशिकों और नशेड़ियों के जीवन में! जब इश्क़ आदत बन जाए, तो समझिए कि इश्क़ दूर चला गया, और आदत तत्क्षण छूटती कहाँ है! संसार के नशामुक्ति केंद्र कार्य कर रहे असफल-से! इश्क़ इबादत है, और आदत कुत्सित आदत है, आदत गुनाह भी है, क्योंकि ज्यादातर गुनाह आदत से ही होते है! आदत आफत है, इश्क़ दुआ है! इश्क़ हमेशा मुक्त करता है, जिससे मुक्तिबोध होता है,व्यक्ति! आदत बन्धन है,जो माया है,भ्रम भी है! इसलिये इश्क़ कभी-कभी सदियों में किसी को होता है, कोई मीरा,कोई जीसस कोई कबीर होता है! और आदत तो आतंक है अमूमन लोग आदत के ही बस में है! इश्क़ और आदत में एक सम्बन्द्ध भी है, जब हम आदतों से मुक्त होते है तभी इश्क़ की अनुभूति होती है! आदत बार-बार होती है  और होती-ही रहती है यंत्रवत! और इश्क़ सिर्फ और सिर्फ एक बार होता है, जो संसार के सारे रोग...

विरहिणी--आँखे!

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वो आँखे खुली हैं, कबसे शायद ज्यादा दिनों से, ना!ना! वो किसी की, प्रतीक्षा में नही खुली हैं! वो एक ज़िंदा कशमकश में हैं, कि खुद के अंदर देखूं या नहीं! भय-भी है उनको कि कहीं स्वयं पर दृष्टि पड़ जाने से! फिर देखने की ईप्सा ही न बचे तो! आखिर ये भी तो एक ईप्सा है, लेकिन समझ से परे है बात, कही मामला सूरदास-जैसा हो गया तब, गड़बड़ हो जायेगा सबकुछ! इसलिये ये कशमकश है उनको और अमूमन सारी आंखों का यही हाल है! इत्तफाक है ये कि इन आँखों का, कोई मजहब नही, कोई बिरादरी नही! फिर भी न जाने किस के आस में वो निहार रही एकटक! जबकी सत्य है ये! जिसकी आस है,वो तो स्वयं में है,और उससे मिलने के लिए! उन आँखों  को बड़े आहिस्ता-आहिस्ता बन्द होना पड़ेगा! उफ्फ! ये पहचान! जन्म हुआ,दो क्षण में नाम जाति, मजहब,राष्ट्रियता, सब निर्धारित कर दिया गया चंद लोगों द्वारा! और तबसे यंत्रवत! सब अपने-अपने झण्डे को ऊंचा करने में लगे है! और ये अप्राकृतिक तौर-तरीके इतने हावी हैं! की वो खुद की आँखों को मूँदने में भी परहेज कर रहे है! ख़ैर आँखे उनकी, मर्जी नाथ की, बन्द करे,या ऐसे ही, एकटक देखते...

ईश्वर-अल्लाह!

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मैं मंदिर में तभी जाऊं जब अपने अन्तस् की समस्त मैल धूल लूँ! मैं पांच वक़्त की नमाज़ तभी करू जब मन मे कोई पाप शेष न रहे! मैं धर्म के नाम पर तलवार तभी उठाऊं जब मेरे आस-पड़ोस में सब लोगों से एक जैसे सम्बन्द्ध हो,भाई,बहन,माँ, बाप,समाज प्रत्येक से बराबर प्रेम हो! नही तो कचहरी-कचहरी भी खेलूं और धार्मिक भी रहूँ बात बेमानी है! संसार की प्रत्येक वस्तु जीवित या अजीव सब का स्रोत एक है,फिर भी यदि तुम किसी समुदाय विशेष से घृणा रखते हो तो तुम अज्ञानी हो! और पाप समस्त कर्म अंधकार में है!।

बालक-बालम!

बालम... बालमा.. बालक... प्रेमी भी पुत्र,पति भी पुत्र-सा उपनिषदों में उल्लेखनीय है ये बात, ऋषि आशिर्वाद दे रहे है,"तुम अपने पति को इतना प्रेम,इतना प्रेम करना कि दस सन्तान के बाद तुम्हे 11 वा पुत्र अपने पति जैसा प्राप्त हो!" स्त्री के प्रेम का शिखर तभी है जब वो आपको पुत्र स्वीकार करे बेशर्त! और पुरूष का शिखरतम प्रेम उसको जनक औऱ लक्षिता को जानकी बना देता है! और ये बेशर्त दशा सर्वथा त्याग के बाद प्राप्त होती है बालम.. बालमा.. हे प्रिय तुम बालक मैं माँ! ये प्रेम का स्तर है जहाँ से प्रेम विदा होकर.. विशुद्ध कर्म में परिणीत होता है!

सम्यक-स्मृति

याद रहना कोई तथ्य अच्छी बात है, किन्तु यदि भूले ही न कुछ भी तो, बात तकलीफ देती है, यदि आपको आपकी चेतना की आयु स्मृति में आ जाये, फिर सम्बंधित हो पाना किसी से बहुत मुश्किल हो जाता है! प्रत्येक व्यक्ति, जीवित हो या मृत समान सम्बन्ध होते है... इस बिंदु पर आने के उपरांत, प्रत्येक तथ्य(चेतन,अवचेतन, अचेतन) से सम्यक सम्बंधित रहना आवश्यक है,नही तो भयंकर निद्रा में जाने की बात हो जाती है... सायकोसिस होना प्रारंभ होता है! आसपास लोग आपके बिलकुल सद्धह-स्नात व्यवहार से असहज होते है! अतः सम्यकता आवश्यक है आपके रंगमंचीय अभिनय के लिए! क्योंकि फिर एक ही भौतिक क्रिया शेष रहती है, महाभिनिष्क्रमण! की! और उसके लिए भी सम्यकता आवश्यक है!

सूर्य-चन्द्र...एक लोककथा!

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भैया श्री सुधाकर,श्री दिवाकर..आदरणीय पिता जी के साथ ही रहते थे,बहन सु.श्री स्मिता और मैं राज(प्रभाकर) मम्मी के साथ और दादी  राजदेई देवी जी के साथ गांव में ही रहता था, गांव के प्राथमिक विद्यालय में मेरा और दीदी का पठन-पाठन हुआ,भैया लोग अत्यधिक स्नेह करते थे,गुरु अभिभावक सब वही थे, पिता जी से हम लोग(मैं और दी) बहुत बेतकल्लुफी से बात करते थे, पिता जी भैया लोगो की बहुत पिटाई किये थे,लेकिन मुझे और दी को कभी भी स्नेह के अतिरिक्त और कुछ नही... पिता जी अकेले पुत्र है दादी के, जो अब नही हैं हमलोगो के मध्य...स्वर्गीया राजदेई देवी पिता जी का मूल नाम तो मनोज रखा गया था,किन्तु एक योगी आये और जबरदस्ती लालमणि नाम रखकर चले गए.. एक मामले की विवेचना में एक न्यायाधीश जिनका नाम खुद लालमणि था... अपने नाम का अर्थ पूछे..पिता जी को तबतक नही मालूम था.. कोर्ट से निकलने के बाद पिता जी मुझसे पूछे तो मैंने बताया कि "कृष्ण" होता है...न्यायधीश महोदय को भी पता चला.. उन्होंने धन्यवाद अर्पण किया... दादी ढेर सारी कहानियां सुनाती थी, मै और दीदी माँ के पास ही सोते थे, बीच मे सोने की जिद मेरी हमेशा पू...

फितरत!

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निगाहो की फितरत है साहब, सत्ता में नशे में रहने की.... और सत्ता की भी फितरत है, दहलीज कभी भी लाँघने की... चरम है उत्थान तो समझो, प्रारंभ-पतन भी निकट ही है! किस्मत की भी एक फितरत है, क्षण-क्षण परिवर्तित होने की... तय कर लो तुम क्या करना...है! वक़्त की भी फितरत है बस बहने की..हाँ चलने की... बस चलने की...हाँ चलने की...!

विरह के पार...४

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आंखे बंद की अभी ज्योहीं.. अन्तस् में देखा.. तुम्हारा रूदन निर्विकार जारी... आँखे तो खुल गयी... किन्तु आँखे पुनः बन्द की.. भीतर गया खुली दीवारें... और व्योममय स्थान.. पर तुम्हे भींच कर अपने... उर-से,कंठ-से लगाया... आहिस्ता-आहिस्ता तुम्हें रोने दे रहा था..बरबस.. मेरी उंगलियों ने तुम्हारे केसुओ में फेरे लगाए.. रुदन सिसकियों में परिवर्तित हुआ... बेदखल-सा मैं... कुछ देर बाद पुनः तुम्हे ज्यादा तेज-से,  मुस्कुराते हुए जाने दिया मैंने.. हाँ भावों को कलम लिखती रही मेरी.. जाओ उन्नति के पथ पर.. संगिनी....अनुभूति! मैं विरह के पार चला जाऊंगा!... पुनः आगमन नही होगा....

साथी...९

गंगा भी दूर तक चलकर, यमुना भी दूर तक चलकर... संगम में आ मिलती है! अब आगे गङ्गा हैं.. या यमुना... समझ पाना कठिन है....किन्तु दोनों एक होकर.... अन्य में परिवर्तित "एक" हो जाती हैं.... और यहाँ सरस्वती जैसा विवेक स्वतः आ जाता है! दो मिलकर देखो एक हुए... परिवर्तन भी हुआ विराट.. किन्तु शिकायत तो छोड़ो... प्रसन्नता के पार.... आनन्द अजस्र स्रोत... फिर तुम गर परिवर्तन के.. भय से...साथी का साथ छोड़ भागे.. देखो कही कायरता तो नही है न!

वृक्ष पिता जननी पृथ्वी!

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पिता जी कहते हैं, "जिस रोग का इलाज किसी भी वैद्य के पास नही, उसका इलाज भी बाप के पास होता है!" क्योंकि बाप हमेशा बाप होता है! और बाप का सार बाप बनकर ही प्राप्त होता है! माँ की अद्भुत मुस्कान! सृजन करती ही जाती है!

निगाहें!

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निगाहें आजकल सड़कों पर पोस्टमार्टम करती हैं, इसीलिए बेटियाँ मुँह बांध- घर से आजकल निकलती है! निगाहें नीची भी होती, निगाहें ऊंची भी होती! कोई-कोई निगाह तो, बस काम-भर उठती! निगाहें  होती है मुखबीर, निगाहे, सुरवीर भी हैं, निगाहें-भीरु, भी है! बेशर्म निगाहें, बेबाक निगाहें, अवाक निगाहें, आगाज निगाहें! नापाक निगाहें,बेपनाह निगाहें! कहीं पर लुच्चा, कहीं पर कुत्ता, कहीं भेड़िया, कहीं कुकुरमुत्ता! निगाहें शबनमी! कही, कहीं पर कमलनयन भी हैं कहीं पर मृगनयनी है तो कहीं बिल्कुल ही सरल... निगाहें मां की भी होती, निगाहें बहन की भी है! निगाहों में ही है कुटुंब, निगाहों में नफरत भी है! निगाहों की कशिश मे, ही कही बर्बाद जीवन है! कई निगाहों ने तो,बस निरा-इंतज़ार जाना, निगाहें बन्धन में डाले कभी ये मुक्त भी कर दे! जरूरत है निगाहों को निगाहों की खबर बस हो!

सुर्ती औऱ प्रेम!

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प्रेम और सुर्ती एक जैसे ही हैं! एक की लगन और दूसरे की लत, छूटती नही!.तिलिस्म..अनवरत... एक से मुख में कर्क, दूजे से सारा बेड़ा गर्क!. प्रारंभ दोनों का नशीला, कुछ वक्त बाद आदत की मार.. और छूटने के सारे उपाय! दोनों समान है, ज्यादतर लोग चोरी से, दोनों से मिलकर...हल्के होते हैं! दोनों के सेवक को एक- ही डर, बदनामी का होता है! मौत दोनों में शामिल होती हैं लेकिन ये मोहब्बत है, छूट पाना मुश्किल है! हाँ नामुमकिन नही है! असावधानी एक मे तो मुंह मे छाले, दूसरे में हो तो हृदय-रोग लगा डाले! दोनों भिक्षुक बनाते है! दोनों का कोई मजहब, और जाति नही होता है! प्रेम बिल्कुल सुर्ती जैसा होता है!!!...

प्रेम का ढंग!

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प्रेम दरसल दूसरी मृत्यु है, प्रेम में नित-नित मृत्यु होती है, अकड़,शान-ओ-शौक़त,घमण्ड ईर्ष्या,स्पृहा,घृणा,द्वेष ,आत्माभिमान स्वाभिमान.... सबकी मृत्यु होती है! यदि आप प्रेम में है और इनमें से कुछ भी शेष है आपमें, तो आवश्यकता है आप अपने समर्पण की विवेचना करें, सब लुटा नही गर, तो प्रेम कैसा,पाखण्ड है यदि शेष बचा है कुछ तो! एक क्षण का प्रेम ही इतना काबिल है की मृत्यु हो, और मृत्यु आवश्यक है! क्योंकि उसके बाद आपका एक नया जन्म होता है,तब पहली दफा आप द्विज होते है! इसलिये मोहब्बत आपको यदि वैसी ही जिंदगी बख्शे तो! वो मोहब्बत नही रही होगी... साहचर्य,व्यापार या कुछ और अनेक नाम है उसके... हो सकते है,किन्तु प्रेम नही! प्रेम आपको द्वैत से अद्वैत की तरफ ले जाता है! और प्रेम प्रारम्भ ही है मात्र! उसके बाद अनन्त व्योम आपका स्वागत करेगा! अगली बार अपने प्रेमी या प्रेमिका से ढंग से मिलिये! जिससे मृत्यु का प्रारंभ हो सके!

साथी..८

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एक तरफ था एक आक्रामक, एक तरफ थी प्रतिक्षणीनी.. सौम्य विरहिणी, जिसको मात्र थी एक... शांत-सी आस... और फिर आक्रमण प्रेम में पिघलने लगा,आक्रमण भी प्रतिक्रमण की ओर बदला, कैसी तेरी अद्भुत छाँव! प्यार भी आहिस्ते-आहिस्ते गगनचुंबी होता गया... साथ,धागे से वस्त्र हो गया ऐसा वस्त्र, कभी दिखा नही था... कैसा ये साथ? क्यों ये साथ? कबतक ये साथ? इन सबसे परे बस एक प्रगाढ़ता, जो दिव्यता की ओर ले जा रही है, नित-नित नूतन ...मंगल-मंगल सर्व मंगल...कहाँ से? कैसे समझ से परे...लेकिन एहसास असीम... दूसरे जगत के वासी है ये दो साथी... बस साथ दे रहे एक दूसरे का.. सब कुछ ताक पे रख के ताकना बन्द हो गया.. अंतर्दर्शन और एक नहाई हुई दुनिया...पहले कभी किसी.. जन्म में देखा था ये स्वर्णिम संसर्ग! आज एक आँख ऐसी मिली जो माथे से देखती है सारी तपिश शीलत हो चुकी और साथी का साथ... है निर्विरोध, निर्विकार परम् गंग, और दुर्मति का कूप क्षेणी और कामधेनु... फिर ये सब एक रास्ता साथी हम दोनों एक दूसरे में पूर्ण हुए,,,अब.. मुकम्मल-ए-जहाँ की मंज़िल अलग अलग दो रास्ते... तुम भी अलग हम भी अलग एक पूरब एक पश्चिम.. किन्तु फिर चक्र ...

अंजान-सी एक नज़र

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मैं किसी बात में मसगूल था, औऱ तुम्हारी नज़रे मेंरे मुखमण्डल. पर कुछ विश्लेषण कर रही थी... कब क्यो कैसे...? वैज्ञानिक नज़रें एकटक देखे जा रही थी... किसी खोये हुए-से दार्शनिक को मुझे खबर थी, किन्तु मैं और मशगूल हो गया... जिससे तुम्हे बाधा न हो कोई... लेकिन जब मिली यकायक तेरी नज़र मुझसे.... मैं ढेर-हो गया ढेर सारा ज्ञान लेकर... कैसा ये भाव,कैसा ये बन्धन... नज़रें पहचान ही नही पायी मुझको...तेरी और मेरी पहचान ही मिट गयी... कैसी है तेरी नज़र... इतनी गहरी क्यों है वो नज़रें कि मेरी हर नज़र तुमसे अलग नही.. नही...हाय रे नज़र...ये नज़र कभी न उतरे!....

साथी...७

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नीले-गगन के तले  प्यारी-सी पवन चले खिड़की से सूरज दिखे..  कुछ इस तरह हम मिले... दो किनारे यहाँ मिल रहे हैं, देखो नये आयाम बन रहे हैं, एक तरफ है ख़ाली-सा आकाश, दूसरी ओर काली जुल्फों की बदली मन मे खिली एक प्यारी-सी रजनी!, कुछ तरंगे देखो बह रही है... एक वृत्त है बना है परितः केंद्र हम दोनों की है नाड़ी एक तरफ एक ठंडा किनारा दूजे तरफ एक गर्म पताका, दोनो ही मिल रहे है एक दूजे से देखो है कैसा ये संयोग न्यारा... सारी घटाए..प्यारा-सा बादल और तुम्हारा न्यारा-सा आँचल बन्धन से मुझको मुक्त है करती, अंतरिक्ष का दर्शन कराती... ये साथ तुम्हारा  संयोग नही... विधान है.... इतने प्यारे एहसासों का... ढलने का वक़्त फिर सूरज का आया.. फिर वही खिड़की और तेरा साया.. किन्तु देखो ये क्या हो रहा है?... एक सूर्योदय और एक सूर्यास्त... सन्ध्या ये कैसी.. भ्रम है या माया न भ्रम है ये और न ही ये माया... बस प्रवहित-सी है एक धारा.. और है ये अंतस-आकाश.. टूटे हैं सारे पड़ाव.. बिखरी पड़ी है रश्मि! और अंतहीन भवधार!.....

संघर्ष और तुम्हारी ईप्सा!

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ये जो भी हो रहा है,उल्टा-सीधा, अच्छा-बुरा, आड़ा-तिरछा, सुखदायक-दुःखदायक-शून्यायक...यही न है तुम्हारे सारे संघर्षों के मूल में। हा-क्योंकि इसके ऊपर अभी तुममें से कदाचित मिलता है कोई,निःसंदेह उपरवर्णीत सारे कारण ही है समस्त संघर्षों के मूल में...इसी में तुम सब का डूबना-उतिराना मचा है... उत्पात मचा हुआ है ९८% लोगों में...थोड़ा ज्यादा थोड़ा कम लेकिन बात वही है! और बस में तुम्हारे तुम्हारी सांस भी नही,फिर भी अहंकार इतना की.... हे राम!...या अल्लाह!.... अब बस इतना करो की छोड़ो चोंचलेबाजी, सूकून से बहो सरिता के धार में,और एक दिन फिर सागर में मिलो... नही तो ये जो सिलसिला है न तुम्हारे अरमानों का एक दलदल है,फंसते ही जाओगे। बाकी आप सब स्वतंत्र है! धन्यवाद!

रात वाला बचपन!

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पतला-सा चादर से, तन को ढककर,छत पे! चैत-ज्येष्ठ-असाढ़ की पूर्णिमा... को निहारना,, एक दो तीन चार... ये वाला मेरा,वो वाला तेरा, तारों से भी सम्बन्द्ध जोड़ लेना मेरा, और ऊंची तान का गान! थोड़ी-सी मच्छर की भनभनाहट! सियारों का सामुहिक क्रन्दन, कुत्तों की चौंचाहट! और झींगुर का कुकुआओ! आसमान और गांव की वो छत! शक्तिमान के रविवासरीय एपिसोड! और फिर बाल सभा की चर्चाएं! माई, बड़की माई के किस्से! और फिर वो खूंखार झगड़े, चार-पांच दिन बाद फिर सुलह! न जाति न मजहब! बस प्यारा-सा बचपन! बरसीन की कटाई चारे की बलाई! बैलों से वो प्यारे सम्बंध, हेंगा वाला खेत, बैल-गाड़ी की सवारी, गायों की चराई! नदियों की नहाई! ओह्ह रे! वो दिन! तुम बड़े हसीन थे! हमारे बड़े नसीब थें!

विरह के पार!...३

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देखो अभी-अभी तुम्हारा- मुकम्मल एहसास मेरी रूह को, बड़े आहिस्ता छू के निकला, देर-अबेर वो तुम तक पहुंचता होगा! क्या हसीन नज़ारा है, इस वीरान-ए-हृदय का, अभी-अभी हसीन सागर का हसीन किनारा हो कर रह गया! मैं मस्त किनारे बैठ देखता सागर के लहरों की हलचल, गुदगुदी कर गया तन-मन मे! वो रेशमी-मखमली! एहसास तेरा.... मुक़म्मल तो सच मे तुमसे ज्यादा.. तुम्हारे विरह में ही हुआ! हाय! रे विरह और तुम्हारा- राब्ता मेरे महबूब से भी हसीन निकला!