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आधुनिक अकड़!

 जब मेरी शादी हुई थी तो मेरी उम्र महज 22 साल थी  पतिदेव की उम्र 33 साल थी, शादी के शुरुवाती दिन में हमारे बीच सब अच्छा था, दिन में कितना भी झगड़ा हो लेकिन रात में पति को करीब पता देख हम दोनो भूल कर एक हो जाते  पहले तो मैंने घर वालों को मना किया क्यों की पति की उम्र ज्यादा थी पर घर वाले नहीं माने  समय के साथ रिश्तों में खटास आती है जो मेरे साथ भी होने लगा  अब क्यों की मैं सिर्फ 22 की थी तो खाली होने के बाद मैं अपनी सहेलियों से बात करती और जोर जोर से हंसती थी  ये बात मेरी सास को बिलकुल पसंद नहीं थी उन्होंने बोला बेटा नया नया शादी हुआ है ससुर हैं जेठ हैं इनका लिहाज किया करो  लेकिन मैं आदत से मजबूर थी समय के साथ साथ मेरी सास मुझसे नफरत करने लगी और मुझे भी इसकी कोई परवाह नहीं थी  शादी के 1 साल बाद मेरे पति को काम से विदेश जाना हुआ जिसके लिए मैने भी बोला, तो उन्होंने बोला की मात्र 2 महीने के लिए जाना है कम्पनी सिर्फ मेरा पैसा देगी  लेकिन मुझे तो बस जाना था इसी बात को लेके हम दोनो में अनबन हो गई और मैं अपने मायके आगयी फिर रोज हमारी लड़ाई इसी बात पर ...

प्रेम

प्यार बहुत फ़ालतू चीज़ होती है,प्यार होना ही टोटल फ़ालतू है किन्तु ये बात भी सत्य है कि जीवन में ठहराव या सूकून भी प्यार ही देता है! जीवन को एक खूबसूरत कहानी प्रेम ही बनाता है। किसी की याद में खोकर मुस्कुराना आह!! कितना सुकून देता है! और एक जीवनमय जिम्मेदारी गृहस्थी, समाज में लोगों से प्रेम ही जोड़ता है! अगर समुचित आकलन किया जाए तो प्रेम ही सृष्टि का आधार है! ये अद्भुत प्रशांत प्रेम आत्मा का सात्विक भोजन है। सचमुच ये प्रेम आह!  शाश्वत है! निर्मल है! और शीतल है!

विरह वेदना! लड़कियों की!

 प्रेम में ठुकराई गई लड़कियां  लड़कों की तरह नही पीती दारू  नही बकती गालियां  नही निकालती भड़ास  नही करती किसी को बदनाम वो बस चुपचाप सिमट जाया करती है अपनी आत्मा के गहरे उदास समुच्चय में! प्रेम में ठुकराई लड़कियां करती है घर के सारे काम अनवरत जैसे पृथ्वी घूमती है अपने अक्ष पर रहती है साथ में घर से निर्लिप्त व निरपेक्ष! अगर भूल से भी माँ सिर पे हाथ फैर दे तो फूट पड़ती है रुलाई और बना देती है कोई बहाना! प्रेम में ठुकराई लड़कियां भीग जाने के डर से नही लगाती आंखों में काजल! उनके दिल की गिरहों की तरह उलझे रहते हैं उनके बाल! रात को सोते वक़्त भिगोती है तकिया! कचोटती है अपनी आत्मा को नजरअंदाज करती है अपने जिस्म पे पड़ी छल की निशानियों को नफ़रत करती है अपने जिस्म के उभारों से! नही कर पाती फिर जीवन भर भरोसा प्रेम नामक चिड़िया पर! प्रेम में ठुकराई लड़कियां झेलती है चन्द्रमुखी सी आत्मप्रवंचना! सहती है राधा व मीरा सा विरह! बड़ी अजीब सी होती है ये प्रेम में ठुकराई गई व छली गई लड़कियां,,,!!

समाधि ऐट 28 प्रकाशोत्सव!

१-जैसा कि इस लेख के शीर्षक को ध्यानपूर्वक पढ़ने पर आप अनुमान लगा ही चुके होंगे!!  जी हाँ ये मेरी आत्मकथा का एक अंश हो सकता है। २-किंनुभार, ढकवा बाज़ार, पुलिस स्टेशन-सिकरीगंज जनपद गोरखपुर एवं अम्बेडकर नगर के दक्षिणी-उत्तरी संयोग(श्रीरामजानकी मार्ग) कुँवानो नदी के तट पर स्थित है। जहाँ श्री लालमणि दूबे एवं माँ आरती देवी के आपसी संयोग के कारण मेरा उद्भवम जन्म नवम्बर मास के(इशवी सन १९९३) २८ तारीख प्रातः ३:०० को हुआ।

महामानवी!!

हे रजनी हे-हे! रजनी तुम हो जीवन की इक जननी तुमसे मिलकर मैं जीवन वृहता को जान सका।। पहचान हुई मेरी खुदसे मैं लघुता से प्रस्थान किया विस्तृत इस जग की सुंदरता को अपने भीतर स्थान दिया।। मैं नितप्रति पल बस ये सोचू अब तुम हो इक दिव्यकिर्ति... मेरी ऊर्जा का ये प्रवाह तुमको पल भर में.. देखना तुम...चंद्रशेखर की शिखा से गंगा की धार निकाल... इस जग की अधूरी प्यास को.... संतृप्त करेगा, औऱ स्मित ये तुम्हारा मोहन को राधिका का दीवाना बनाकर इक मधुर तान जब छेड़ेगा।। जग इक लय में लयबद्ध हुआ.... तुमने ये किसलय कर ही दिया। तुमने खुद को विस्तीर्ण किया।। ब्रह्माण्ड धरा पर परिलक्षित किया।।

विद्यालय एवं कारावास

क्या विद्यालय और कारावास एक तरह के संस्थान हैं? यह प्रश्न विचारणीय है और इसपर विचार निम्नवत है। विद्यालय एक संस्थान है जहाँ बालक को सर्वसम्मति से भेजा जाता है। हाँ कुछ मामलों में प्रारंभ में नौनिहालों में यहाँ से जल्दी भाग जाने की प्रवृत्ति होती है किंतु ये प्रवृत्ति समय बीतने पर कम से कमतर होकर लगभग समाप्त हो जाती है। और अब बच्चों का सामाजीकरण प्रारंभ होता है,उसके कुछ मित्र बनते हैं और कुछ बच्चे उनके लिये शत्रु प्रतीत होते हैं किंतु समय बीतने के बाद उचित शिक्षा, मार्गदर्शन एवं सामाजीकरण के उपरांत ये शत्रुता भी समाप्त हो जाती है। विद्यालय में बच्चों के व्यक्तित्व को निखारने का निरंतर प्रयत्न होता रहता है जो काफी हद तक सफल भी होता है। विद्यालय का मूल मंत्र "शिक्षार्थ आइये सेवार्थ जाइये" होता है। समाज मे शतप्रतिशत तो नही किंतु एक आध प्रतिशत को छोड़कर लगभग सबका जाना हुआ है, होता है एवं होता रहेगा। विद्यालय समाज एवं समुदाय के चहुमुखी विकास में महती भूमिका निर्वहित करता है। विद्यालय में जाना एक शुभ अवसर होता है। दूसरी तरफ कारावास एक दण्ड के विधानस्वरूप सृजित संस्थान है। कारावास का ...

पण्डित जवाहरलाल नेहरू!

मैत्री!

मैत्री एक भाव है ये भाव जिसने भी अपने अंदर विकसित किया वो सम्राटों का सम्राट होगा। जैसे जैसे आप मैत्री पर ध्यान देंगे और आपका ध्यान घनीभूत होगा आप सम्राट से महा सम्राट,चक्रवर्ती सम्राट बनने की तरफ भी घनीभूत है। ये ही विजय का सूत्र है। आपके भाव,विचार,स्थूल शरीर,सूक्ष्म शरीर एवं आस पड़ोस में सबको मित्र बनाइये, मित्र बनाने से ज्यादा मैत्री विकसित करिये। मैत्री को ही सूत्र बनाइये। एक दिन इस यात्रा में किसी भी क्षण जब मैत्री घनीभूत होकर पराकाष्ठा पर पहुँचेगी बस उसी बिंदु पर आप 'मैत्रेय' हो जाएंगे। पृथ्वी का अगला सम्राट मैत्रेय का उदय होने ही वाला है। आप के या मेरे या किसी के भी भीतर।

लक्ष्य!..एक यात्रा!

बचपन से जूनूनी था मैं,कक्षा ८ वीं तक कोई लक्ष्य क्या होता है इससे अनजान था, मेरा ज्यादातर समय क्रिकेट खेलने और गाँव के बच्चों के साथ शरारतें करने में ही बीतता था,परिवार में पढ़ाई के प्रति विशेष दृष्टिकोण थे सबके, इसलिए थोड़ा बहुत पढ़ भी लिया करते थे। फिर ९ वीं में दो महान गुरुजन मिले उनके मार्गदर्शन से मेरा जूनून अध्ययन की तरफ एकाग्रचित्त हुआ। और फिर शानदार परिणाम भी प्राप्त हुए। मुझे याद है जब भी मैं अपनी दादी के लिये कुछ अच्छा करता तो दादी आशीर्वाद देती "जज कलक्टर बन जा! बाबू"  फिर पिता जी ने बातों बातों में मुझे समझाया कि विज्ञान वर्ग के विद्यार्थियों के लिये १२ वी के बाद आई आई टी की परीक्षा उत्तीर्ण करना सबसे सम्मान जनक होता है। उसके बाद मैं दादी से अर्थात माई से कहता कि अब मुझे इंजीनियर बनने का आशीर्वाद दो! फ़िर दादी मुझे " बड़का इंजीनियर बन जा बाबू" हमेशा यही आशीर्वाद देती! फिर दादी का निधन हो गया। और मैं गोरखपुर शहर में आ गया गाँव से। अब मैं इंजीनियरिंग की पढाई के पीछे पड़ा रहता था। मेरे श्रेष्ठ मार्गदर्शक गण भी अंदर ही अंदर महसूस करते मैं बड़ा इंजीनियर बनूँगा! १२ व...

अयोध्या के सन्त

एक सन्त के घर जाना हुआ था मेरा बातों ही बातों में उन्होंने कहा कि मेरा सारा कार्य होता जाता है मैं कुछ करता नही हूँ। ये उस वक़्त मेरे लिये आश्चर्य भरा था।

भाग्या एक निष्कर्ष!

तेजस आज अचानक परिवर्तित हो चुका है, वो ये गहराई तक समझ चुका है कि उसे अब मुक्ति मिल चुकी है। अदिति से अचानक वो मुक्त हो गया। ये एहसास अभी तेजस के हृदय से रोम-रोम में संचरित हो रहा है। अदिति उसके जीवन यात्रा में एक ऐसा मील का पत्थर रही जिसके बाद उसके रास्ते बिल्कुल परिवर्तित हो चुके थे। वे दोनों कॉलेज से साथ पढ़े। अदिति का तो पता नही लेकिन तेजस धीरे-धीरे समर्पित होता जा रहा था। उसे अदिति में बहुत ज्यादा विशेष दिखता था। तेजस बहुत ही शांत स्वभाव का लड़का था। लड़कियों से हमेशा-से दूर रहने वाला एक ग्रामीण पृष्ठभूमि से उभर कर शहर आया हुआ लड़का जिसे शहर की ज्यादातर चीजें अचरज में डाल देती थी। तेजस क्लास में कभी अदिति से बात नही किया,डर या संकोच कुछ भी हो या शायद दोनों हो। पढ़ाई में अच्छा था तेजस मेहनती विद्यार्थियों में से एक था,कुछ अध्यापकों एवं सहपाठियों को वो प्रतिभाशाली लगता था लेकिन मूलतः उसके प्रतिभा में लगन और परिश्रम का समावेश था। तेजस की कुल प्रेम कहानी में बात इतनी थी कि वो क्लास में सबसे छूप के कभी कभी अदिति को क्षण भर के लिये देख भर लेता था,और क्लास ओवर होते समय रास्ते मे अदिति को साइक...

धनी बनने के सूत्र!

क्या आप गरीब है? यदि आपका उत्तर हां है तो पुनः एक प्रश्न-क्या आप अमीर होना चाहते हैं? यदि आप इन दोनों प्रश्नों के उत्तर से संतुष्ट होना चाहते हैं तो ये लेख आपके लिये है। अहोभाव प्रकट करना जी हां अहोभावित होना ही धनी बनने का प्रथम सूत्र है। शिकायत के समस्त भावों से मुक्त होइये,छोटी से छोटी एवं बड़ी से बड़ी सभी शिकायतों का त्याग आपको अमीर बना देगा। बदले में आप अहोभावित होइये जो भी आपके पास है,जैसे स्वस्थ शरीर,अच्छी स्वांस इत्यादि या फिर आपका परिवेश जो भी आपको मिला है ईश्वर की तरफ से अपने अंग-अंग रोम-रोम को धन्यवाद के भावों से भरिये!  ये कठिन है किंतु असाध्य नही। आहिस्ता-आहिस्ता अभ्यास करने से आप इसमें परिपक्व हो जाएंगे! और जिस क्षण इसमें पूर्ण हुए आप!  मुबारक हो आप अमीर बन गए! संसाधनों पे डेडिकेटेड होना! अर्थात जितने भी संसाधन हैं आपके पास प्रथमतया उन पर अपना शतप्रतिशत समय और समर्पण दीजिये। धीरे-धीरे आपके वही संसाधन घनीभूत एवं पवित्र होते जाएंगे और आपकी स्किल भी बेहतर होती जाएगी। ये कही भी किसी भी क्षेत्र में सम्भव है। धनवान एवं समृद्ध व्यक्ति विनम्रतापूर्वक समाधान पर ध्यान देते ह...

अनाम यात्रा रहस्य..१

रवींद्रनाथ जी के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना है। एक साधक या ईश्वर-प्रेमी ईश्वर को बहुत तल्लीन होकर ढूंढता है; एक दिन अचानक वो ईश्वर के घर पहुंच जाता है; दरवाजे पर दस्तक देने ही वाला होता है। उसके और ईश्वर के बीच बस एक खटखटाहट! किन्तु वो दरवाजा खटखटाया ही नही,वापस लौट आया। ये छोटी कहानी बहुत सार लिये हुए है। बौद्धों का बोधिसत्व भी बिलकुल इसी तरह हैं। विवेकानंद की ज्ञानप्राप्ति के उपरांत भी पुनर्जन्म की इच्छा भी बिलकुल यही है। ये मेरे साथ भी हुआ,मैंने जिसको पूजा,जिसकी चाह बड़ी सिद्दत से की। उसे पाकर या पाने का अधिकारी होकर भी उसे त्याग दिया। ये वास्तविक क्रांति है जीवन की जो अनुभूत हुई... शायद इस कहानी से ये रहस्य खुल जाए..किन्तु नही अब वास्तविक रहस्य तो मैं समझा ही नही सकता किसी को,आपको भी नही। बस इशारा कर सकता हूँ,श्रम आपको करना होगा।

अनाम यात्रा रहस्य!

तुम्हें लिखूँ या त्याग दूँ, त्यागना तो मुश्किल है फिलहाल। 13 वर्ष हो गए जबसे मैं आपको जानता हूँ। इन वर्षों में कभी भी वासना की एक बूँद भी निर्मित नही हुई। मात्र प्रेम,मात्र साहचर्य, मात्र समर्पण। भोर का सूर्य रजनी में नहाकर निकलर ही प्रभाकर होता है। ये मेरे लिये मीमांसा है,आपका साथ दर्शन है एक अन्यत्र जगत का। ये साथ मुझे मुझसे मिलाकर मुझसे मुझको ही छीन लिया। क्यों,आखिर क्यों ये अभी भी अज्ञात है,हाँ किन्तु एक किरण है जो अत्याज्या आध्यात्मिक है..जो मुझे,मेरी आत्मा को मजबूर करती है इस पथ पर चलने को। मैं स्वयं को ही पुनरुक्त करने की कोशिश करता हूँ कि आखिर इतना बड़ा अचरज हो कैसे रहा है। क्या हमारा पुनर्जन्म हुआ है। या कुछ शेष रहा जिसे अशेष होना है। क्या आप माँ शारदा हैं। इस कहानी का आदि कहा हैं,हम मध्य मे मिले या हमारा आदि मिलन हुआ इत्यादि सैकड़ों प्रश्न। मैं खुद को ढूंढ रहा हूँ,मैं  खुद ही खुद को नही रोक पाता, क्या आप जादूगर हैं... अक्सर इन बातों का उत्तर मस्तिष्क देने में असमर्थ हो जाता है। सिर भारी हो जाता है। हाँ, आत्मा बिलकुल सहज उत्तर दे देती है। फिर भी आखिर क्यों, क्यों और क्यों......

तालिबान!

तालिबान का अर्थ ज्ञानार्थी होता! धिक्कार है ऐसे ज्ञानार्थियों पर! किन्तु यहाँ एक चीज है जो नवनीत है! जब ये जाहिल अपनी जाहिलियत से मात्र इनके आराध्य अल्लाह को स्वीकार करके विश्व में तांडव मचाने का ख्वाब पाल कर पूरे विश्व विजय की कामना करते हैं! तो क्या हम इनके विपरीत एक शान्ति एवं सद्भाव से युक्त विश्व के विषय में नही सोच सकते! मैं ये मानता हूँ कि इसके लिये हममे ज्यादा सामर्थ्य एवं धैर्यवान एवं सार्वभौमिक धर्म को विकसित करने की जरुरत है।

Dividend..लाभांश!

The date is 13-08-2021 I got my first dividends from Itc! Feeling nice! इस दिन के एक दिन बाद 14 अगस्त को मुझे ये ज्ञात हुआ कि मैं अपनी चैतन्य यात्रा के बेहद निकट जा चुका हूँ! जहाँ मुझे बचपन वाले स्वप्न के भेद तो खुलते नजर नही आये किन्तु वही स्वप्न वही आग वही भवन का जलना मैं स्पष्ट रूप से पुनः देख पाया और जब मैं जगा तो मुझे ज्ञात हुआ कि मैं ITC का लाभांश ₹104 भी प्राप्त कर चुका हूँ एक रोज पहले! अब मुझे प्रतीत होता है कि एक जन्मजात फोड़े की सम्पूर्ण मवाद बह सकती है। किंतु यहाँ मैं कुछ नही करूँगा बस द्रष्टा बना रहूंगा! ये लेख मात्र मेरी स्मृति के लिये है।

सम्यक व्यक्तित्व!..३

१-जीवन के किसी भी मोड़ पर किसी भी अच्छे विचार या तथ्य के विरुद्ध कभी भी कोई बहस नही करना चाहिए। इससे आपका व्यक्तित्व दूषित तथा मन दुःखी ही होगा। २-साईकल चलाने का अभ्यास करें एवं जब आवश्यक हो तभी किसी डीजल,पेट्रोल या अन्य ईंधन से चलने वाले वाहन का प्रयोग करें। इससे आपके धन एवं वक़्त दोनों की बचत होगी तथा स्वास्थ्य में बेहतरीन सुधार होगा।आपको जिम जाने की जरूरत नही पड़ेगी एवं पर्यावरण भी शुद्ध होगा। ३-आपके जीवन को संवारने एवं समृद्ध करने के लिये वो सलाह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है जो आप समान परिस्थितियों में किसी अन्य प्रिय व्यक्ति को देते हैं।

सम्यक व्यक्तित्व!...२

१-सुंदर आपकी देंह, चेहरा इत्यादि नही होता है। सुंदर होता है सत्य! सत्य परम सुंदर है,सत्य छोटे-छोटे अभ्यास से प्रारंभ होकर एक विस्तीर्ण रूप धारण करता है जो बहुत मधुर एवं मनोहर होता है। यदि आप सत्य का पालन कर रहे हैं तो आपको धर्म का मार्ग मिलेगा जहां आपको शांति एवं सुकून दोनों मिलेगा एवं आप निरन्तर नूतनता के बोध से जागृति के मार्ग पर अग्रसर होकर इस संसार से मुक्त होकर परमधाम को जायेंगे। २-यदि आप किसी समुदाय, समाज,राष्ट्र या विश्व में कहीं भी निवास कर रहे हैं तो आपको किसी भी ऐसे आचरण को धारण नही करना चाहिये जिससे आप बहुसंख्यक समूह के सद्चरित्र लोगों पर बोझ बने! आपको अपने आचरण से सदैव एक सुगंध प्रसारित करके शांति,सन्तोष एवं प्रेम की स्थापना करने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए। ३-आपको प्रकृति के प्रति सदा अनुग्रहीत भाव से समर्पित होकर उसके उत्थान एवं समृद्धि में जितना सम्भव हो सहयोग करके इस पृथ्वी को औऱ सुंदर हरा भरा बनाकर ही इस नश्वर शरीर का त्याग करना चाहिए।

सम्यक व्यक्तित्व!..१

१-यदि आप एक उदण्ड व्यक्तित्व के प्रवाह में हैं वर्तमान में तो कभी भी जब आपका व्यवहार एक......सरल,सहज,निश्छल,सहनशील एवं विनम्र व्यक्ति से हो तब आपको अपने व्यवहार से..उस व्यक्ति को उदण्ड होने पे मजबूर नही करना चाहिये। क्योंकि आप उसकी उदण्डता बर्दाश्त नही कर पायेंगे! २-यदि आपको कोई कष्ट दे रहा है तो अपने कष्टसहन की अंतिम सीमा को विस्तीर्ण करते जाइये एवं प्रत्येक बिन्दु पर अपनी अंतरात्मा से उसको क्षमा करिये एवं उसके प्रति करुणावान बने रहिये। यकीन करिये एक क्रांतिकारी घटना घटेगी और उस घटना को साक्षी भाव से देखिये निष्पक्ष होकर!...आपको परमानंद बोध होगा। ३-यदि आप किसी बच्चे के माता या पिता है तो प्रेमपूर्वक उसका पालन करिये एवं अपने जीवनसाथी से कोई तनाव मत पालिये।आप अपने बच्चे को कुछ मत बनाइये उसे स्वतंत्रतापूर्वक जीवन जीने दीजिये। आपका बच्चा अतिप्रतिभाशाली होकर संसार मे कीर्ति एवं यश को उपलब्ध होगा।

प्रवाह!..

जीवन में अक्सर हम कहते हैं,"हमारे पास पैसा नही! इसलिये हम कोई वस्तु खरीद नही पा रहे हैं!.." तो आप स्वयं को अभिशाप दे रहे हैं!  आप खुद को खुद की मेहनत से ये विश्वास दिलाइये.... आप दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति हैं औऱ जो भी काम दुनिया का सबसे अमीर आदमी व्यक्ति कर सकता है और अधिकारों का प्रयोग करता है या कर सकता है। "उसे आप भी कर सकते हैं।और करेंगे" तो आपको अमीर बनने से कोई नही रोक सकता! सादर "अहिंष्य"

नींद!

 दुनिया की बेहतरीन बातों में एक बात नींद भी है,नींद स्वास्थ्य एवं जीवन के लिये बहुत जरूरी है! जब कभी हम थक जाते है,या चिंतित होते है तब नींद ही वो सहारा है जो हमें सुकून दे जाती है! नींद हमेशा बुरी नही होती।

पुनर्नवा

जज्बातों से घिरा हुआ एक इंसान हूँ मैं,एक ऐसा आदमी जो ख्वाहिशें पाल कर जीता है! दुनिया रूपी रंगमंच पे अभिनय करता हुआ बहुत सारी आशाओं से भरा एक अभिनेता हूँ! मैं बहुत सारी उम्मीदों को पिरोया हुआ हूँ अपनी स्वांसों की माला में! भगवान को बहुत सारा धन्यवाद मुझे काबिल बनाने के लिये!हृदय से अपने वर्तमान को लेकर तसल्ली अभिव्यक्त करता हूँ!मुझे इस पथ पर जिसपर मैं चल रहा हूँ पूरे विश्वास के साथ चलना है! मेरा परिवार और समाज मुझे चाहे जिस नजर से देखे या देखता  हो फ़र्क़ पड़ता है किन्तु अभिव्यक्ति मौन है मेरी! जीवनपथ पे मिलने वाले कुछ मुसाफिरों से सम्मान एवं कुछ से अपमान मिलता रहता है,ये उनका व्यक्तिगत निर्णय है मेरा कोई अधिकार नही कि मैं उसे परिवर्तित करूँ या करने की कोशिश करू! जीवन एक अज्ञात यात्रा है अभी 28 वर्ष पूरे हो रहे है मेरे जीवन के,आगे का सफर भी योगेश्वर श्रीकृष्ण ही मुकम्मल करेंगें! हे न्याय के मालिक तुमसे पुकारता हूँ मैं मुझे कष्ट दो,तक़लीफ़ दो सभी रंग दिखाओ किन्तु मुझे इतना यकीन है कि एक न्याय अभी शेष है! और पूर्ण विश्वास है मुझे कि वो न्याय प्राप्त होगा मुझे!

ज़मीर का दम घुट गया!

 हा धीरे-धीरे मेरे जमीर का दम घुट गया! और मैं गृहस्थ हो गया!

सुसुप्त

 मैं आजकल लिखता नही कारण भी अज्ञात है! चलिये कोशिश करते है कि आखिर क्यों नही लिखता! शायद थकान या विषयवस्तु की कमी जो भी हो! विवाहोपरांत मेरे जीवन मे बहुत कुछ परिवर्तित हो गया! देखिये कब लेखनी होती है एक खास अंदाज में!

महाकाल!

सुनो पतीत प्रताणित प्राणी! एक बात तुम्हें बताता हूँ... तुम विनय नही तजना चाहे कुछ हो जाये.... गर प्राणों में हो हलचल शस्त्रों का आकर्षण मनभाये... फिर भी हे प्यारे बन्धु तुम शस्त्रत्याग नित-नित करना... हाँ हृदयविहंगम ज्वारों को  करबद्ध उबलने तुम देना... कोशिश कर ज्वारों को तुम तरल-प्रवाह में ले आना... गगन को देखना तुम तरल को देखना तुम क्रोधग्नि को शीतल करना तुम आहिस्ता-आहिस्ता एक क्षण आएगा... गगन भी अश्रुजल बरसाएगा तमस को शीतल कर जाएगा और हाँ एक दिन एकांत में रूदन होगा दुर्दांत... उसे बस बह जाने देना... गगन से कह जाने देना! और इस मंत्रजप को बारम्बार होने देना निर्णय वक़्त को करने देना तुम बस मौन ही रहना... देखना तुम,चमत्कार होगा पीड़क का विनाश होगा! अस्तित्व भस्मीभूत होगा औऱ तुम्हे ज़रूर दिखेगा वक़्त का न्याय, अन्याय के विरुद्ध! अन्याय के विरुद्ध काल के विहंगम रूप को  देखने का अवसर जरूर आएगा! जरूर आएगा! अध्यापक प्रभाकर!

पुकार एक शृंखला!

हे महामानव! जब-कभी तुम्हारा ह्रदय नेक कार्य करने के लिये स्पंदित हो, पहले तो उस स्पंदन की गति को साक्षी भाव से देखना! किसी से भी सहयोग के लिये मत कहना, नही तो तमाशा बन जाओगे! चुपचाप उसकी तीव्रता को अपने रोम-रोम में संचरित होने देना! और अकेले अपने पथ पर साधित कदम रखना! अपने अनुभव से सीखना! एक दिन ऐसा आएगा जब ये जमाना कदमताल करेगा तुम्हारे साथ! और वो दिन जरूर आएगा! सादर! अध्यापक प्रभाकर

अंत्योदय!

पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी का दर्शन है! समाज के अंतिम व्यक्ति का उदय या किसी भी सामाजिक सेवा का लाभ समाज का अंतिम व्यक्ति भी उतना ही पाए जितना प्रथम व्यक्ति! मेरे विचार से यदि तंत्र को पवित्र किया जाए तो पण्डित जी के विचार स्वतः लागू हो जायेंगे! एवं तंत्र के शुद्धिकरण के लिये शिक्षा एवं चिकित्सा ये दोनों महती भूमिका निभाते हैं! शिक्षा से शिक्षक एवं शिक्षार्थी तथा चिकित्सा से चिकित्सक एवं रोगी सम्बंधित हैं। शिक्षा एवं चिकित्सा ये दोनों मात्र प्रत्यय है स्थूल रूप से इन्हें विशाल बनाने वाले आधारस्तम्भ तो व्यक्ति ही है! व्यक्ति रोगी,शिक्षार्थी,चिकित्सक एवं शिक्षक या अन्य कोई भी हो सकता है। जिस समाज को उन्नति करनी है उसे सर्वप्रथम अपने शिक्षक और चिकित्सक को सर्वाधिक आदर देना चाहिए जिससे उनका उत्साहवर्धन होता रहे। कृषक का उल्लेख नही किया मैंने उसका कारण है कृषक बहुत महान होता है किंतु उसके पाल्यों को यदि शिक्षा नही मिली तो उसकी आने वाली पीढ़ी गुलाम होगी ये निश्चित है जो उसके लिये दुर्भाग्यपूर्ण होगा। किसान,शिक्षक एवं चिकित्सक यदि ये तीन ही समाज के प्रमुख रहेंगे तो समाज को पूरा विश्व आत्मसात क...

दर्पण

जाओ इस जगत से धरा से जुड़कर देखो आकाश.. तारे टिमटिमाते हुए दिखेंगे परन्तु ये टिमटिमाते हुए दिखने वाले तारे तुम्हारे नयनों की क्षमता के नाते हैं,असल में ये बहुत शक्तिशाली तेज से भरे हैं! ठीक तुम्हारा भी यही हाल है बेकार में बेहाल है अरे अपने अन्तस् के अंतर्गत दूर के तारे के करीब तो जाओ तब तुम जानोगे खुद की ऊर्जा को उमंग को तरंग को।। गिड़गिड़ाने से तुम्हें कुछ नही मिलेगा पहचानों खुद को,जानो तब मानो पथ पे चलो,पथिक नही योद्धा बनकर घृणा, द्वेष,ईर्ष्या,क्रोध,विषय, वासना से होशपूर्वक पार तो हो जाओ तुम्हारा कल्याण होगा जगतकल्याण होगा।। जाओ छोड़ो जानो मानो! अपनाओ इस नूतन पथ को! सादर प्रभाकर!

हंसिनी!

मैं अपने पुत्र को लेकर छत पर सो रहा था ज्येष्ठ की रात्रि में,तुम अजनबी थी, मेरे लिए एवं मैं भी तुम्हारे लिये, मैं सोता नही हूँ कभी भी,हाँ विश्राम करता हुँ, तुम्हारा आना तुम्हारा चद्दर उठा कर मच्छर से बचाने के लिये मुझे एवं पुत्र को ढककर फिर वहां से हट जाना! मैं मौन देखता रहा हे हंसिनी तुमको और अचानक एक तरंग उठी मेरे अंदर,मैं परिचित हुआ उसी क्षण आपसे! हे हंसिनी तुम महाश्वेता हो!
जो तुमको संकर्षण से द्विज रूप दिलाये,खुद को वो अपनी कठिन डगर के कुछ हालात कहो, कुछ बात कहो!

३३अंक!

ये बात २०१४ अप्रैल की है;मैं परीक्षा दे रहा था, स्नातक तृतीय वर्ष का;समाजशास्त्र का। परीक्षा कक्ष में बैठा था मैं,मैं अंग्रेजी भाषा में लिख रहा था १३ मिनट हुए थे परीक्षा कक्ष में लिखते हुए... तभी अचानक मुझे मेरे एक मित्र की कही हुई बात याद आई! "प्रभाकर! तुम १००/१०० बहुत बार पाए हो; कभी परीक्षा में ३३ अंक,जो न्यूनतम अंक है उत्तीर्ण होने के लिये,पाओ बस इतना ही लिखना परीक्षा में।" तभी मेरे एक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर डॉ आर के यादव, कक्ष निरीक्षण के दौरान मुझसे पूछे,"प्रभाकर क्या हाल है?" मैंने उत्तर दिया," ठीक हूँ सर!" वो आगे बढ़े,२ कदम बढ़े होंगे कि मैंने उन्हें बुलाया,"सर! सुनिये!" वो बोले,"हाँ, कहो! क्या है।" मैंने कहा उनसे,"सर ज़रा देखिये,ये जितना लिखा हूँ,३३अंक मिल जाएंगे इससे १००अंक में!" उन्होंने देखा और कहा "हाँ मिल जाएगा!" मैं तत्क्षण उन्हें अपनी उत्तर पुस्तिका दे दिया! "सर हो गया,जमा कर लीजिए.." ये राजीव गांधी स्नातकोत्तर महाविद्यालय जगदीशपुर अमेठी की घटना है! ....जारी रहेगा....

भगवान के वचन!

मैं तुम्हें एक जीवन के गहरे कानूनों में से एक बताता हूं। तुमने इसके बारे में बिल्कुल नहीं सोचा होगा। तुमने सुना होगा  और पूरा विज्ञान इस पर निर्भर करता है कि कारण और परिणाम आधारभूत नियम है। तुम कारण निर्मित करो और परिणाम अनुसरण करता है। जीवन एक कारण-कार्य कड़ी है। तुमने मिट्टी में बीज डाल दिया है और वह अंकुरित होगा। अगर कारण है, तो वृक्ष पीछे चले आएंगे। आग है: तुम उसमें अपना हाथ डालोगे तो जल जाएगा। कारण है तो परिणाम अनुसरण करेंगे। तुम ज़हर लो और तुम मर जाओगे। तुम कारण की व्यवस्था करो और तब परिणाम घटित होता है। यह एक सबसे बुनियादी वैज्ञानिक कानूनों में से एक है, कि कारण और परिणाम जीवन के सभी प्रक्रियाओं की अंतरतम कड़ी है। मान लो एक ऐसी स्थिति बनी है जिसमें तुम खुशी से भर गए हो। एक दोस्त आ गया है, या प्रेमिका का संदेसा आया है। एक स्थिति कारण बनी है – तुम खुश हो। खुशी परिणाम है। प्रेमी कारण बना है। धर्म कहता है: खुश रहो तो प्रेमी आता है। परिणाम पैदा करो और कारण पीछे चला आता है। मैं तुम्हें राज्यों के बिना राजा बना सकता हूं , तुम सिर्फ राजाओं की तरह अभिनय करो, और इतनी समग्रता स...

शराब!

ये भी एक प्यास ही है मेरी कि जीवन-जगत से दूर रहूँ पहचान ही न हो कोई... आरम्भ से प्रारंभ करूँ... किन्तु ये विशेष नही बस एक कीमिया है जो परिवर्तित हुई है मध्यम हो जाना ही विकल्प बचा.. सूत्र पकड़ने के लिये... और जैसे ही मध्यम का ज्ञान होगा... चक्रण से मुक्ति मिलेगी किंतु इस मुक्ति की आसक्ति न होना जरूरी है! आँख मुंदने के पहले आंख मूंदे अगर स्वतः तो क्रांति सम्भव है

प्रवाह!

लेखन सहजता से ही हो पाता है! आप जब विश्रांति में होते है तभी कुछ लिख पाते है! कई दिनों से या ये कहिये महीनों बाद थोड़ी सी विश्रांति मिली मुझे। आगे..... अब शायद लेखन अनवरत चले कुछ दिनों तक।

मैं आऊंगा!

मैं आऊंगा, मुक्त होकर तुमसे मिलने! तुम प्रतीक्षारत हो! ज्ञात है मुझे! अभी बोझ है सिर पर अभी मिलन मिलन जैसा न होगा! अभी मैं विसर्जित नही हुआ है अभी तमस से युक्त हूँ! निशा तेरी वेदना का ज्ञान है मुझको उम्र है मेरी जलन की नित निरन्तर अनवरत! उम्र की संध्या में तुममे एक होना है मुझे! उम्र की.... आऊँगा मैं तेरे चरणों की धूल बनने तुझपे मर मिटने! आऊँगा,ये निश्चित है। मिलन हमारा शाश्वत है।। तुम्हे महसूस करता हूँ अधूरी साँस में मैं नित्य इन साँसों के पूर्ण होने तक मैं आऊंगा खुदको मिटाकर! आऊँगा,अभी संसार छट रहा है अभी आलोक की प्रतिबद्धता है निशा में मिल के मुझको... है करनी उम्र पूरी! कहानी चल रही है जन्म नही अब शेष है! ग्लानि नही है रंच मात्र तुम समझोगे मुझको।। यकीं है मुझे! तुम्हारे द्वार पर दस्तक दूंगा मैं, हा आऊंगा मैं!

अदिती

बुदबुदाहट हो रही है आहिस्ता आहिस्ता बर्फ पानी हो चुका है भाप भी हो जाएगा! ताप की दुनिया, निरन्तर हो चली वर्तुल भयंकर तुम क्या समझोगे बगावत प्यार में होता है क्या! जिंदगी है नित-निरन्तर अनवरत आवेग में... कही है फ़ैलाव-सी ये कही एक सिकुड़ाव है.. या कही  है एक दलदल मच रही है रोज हलचल मैं हुआ अब मौन तुमसे कुछ नही कहना हमे जो भी कहना था हमे हम कह चुके तुमसे...हे प्रियतम! भाग्य को है अब नमन हाँ भाग्य को है अब नमन! अब न कोई काश है अब न कोई आश है दुख की या संघर्षों की रजनी से देखो पार हुआ पतवार मिला,पतवार मिला आया प्रभात आया प्रभात सन्ध्या का मुझको ज्ञान हुआ ये प्रखर रश्मि कुछ पल की है रजनी अखण्ड अनवरत रही अस्तित्व इसी से है सबका फिर क्यों प्रभा से दूर रही?.......... सत्य है प्रिय इस निरन्तर धार की अद्विती हो तुम! किन्तु दुनिया की रीति रही है कुछ ऐसी जो प्रत्यक्ष नही होने देती! तुम ही समझो श्रेय है ये जगत ये समझे न समझे पत्र की भी पात्रता मैं खो चुका हे! मेरे प्रियवर! जब द्वय ही नही रहा है शेष! संसार का मैं अभिषेश! कैसे कविता सम्पूर्ण करूँ मैं छं...

अब बस!

काश कि कोई "काश"होता! दरम्यान हमारे तुम्हारे! किन्तु अब आस भी नही तो "काश!" कैसे होगा! हा अनन्त हो तुम अब मुझमे साथ नही है बस ये जानो! सत्य ये भी है कि मेरी पात्रता भी नही है साथ की! और अब......बिखरा हुआ-सा मैं न जाने कितने चेहरे गुजरे हैं मुझसे होकर! न जाने कौन-से रास्ते होंगे न जाने कौन सी मंज़िल होगी! तुम हो! तुम रहोगी मुझमे! एक द्वीप जैसे रहता है सागर में ही किन्तु जुदा-जुदा! न जाने तुम कौन थी न जाने राह कौन थी! मै तो गया ! मय में हु मैं भय नही है कोई लय में हूँ मै न राधा न रुक्मिणी कोई नही मिली मैं तो मीरा के संग हो चला! नही मैं कृष्ण न ही मैं राम! अदना-सा आदम! जाओ तुम दूर इस सागर से द्वीप काश की कोई अगस्त होता जो द्वीप को मुकम्मल कर देता!

माँ

कोई नही आएगा तुम्हारे पास,कोई भी नही, ये हो सकता है कि तुम्हे लगे कि एक भीड़ गुजर रही है तुम्हारे इर्दगिर्द.... उन्हें अपना मत समझना,अपना समझने की भूल मत करना!ये आवागमन जारी रहेगा आत्मतत्व से सभी एक ही पेड़ के पत्ते हैं! वो पत्ते जो कभी मिलते नही एक दूसरे से उनका काम है बहना! हवाओं के साथ ,उनका काम है झूमना फिज़ाओं के साथ! तुम भी झूमो तुम भी चूमो माँ है सृष्टि ! माँ है शक्ति माँ ही सारा जीवन है! रक्त कणों में बहता समय है! और समय ही आत्मा है!

नीर

समय? ये भी कोई चीज है एक मुसाफिर जा रहा है... और कहीं पे आ रहा है बीच मे है कुछ नही बस संगी-साथी मरहमी हैं किन्तु है ठहरा नही कुछ चल रही है ये फिजा... क्यों है? किसको है पता.. कुछ लिखावट ऐसी है जो बाद में समझूंगा मैं मैं नही समझा रहा पदचिह्न छोड़े जा रहा।। राह में है कुछ मुसाफिर ऐसे भी मुझको मिले.. वो मिले या न मिले ये और बात है...पर मैं? मिले और गले मिले जा रहा आनन्द मिलन के गीत गाते जा रहा।। सदियों से कइयो ने लिखी है अधूरी दास्तां... मैं भी कोशिश में हूँ कि... इक पूरी तो कर जाऊं यहाँ... ज़िद ये पूरी हो गयी. नज़रे मिली जिस दिन मिरी.. तुमको हो या हो न ये एहसास मुझको हो गया रास्ते का एक मुसाफिर रास्ते में खो गया.... तुमको पीया है मेरी नज़रो ने इतना हे प्रिये हर तरफ श्रृंगार का मंजर मुझे दिखने लगा खो दिया हूँ इश्क़ में सारी जमा पूंजी यहाँ पा लिया नयनों में तेरे पल में ही सारा जहाँ... माना मैंने धीर की,तुझमे कमी कोई नही मैंने भी तो धीर का निर्माण है छोड़ा नही प्रिय-मिलन में कोई भी हो पथ मुझे मंज़ूर है तुमपे कोई आंच आये ऐसा हो सकता नही रिश्ता ये जन्मो...

ऐ-ज़िन्दगी!

ज़िन्दगी अप्रतिम है.. बीत जाती है, समझ नही आती कहीं दूर-दूर तक यातनाओं और पीड़ा का सफर कहीं बर्फ के तीखे एहसास-सी समझ आती है... समझ, ज़िन्दगी और उलझन ये तीनों घनिष्ठ मित्र हैं.... जैसे-जैसे समझ बढ़ी ज़िन्दगी घनीभूत हुई और फिर उलझनों का अपार संसार विस्तृत होता है... सत्य सदियों से वैरागी रहा है झूठ सदियों से भोग के जकड़न में रहता है किन्तु दुर्भाग्य ये है कि झूठ ने सत्य को कैद कर दिया है... सत्य को प्रताड़ित किया है... झूठ के पास वस्त्र होते हैं... सत्य निर्वस्त्र होता है.... इसलिये जब भी सत्य झूठ के मोहल्ले से होकर गुजरा...झूठ ने उसे असामाजिक घोषित करके उसके पांवों में बेड़ियाँ डलवाया मारा-पीटा सूली पर चढ़ाया.. अधिकतम ज़िंदगियाँ मुझे सरकारी कार्यालयों की धूल से चिपटी-लिपटी ज़िल्द-सी ही दिखती हैं... ज़िन्दगी तू सचमुच एक रहस्य है रहस्यों का रहस्य हैं! और ऐ-ज़िन्दगी तूने सत्य को इतना अकेला क्यों कर दिया!

काला जादूगर

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वो शायद प्रेम से तबतक न परिचित रही हो मैंने ही उसे प्रेम करना सिखाया.. प्रेम की एक-एक सूक्ष्म सत्ता से उसका परिचय कराया। हम दोनों में कौन ज्यादा समझदार है ये बात अभीतक अज्ञात है हम दोनों ने साथ-साथ शादी के हसीन ख्वाब देखे एक वादियों भरी बस्ती में घर बसाने के ख्वाब देखे.... ऐसे ही वक़्त गुजरता जा रहा था हम इश्क़ का रसपान कर रहे थे पूरी दुनिया को भुलाकर... इसी प्रवाह में एक दिन हमदोनों से सफर में एक भूत मिला बहुत बुरे हालात लग रहे थे उसके,किन्तु था वो बहुत शक्तिशाली....... वो एक काला जादूगर था और बहुत निर्दयी भी था उसके साथ के प्रारंभ से ही हमारा प्रेम घृणा का रूप लेता गया और एक दिन हमे बिछड़ना पड़ा हम अब एक दूसरे की शक्ल तक नही देखते बात-चित तो दूर की बात है... हा हमारी तन्हाई में वो भूत हमारे साथ रहता है.. वो भूत है समाज!

रिश्तों की समझ!

सचमुच हर रिश्ते की एक उम्र होती है... वैसे ये भ्रम रहता है रिश्तों को अबाध और अनन्त होने का किन्तु......ये मात्र भ्रम है... जब दो मिलते हैं तब रिश्ते बनते है एक  नाम मिल जाता है प्रत्येक रिश्ते को..... फिर इसे सच्चे और झूठे के तराजू पर तौला जाता है.... परन्तु सच्चे रिश्ते तो आसमान में बनते हैं और आसमानी रिश्ते हमे आमतौर पर नही दिखते हैं। इसका मूल वजह जानना चाहता हूं कि क्यों? अन्तस् से आवाज आती है.....'समझ' और पुनः मैं एक निष्कर्ष पर आता हूँ  आदमी कम समझदार..... और वैज्ञानिक उन्नति मुझे दो थप्पड़ मार के सुला देती है।

भय!

बहक जाते है अक्सर लोग जब वो किसी से अत्यधिक स्नेह करते है स्नेह आत्मा को जगाने का काम करता है लेकिन समाज सदियों से स्नेह के विपरीत रहता है और इस तरह से समाज स्नेह को,विशुद्ध स्नेह को कुचल देता है, बड़ी बेरहमी से कुचल देता है। स्नेह बिल्कुल सरल होता है,स्नेह एक सहज भाव है जो स्वस्थ्य चित्त में उपजता है.....बिल्कुल सौम्य है स्नेह का रूप। आज के दौर में स्नेह दिखता ही नही और यदि दिखता है तो बहुत कम है इसकी मात्रा। लोग यन्त्र हो गए हैं यंत्रवत व्यवहार करते चले जा रहे हैं। ये यंत्रवत्ता त्यागे बगैर कैसे हो प्रेम से परिचय। मुझे बहुत कम लोग मिलते है जो प्रसन्न हो सबके सब शिकायतों से भरे हैं,मैं भी भर गया हूँ शिकायतों से इन लोगों से मिलकर। मैं कभी-कभी रुकता हूँ किसी भीड़ से भरी सड़क के किनारे, खड़ा हो जाता हूँ और गौर से देखता हूँ लोगों को,लोग मुझे नदी के बहाव में बहते दिखते हैं तड़पते दिखते हैं..... सब एक आपाधापी में लगे हैं भयंकर आपाधापी। मेरे मन मे ख्याल आता है कि किसी को रोकू सहज होकर उसके हृदय की हाल सुनु,अपनी कहूँ मैं कह-सुन भी पाता हूँ ये सब जो गरीब होते हैं,अमीरों क...

भँवर!

दर्द लिख दूं मैं एहसास लिख दूं मैं मगर कैसे लिखू वो ख़्वाब जो टूटा हुआ-सा है... कहा था कि नही कुछ होगा मुझे तेरे जाने के बाद बहुत कुछ टूट कर देखो यहाँ, बिखरा हुआ-सा है... ये कैसे चल रही सांसे ये कैसे बह रही आहें तुम ही तुम हो यहाँ देखो तरसती जा रही आँखे... ये शब्द भी अवसाद हैं जीवन-डगर की प्यास है कि तुम नही मिली मुझे गिला नही कोई मुझे... मगर कोई है मुझमे जो मेरे बाद भी रोता है मैं लाख सुलाता हुँ वो हरगिज नही सोता है.... कभी-कभी जी मे आता है वीरान जंगल सा जलता जाता है मेरे अंदर एक दावानल ये कब बुझेगा..... सांस और तुम हमेशा साथ आती हो, दिखाई दो या न दो हमेशा पास रहती हो... कि मैं बावरा हुआ-सा भागता जा रहा हूँ मगर तुम और तुम्हारी यादे मुझे भागने नही देती.... ये आंखे अब कभी यूँ ही मैं मूँद नही पाता इन काँपते हाथों से ज्यादा लिख नही पाता.... ये ज़िन्दगी मेरी अब दोस्त बस मेरी नही रही तुम्हारे बाद इसमें अब हज़ारों लोग बसते हैं.... और मैं अपाहिज होकर देखता ही रहता हूँ बस देखता-देखता-देखता सा गुजर जाऊँगा मैं इस भँवर से।।

प्यार की गृहस्थी!

प्यार गृहस्थ का घर होता है वो बड़े संघर्ष के बाद निर्मित होता है प्यार के निर्माण में प्रेमी सब कुछ दांव लगाता है। ये सब कुछ आसान नही होता प्रेमी की पहचान मिट जाती है जमाने की गालियों से मुकाबला करता है वो बड़ी श्रद्धा से विश्वास से युक्त प्रेमी स्वयं में परमात्मा को अधिस्थित करता है.. स्वाभाविक प्रक्रिया है प्रेम बाकी सब,प्रेम के अतिरिक्त जैसे घृणा, द्वेष डाह इत्यादि विशिष्ट है क्योंकि इसे मनुष्यों ने बनाया है! इन्ही की विशिष्टता के कारण दुनिया जटिल है अत्यधिक जटिल..... इस प्यार की गृहस्थी का सबसे बड़ा सत्रु है अविश्वास,शंका एवं सन्देह!

मैं ही मुझसे...यूँही!

रहना है तुमको इसी जगत में रहना है यूँही रोकर-हंसकर तुम हो अनूठे विरले हो... पीड़ित हो रोगों से तुम... अपनों से और परायों से। किन्तु तुम्हे ये याद रहे... जो पीड़ित है वो तुम नही हो वो मन है और मन का मनुष्य है! और तुम मनुष्यता से भी परे एक अनन्त चैतन्य हो... अतः पीड़ित न रहो, जो भी पीड़ा है ये पुष्प बनेंगे और ये पुष्प भी मात्र दो दिन बाद झड़ जाएंगे.... और झड़ने के बाद फिर पीड़क और पीड़ित की ये सृंखला पुनः प्रारम्भ हो जाएगी.... इसलिये अनुग्रह का भाव मत त्यागना चाहे कोई भी विपदा हो आपदा हो अपने रोम-रोम को अनुग्रह से भर देना बल्कि उनको ज्यादा जो तुम्हारे पीड़क हैं इसलिए कि वो तुम्हे तुम्हारी चेतना से मिलाते हैं! जब तुम यूँही जीवन प्रवाह में बहोगे निर्विकल्प,निर्विवाद एवं अनासक्त! ये जीवन-चक्रण की सृंखला टूट जाएगी और तुम अंतरिक्ष मे समाहित हो जाओगे! इसलिए तुम मेरी ये समस्त बाते याद रखना! तुम्हारा! सार्थक साथी! जो तुम्हारे साथ अनवरत काल से है!

आँसू

आँसू! जब समस्त व्यथा का निचोड़ आंसुओं से अभिव्यक्त हो जाये! कर्म-कल्मष सारे पाप धुल जाएं वो पल सुखमय हो जाये आँसू नयनों में आएं! अट्टहास से ज्यादा मुझको आँसू ही भाते हैं.... तुम करते हो मन को भाररहित पीड़ा बह जाती तुम संग! तुम अद्भुत सखा हमारे हो हे आँसू आते रहना मन को सहलाते रहना!

दिवानगी!

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प्रेम ही मेरा धर्म प्रेम ही मेरी जाति है प्रेम में मैं हमेशा अधिस्थित रहा, बचपन से माँ का प्रेम नही छूटा। माँ मेरे अंतरतम में जीवित है... जीवित रहेगी मेरी आखिरी सांस तक। माँ प्रकृति होती है पुत्र पुरूष होता है माँ से छूटना दुरूह है या ये कहिये बेहयाई! स्मृति भी प्रकृति का अंग है और हे प्रिय! तुम्हारी स्मृतियां जाती ही नही। तुम भी माँ हो और मैं तुम्हारा दुलारा पुत्र मैं अपने व्यवहार में अतिरेक कर सकता हूँ! तुम्हे रिझाने के लिये!कि तुम मेरे पास रहो माँ की तरह! पिता भी माँ में समाहित हैं,पिता जैसी जिम्मेदार बनके मुझे परिवार की "अनुभूति" कराओ! मेरे अंतस में अपार पीड़ा है अपनी एक झप्पी लगाकर मेरे प्राण को मुक्त कर दो! क्योंकि मुझे नही रहना अब इस धरा पर मैं बस तुम्हारे स्नेह के इंतज़ार में रुका हूँ सांसो को बेबस होकर देख रहा हूँ स्वांसों से सटी आत्मा की तृष्णा हो तुम और जो मुक्त कर दे प्राण को वो "निर्वाण" भी हो तुम! तुम्हारे पाँव आएँगे मेरे पास मेरी कोई दहलीज़ नही! तुम्हारी इच्छा बस तुम्हे मेरे तक मेरे प्राण तक, पहुंचा देगी! इंतजार में ही ...

आपकी एक मुस्कान!

बातो-बातो के दौरान मुझे एक दिव्यानुभूति हुई सामने आपके बैठा हुआ मैं और आपकी एक सहज मुस्कान! योगेश्वर श्री कृष्ण द्वारा दिया गया एक अतिश्रेष्ठ उपहार.... आपकी वो सहज मुस्कान। तपस्या का फल मिलता है मैंने तपश्चर्या में तमाम उम्र गुजारी उसका प्रतिफल आपकी अद्भुत सौम्य मुस्कान! वो मुस्कान मेरे ज़हन में ज़िंदा रहेगी, फलेगी फूलेगी मेरे मरने के बाद भी मेरे प्राणों की अनुभूति संग अखण्ड रहेगी। आपका आश्चर्य भरा प्रश्न आपका दरवाजे पर ख़ड़े-खड़े मुझको अंदर ले जाकर बिठाना.... इतनी गहन अनुभूति कि मुझे अब कोई ख्वाहिश नही रही अब आप अंतर्निहित हैं मुझमे... बस अपनी मुस्कान को गले लगाकर कठिन-से कठिन लक्ष्यों में लगे रहिये क्यूंकि मुझे देखना है वो दिन जब आप अपने जीवन के समस्त लक्ष्यों को बहादुरी से प्राप्त करे! और अपनी जीवन यात्रा की सार्थकता को हासिल करें! आपका अहिंष्य!

अकेलापन एक घाव!

जब मैं अकेला होता हूँ, जब कोई नही होता है मेरे एहसास में.... एक समुंदर में उतरता हूँ मैं जिसका पानी खारा नहीं मीठा होता है...... ये मीठा जल मेरे समस्त कड़वे तमस को समाहित कर ले जाता है स्वयं में.... और उस वक़्त मुझे सबको त्याग कर.. अकेले और अकेले बस अकेले चलने का जी होता है! सारे रिश्ते मुझे स्वांग लगते है उस वक़्त...जितना करीब रिश्ता उतने ही जटिल घाव.... ये घाव ऐसे हैं जो मरहम से नही वक़्त के साथ ठीक होते हैं... घाव का डर नही मुझे घावों से भरा इतिहास है मेरा और घावों से भरा भविष्य भी होगा... अकेलापन भी एक घाव ही है एक विशिष्ट घाव... काश! ज़िन्दगी भी माँ की तरह होती सन्तोषी माँ की तरह...जिसने आजतक मुझसे कोई शिकायत नही की! किन्तु ये असम्भव है ज़िन्दगी माँ नही अपितु पिता की फटकार है फ़टकार... ज़िन्दगी का भी कोई चरित्र नही ज़िन्दगी चरित्रहीन है....एक तवायफ़ है... जो बदलती रहती है बहती रहती है कभी इस ओर कभी उस ओर... ज़िन्दगी को फ़र्क़ नही पड़ता अकेलेपन से दर्द से,उलाहनों से! ज़िन्दगी तो बस पीसती रहती है नए-नए रंग से नए-नए ढंग से... इस पीसती-पिसाती हुई ज़िन्दग...

कब्ज़!

क्या ये जो मैं लिखता हूँ ये यूँही है? या इसका कोई उद्देश्य है!ये प्रश्न मुझे परेशान करते हैं कभी कभी!तब मैं आसान-सा जवाब दे देता हूँ इन प्रश्नों को ज़िन्दगी का हवाला देते हुए। ज़िन्दगी भी तो हम बेवजह ही जीते हैं,है कोई जानता कि जिंदगी का एक-एक पल जो व्यतीत हो रहा है इसका उद्देश्य है या उद्देष्यविहीन है। फिर मैं जवाब भी यथेष्ट देता हूँ इन प्रश्नों का;कि मैं उल्टी करता हूँ अपने विचारों का जिससे मुझे कब्ज़ न हो! क्योंकि कब्ज़ मेरे मुल्क में ८०% लोगों को है। मैं अपनी कब्ज को ठीक कर लेता हूँ लोगों की फ़िक्र करने वाला मैं होता ही कौन हूँ! मुझे तो मेरे मैं को भी विसर्जित करना है और कर रहा हूँ नारायण के संरक्षण में। एक बात जो ध्रुव-सत्य है कि व्यक्ति का मित्र भी एवं शत्रु भी वो स्वयं ही होता है।चुनाव निर्धारित करता है आगामी जीवन। हम सुधरंगे नही किन्तु अभिलाषा है सम्पूर्ण जगत सुधार ले।         बात जब देश की आती है तो मुझे तंत्र और तंत्र-संचालन देख कर घृणा होती है। चार वर्ग राष्ट्र में अगर ढंग से कार्य करे तो लगभग ९०%  समस्या वैसे ही सुधर जाएगी पुलिस, एडवोकेट, शिक्ष...

उत्सुकता!

जीवन एक प्रवाह हुआ है यही सत्य है बाकी मिथ्या! स्वप्न ही यथार्थ हुआ है... तुम हो भी या हो तुम मिथ्या! तुमसे कब मैं मिल पाऊंगा मन मे मची है एक खलबली! क्यों आखिर ये है बेचैनी क्यों आखिर हर घुट स्वांस की नाम तुम्हारा लिये हुए है! क्या "रहस्य" है जीवन का तुमसे है सम्बन्ध मेरा क्या? आती-जाती स्वांसों से बस.. अब यही प्रश्न है शेष रहा...। तुम प्रतिपल हो, तुम जीवन हो तुम्ही प्रेयसी तुम दिव्यानी! मेरा, तुमसे जीवन विलग नही है तुम ही हो बस तुम ही तुम हो... मैं हूँ कहाँ?यही उत्सुकता बस मन मे है! मैंने जीना छोड़ दिया है डर के नही, मिल के तुमसे तुम जीवन-सरिता में प्रिय पतवार हो-रखवार हो।। वक़्त मिले गर तुमको प्रिय, एक बार बस मिलने आ जाना... क्या-क्या सोचा-जिया तुमने, एक बार आकर बता जाना! मेरे जाने के पहले तुम... बस यही "रहस्य" सुलझा जाना।। रोएं-रोएं की अनुभूति को मुझको तुम समझा जाना!

प्रेम एक महादान!

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प्रेम प्रस्फुटित होता है हजारों विपदाओं को सहर्ष स्वीकारने के बाद। प्रेम प्रस्फुटित होता है जब पाने की कोई अभिलाषा शेष न हो।मसलन त्याग और प्रेम एक दूसरे के पर्याय हैं या दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।यूँ तो प्रेम ढाई अक्षर का शब्द हैं मात्र किन्तु वृहद पैमाने पर इसकी धारिता असीम होती है।प्रेम परमात्मा को प्राप्त करने हेतु एक सोपान है और आवश्यक सोपान है;बिना प्रेम के परमात्मा की कल्पना भी नही की जा सकती।     ये आवश्यक नही है कि प्रेम प्रेयसी से या प्रेमी से ही हो बल्कि प्रेम तो एक अवस्था है हमारी चेतना का,जब हम प्रेम में होते है तो लुटाते हैं, जो कुछ भी हो हमारे पास और जब हम बुद्धियुक्त होते है तो पाने के फिराक में रहते हैं।    इसलिए प्रेम एक महादान है जो हम किसी को देते हैं और एक बात प्रेम की गणित बिल्कुल उल्टी है जो बाटने से बढ़ती है..     हमें सिखाना होगा प्रेम अपनी पीढ़ी को,आगन्तुक पीढ़ी को क्योंकि प्रेम ही वो विकल्प है जिससे संघर्ष विसर्जित होता है। दुनिया के समस्त संघर्षों के अस्तित्व के मूल में प्रेम का अभाव है।दुनिया के समस्त संघर्ष मात्र वर्चस्व के ...

आँखे!

नयन आपके थे, अनवरत साधिका के.. नयन मेरे भी थे... हमेशा से झुके-झुके! प्यास थी मुझमे जन्म-जन्मों की आपमे स्थिरता है युगों-युगों से देखने के बाद आपको पहली मर्तबा.. नयन हैं पुंसवित करते नित-नित कुछ... समय के साथ-साथ प्रिय झुकी नजरों का आदी 'मैं' विसर्जन में लगाया खुद को वासना के निर्मूलन में.... हुए परिवर्तन नित-नूतन रही नही कोई "आकांक्षा" अब किन्तु-किन्तु-किन्तु..... अब मैं आपके साथ हूँ अनन्त काल तक अखण्ड... बस तबसे, जबसे नयन मेरे मिले नयन से किसके? आपके नयन से! दो नयन मिले बस की मेरी सांसारिक मृत्यु हो गयीं... अब मेरी आत्मा आपकी आत्मा में स्थापित है..... प्रभाकर अब निशा की अखंडता में अहर्निश निद्रा में सो रहा है.... निर्द्वन्द्व, निर्विकार, निर्विकल्प!

खत..९

दिन भर चलता रहता हूँ एक क्षण नही रुकता हूँ ना काहू से दोस्ती! ना काहू से बैर.... क्यों क्योंकि मैंने अनुभूत किया है आपको रोम-रोम से आत्मा तक! आपको पाने की अभिलाषा भी नही न ही खोने का डर... आपकी छवि,मुस्कान,माधुर्य ये औषधि हैं मेरे लिये आपकी एक तसवीर भी नही मेरे पास किन्तु आप सजीव विचरण करती हैं..मुझमे.. क्या होगा ये अज्ञात है किन्तु मेरे वर्तमान में आप हैं और अनवरत रहेंगी,, आपकी यादों के साथ ही मेरी आँख आखिरी बार मुंदी जाएंगी...... आपका और सिर्फ आपका! अहिंष्य!

खत-८

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मैं प्रेमी हो ही नही सकता! मैं गुरु होकर ही जन्मा हूँ मैंने आपसे प्रेम कभी किया ही नही छल किया,प्रति पल छल... लेकिन गुरुत्व के रूप में मैं शतप्रतिशत समर्पित था,हूँ और रहूँगा। विरह,मिलन इत्यादि मेरे लिये शब्द मात्र हैं मेरे पास हृदय नही प्रेम वाला! किन्तु हाँ; मेरा छल आपके विशिष्टीकरण हेतु रहा... सब कुछ मेरे बस में था किंतु मैंने बेबसी का स्वांग रचा इसलिए कि आप इतिहास रच सके.... मेरा क्या है,मेरी फिक्र मत करियेगा.. क्योंकि इस संसार मे कोई भी मेरे साथ चलने कि हिम्मत लेकर नही पैदा हुआ न होगा तो आप क्या चीज हैं! ईश्वर आपको स्वस्थ रखेंगे इस वर्ष आपको इतिहास रचना है अपने काबिलियत से... मैं एक पथभ्रष्ट गुरु हूँ इसलिए निश्चिंत रहिये आप को या आपके साये से भी गुरुदक्षिणा नही मांगूंगा! आपका सखा(एक कपटी! Flrtatious)

परिचय!

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मैं मस्त हवाओं का आज़ाद परिंदा हूँ.... उड़ते-उड़ते उड़ जाऊंगा! फिर ना मैं वापस आऊँगा........ मर जाऊंगा जीकर जीवन तृष्णा सारी पी जाऊंगा।। नीलकंठ जब हो जाऊंगा विष समस्त! हाँ समस्त! निगल कर उदर में भी जाने न दूंगा! उड़ते-उड़ते उड़ जाऊंगा जख्मों को मरहम न देकर गहरा जख्म दिये जाऊँगा! फिर ना मैं वापस आऊँगा!

यूँ ही!(एक श्रृंगार पुकार)

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यूँ ही कुछ प्रारंभ करू मै तुम भी कुछ समझाओ ना भूली-बिसरी बाते हैं बस तुम तो सांसो में चलती हो। क्या लिख दू? कैसे लिख दू? कि तुम दौड़ी चली आओ ना मन मेरा वीरान हुआ-सा सहम-सहम के रह जाता जन्म-जन्म की सारी तृष्णा पल भर में मिटवाओ ना।। इतना सन्नाटा जीवन मे तूफ़ान पुकारता है....आओ प्रिय आ जाओ प्रिय मन कि मैल धुलाओ ना। वैराग्य! जो उपजा है मन मे उसको अखण्ड बनवाओ ना।।

काली

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तुम काली जैसी जिद पर थी मैं बस विष्णु-सा बन बैठा था... जब मैं शंकर बन लौट आया तेरी ममता को छोड़ आया। अब छोड़ तुम्हारा ज़िद्दीपन मुझको अपनापन स्मृति होता... एक सूर्य चला-सा अनवरत एक भाल चूम के दिवंगत। एक यक्ष प्रश्न प्रताड़ित करता उर को किस नेत्र से तुमको देखूंगा। हा आँख मूंद लूंगा मैं प्रिय हा राह त्याग दूंगा मैं प्रिय!

निठल्ला!

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मुझे मत याद करिये मैं निठल्ला हूँ... नींद बड़े तप के बाद मयस्सर होती है। नींद से क्यों प्रेम है मुझे नींद मृत्यु-सी है सवेरा जन्म जैसा है। यूँ तो दर-दर की ठोकरें आहिस्ता-आहिस्ता मुझे मुकम्मल करती जा रही हैं। कभी-कभी चिंतित होता हूं आप मेरा साथ निभा पाएंगी की नही... क्योंकि कइयो ने निभाने का स्वांग रचा कर मुझे परित्यक्त कर दिया। फिर भी मेरा निठल्लापन मुझे अच्छा लगता है...लोगों का परित्याग सम्बन्धियो से लेकर अजनबी तक, मुझे एक विशिष्ट जहां में लेकर गया जो आँखे बंद करने से खुलता है। इसलिये हे प्रिय,प्रिया अर्धांगिनी बनने के पूर्व हज़ार बार विचार कर लीजिएगा!

काफिला-ए-कृष्ण!

कोई मीरा,कोई राधा! हज़ारों गोपियाँ तरसें.. हज़ारों ख्वाब है जलते... लगी है आग बस विरह की मगर नही रुकेगा कि ये कृष्ण का है काफ़िला... है कृष्ण का ये काफिला! अहिंष्य!

भामती!

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मुझे मन्दोदरी की आवश्यकता थी.. और आप रत्नावली हैं तो कैसे हमारा मेल होता? नही होता कदापि नही होता!

चन्दरलेख..२

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संध्या में ढलता  सूरज,संकल्प दिवस का लेता है, तम की जड़ता से लड़ लड़ कर,एक नया सवेरा देता है। यदा कदा जब मेघ सभी,आभा इसकी हर लेते हैं, रोक किरण को इसकी वे ,अश्कों की वर्षा देते हैं। इस विषम घड़ी में दिनकर ये ,तनिक नही घबराता है, चीर मेघ के उर को ये ,पथ अपना पुनः बनाता है। चलता रहता है प्रतिपल ये,पथ से न डिगने पाता है, संकल्पों संग जीना ही ,सूरज हमको सिखलाता है। तेरी आभा से चंद्र भी ये ,फिर दीप्तियुक्त हो जाता है, चलते रहना पथ पर अपने ,संकल्प यही दोहराता है। संकल्प ही हैं इच्छाशक्ति,ये ही उन्नति के 'राज़ 'हैं, एक बार अगर ये सध जाए,न रुकता कोई काज है।

चन्द्र-लेख(मित्रता)

मेरा पहला लेख ************** मेरे प्यारे मित्रों,आधुनिक चंद्र नाम से कविताएं लिखते लिखते जीवन मे संतृप्तता आ गयी थी,सोचा क्यों न गद्य में भी हाथ आजमाया जाए।वस्तुतः इसकी प्रेरणा मेरे अद्यतन मित्र ने ही दी और वे मेरा कोई लेख पढ़ने के इच्छुक भी थे अतः मैने भी सोचा कि श्री गणेश कर ही देना चाहिए।काफी सोच विचार किया कि किस विषय पर लिखूं सांसारिक,आध्यात्मिक,राजनीतिक,इह लौकिक या पारलौकिक।असंख्य विषय मस्तिष्क में दंगल मचाने लगे।फिर एक निर्णायक की भांति आकर मेरे मस्तिष्क ने इस दंगल को रोका, जो अब दंगल कम उलझन ज्यादा प्रतीत हो रहा था।फिर अचानक मस्तिष्क ने ही फुसफुसाकर कहा-मित्र ने प्रेरित किया है तो मित्रता पर ही क्यों नही लिखता।क्यों बेवजह राई का पहाड़ बना रहा है। तो ये कहानी है मेरे विषय चयन की। विषय तो चुन लिया -मित्रता।लेकिन क्या मित्रता पर कुछ नया है लिखने के लिए मेरे पास।अनेक मनीषि गण तो पहले ही इस शीर्षक का पोस्ट मार्टम कर चुके हैं ।सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों को तो उधेड़ उधेड़ कर सामने रखा गया है उनके द्वारा ।अब यही सोच रहा था कि कुछ बचा नही है लिखने को इस विषय पर तो रहने ही देता हूँ।तभ...

हे प्रिय

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तुम क्यों मुझको मेरी ही स्मृति में आकर मेरी तन्हाई का एहसास दिलाती रहती हो।। मेरी सिद्दतता भरी मोहब्बत का मजाक बनाती रहती हो, जब मैंने है छोड़ दिया... तुमको तुम्हारी मर्जी पर।। यादों में आकर मुझको क्यों सताती रहती हो। तुम क्यों मुझको याद दिला कर कष्ट-रात्रि देती हो। है निवेदन हे प्रिय! तुमसे मुझको तन्हा चलने दो.. जग-विस्मृत कर जग के ख़ातिर मुझको उद्दम करने दो। छोड़ दिया तुमने मुझको जब यादों में भी आओ ना, रोम-रोम परिमार्जित करके अपनी धूनी रमाओ ना... मैं तो निकल चुका उस दिन ही जिस दिन माथे पर आपके चुम्बन अर्पित कर निकला था... हे प्रिय हर जगह से मुक्त कर मुझे कैवल्य-कामी बनाओ न.... ढाई अक्षर प्रेम का सखी मुझको तुम समझाओ ना। हे प्रिय यादो-से मुझको कुक्कर की तरह दुर्दुराओ! ना! हे प्रिय!

शरत चन्द्र...१

मैं नाविक जीवन नौका का,कर्म मेरी पतवार है, भावुकता है नदिया मेरी,जिसमे बहता प्यार है। नौका मेरी सुख दुख सहती, आगे बढ़ती रहती है, प्रेम सुधा के पावन जल में,खूब हिलोरे भरती है। कर्मों की पतवार मेरी ,जीवन नौका को खेती है, नितप्रति आगे पीछे होती,पर विश्राम न लेती है। लक्ष्य सदा इसका है ,दिनकर की किरणों के संग चलना, रात्रि कालिमा ले आये तो,चंद्र को ही थामे बढ़ना। उद्वेलित ये नदी, सदा न यूँ ही यहां ठहरती है, पीड़ा के तूफानों से,ये दूभरतायें भरती है। ऐसे में क्या उचित रहेगा,मेरा पीछे हट जाना, मन को अपने छोटा करके,मैं निर्बल हूँ रट जाना। मैं तो हूँ शून्य का अंशी, जिसमें कोई रार नही, जो इससे भिड़ जाए तो फिर ,उसका बेड़ा पार नही। धवल ज्योति से सराबोर हो ,प्रेम गीत मैं गाऊंगा, जीवन की नौका को ,दरिया पार वहाँ ले जाऊंगा। जहाँ सदा रहता है निकला, आशाओं का वह दिनकर, सिखलाता जो बढ़ते रहना ,अपने जीवन के पथ पर । आभा लेकर उसकी मैं ,अंधेरों को चमकाऊँगा, प्रेरित होकर उनसे,अब मैं धवल चंद्र बन जाऊंगा।

मुकम्मल-विछोह!(एक प्रेम कथा)

पहली मुलाकात तो यूँही हो गयी,अकस्मात राह चलते-चलते..उसके बाद इश्क़ की शुरुआत हुई। दिन-रात बाते होने लगी प्रेम-प्रचण्ड हो गया..  आनन्दी ने एक दफ़ा पूछ ही लिया मुझसे,"तुमने मुझमे क्या देखा शिवेश! जो मैं इतना भा गयी तुम्हे?" मैंने कहा,"माँ, एक ऐसी माँ जो विवेकानंद को जन सके।" आनंदी एक-टक मुझे देखने लगी। आनन्दी की दिव्यता को भांप-कर ही मैंने ये जवाब दिया था। अब चुकि सामाजिक अभियंत्रिकी में मेरा और आनन्दी का मिलन सम्भव नही था अज्ञात कारणों से। हम दोनों पुनः अजनबी हो गए। कुछ विछोह बीत जाने के बाद एक दिन किताब की दुकान पर आनन्दी ने मुझसे पूछा,"अब विवेकानंद का जन्म कैसे होगा?" मैंने कहा,"विवेकानंद को जन्मने देने के लिए वीर्य की और गर्भाशय की आवश्यकता भी नही एक संकल्प की आवश्यकता होती है जो आप में है।" तदुपरांत शिवेश,आनन्दी को निहार खूब रोया, उसे मालूम था कि आनन्दी सब बर्दाश्त कर सकती है किंतु शिवेश का रूदन नही। फिर शिवेश अपनी एकांत दुनिया मे चला गया। आनन्दी अपने घर गई.. शिवेश के दिये सारे तोहफों को अपने उर से लगा कर कमरा बन्द कर खूब रोई... य...

गंवार

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मानवता बस धर्म है जिसका,जाति है जिसकी केवल प्यार, कर्मपथी वह निर्मल निश्चल ,कहते जिसको सभी गंवार। छल से जो खुद छला हुआ है,प्रतिशोध नही जिसको स्वीकार, कर्मपथी वह..... बल उसका जग हित के मद में,सपने भी करता साकार, कर्मपथी वह..... प्रेम सुधा छलकाने वाला,प्रेम ही है जिसका उपचार, कर्मपथी वह ...... खुशनसीब हूँ पाकर तुमको,कह कर तुमको अपना यार, कर्मपथी वह.... शरत चन्द्र(आधुनिक)

चन्द्र का पत्र

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चंद्र का पत्र सूर्य के नाम।                             स्थान:सौरमंडल                             समय:रात्रि मेरे प्यारे मित्र सूर्य,तुम्हारी बहुत याद आती है।मैं यहां आकाश में अपने समस्त तारागणों संग अत्यंत खुश हूं और आशा करता हूँ कि तुम भी सपरिवार अत्यंत खुश एवम स्वस्थ होंगे। मुझे याद है वो दिन जब मैं पृथ्वी बहन से रूठकर स्वयम को बर्बाद करने निकाला था और अपने जीवन के अंधेरों में खो गया था।तब तुमने ही मुझे अपनी मेहनत से कमाए हुए प्रकाश में से उधार देकर मेरी सहायता की और मुझे मेरी कक्षा  में पहुँचाकर मुझे आजीवन अपना ऋणी बना लिया।इसके पश्चात तुम्हारे द्वारा ही मुझे यह चंद्र नाम प्राप्त हुआ जिसके माध्यम से इस सौरमंडल में मुझे भी अस्तित्व मिला। मेरे प्यारे मित्र ,मैं सदैव आपके दर्शनों के लिए लालायित रहता हूँ।किन्तु मेरा job schedules कुछ ऐसा हो गया है कि जब मैं आपसे मिलने आता हूँ तब तक आप जा चुके होते हो।पृथ्वी बहन से बात होती है और उन्ही ...

अनुभूति का दंश!

अनुभूति तुम इस तरह  हो मेरे अंदर... तुम्हारे नाम के आँसू कण्ठ को भारी करते जाते... मैं होने देता हूँ भारी अपने कण्ठ को हालांकि तक़लीफ़ होती है बहुत तकलीफ.. उन आंसुओं को न बहने देने में...फिर भी नही बहने देता हूँ मैं उन आंसुओं को चाहता तो आ जाता बेफिक्र तुमसे मिलने; लेकिन अब नही आऊंगा कभी नही आऊँगा.... ये आँसु भारद्वाज के सरस्वती सदृश मुझे अन्याय करने से रोकते है। मैं किसी को कष्ट देकर तुम्हे अपने आप मे समाहित नही देख सकता अनुभूति.....!

प्रार्थना उनके आने की!

खुली छत,और अंधेरी रात तारों को टुकटुक देखता मैं नितांत अकेला इस जीवन-सफर में....तुम भी आओ ना। इंतजार कर रही रूह मेरी तुम्हारे रूह की..इस रूह की प्यास बुझाओ ना। अकेला ही सफर तय है हालांकि फिर भी कुछ पल के लिये ही मेरी रूह से तुम्हारे रूह को मिलाओ ना। आओ ना... या मौला मेरे शब्दों में इतनी ताकत दे,जो उन्हें छू सके उनकी प्रशांत चेतना को जगा सके। मैं मुकम्मल नही हूँ उनके बगैर उनका साथ मयस्सर करा दे मौला... फिर तू भी मुकम्मल और मैं भी मुकम्मल!

ख़त..७

बहुत ज्यादा मेरा रोम-रोम आपसे मिलने को आतुर हो रहा है। ये जानते हुए की अब मेरे नसीब में आपका साथ नही।इसके बावजूद आपके उत्पत्ति दिवस की असीम शुभकामनाएं। अब आपके भाग्य का सूर्योदय हो चुका है।प्रिय पत्थर!

तुम्हें कैसे भुलाऊँ--शरत चन्द्र(आधुनिक)

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कैसे तुम्हें भुलाऊँ? स्मृति तेरी भस्म मैं कर दूं ,खुद ही विस्मृत हो जाऊं? प्रश्न यही अब शेष हृदय में,कैसे तुम्हे भुलाऊँ? निर्झर बहती इन आंखो को क्या कहके बहलाऊँ? प्रश्न यही...... पिया हलाहल मंथन का था ,जग संरक्षा  हेतु, इस जग ने ही छीन लिया, मेरी नदिया का सेतु, नीलकंठ था लेकिन इस, विष को न मैं सह पाऊँ। प्रश्न यही अब....... इस पीड़ा की ज्वालाएं ये ,मेरा हृदय जलाएँ, वैरागी मन को भी ये ,मायाओं से भटकाए, ध्यानेश्वर मैं अब किस मद में, फिर से ध्यान लगाऊं? प्रश्न यही अब.... अपनों से ऐसे ही क्यों तुम ,रुठ गयी हे शक्ति! भूल गयी तुम  प्रियवर को और खुद भूली सी लगती, संबंधों के ये बंधन, अब मैं तो खोल न पाऊं। प्रश्न यही.......

शरत चन्द्र...

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नारी तुम हो जननी जग की,तुम ही तो जग माता हो, करुणा की झंकार तुम्ही हो,तुम ही प्रेम प्रदाता हो। तुमसे ही ये सृष्टि सारी,तुम विधना की छाया हो, शक्ति  तुम ब्रह्मांड की सारे,तुम ही सारी माया हो। तुमसे जग में  व्यापी ममता,तुम हो निर्मल कोई कविता, प्रेम तुम्हारी ही प्रतिछाया,फिर भी सहती जग -निर्ममता। तुम ही सीता, तुम सावित्री ,रानी लक्ष्मीबाई हो, तन मन का सब कल्मष धुलने,गंगा बनके आयी हो। दुर्गा काली रूप तुम्हारे ,जग में पूजित होते हैं, फिर क्यों मन मर्दानों के ,तेरे प्रति दूषित होते हैं। हे माँ ! हे भगिनी !हे भार्या !अब अन्याय न तुम सहना, कोई साथ न हो तब भी तुम इन सबसे लड़ते रहना। तेरी पावन छाया से ,ये जग पावन हो जाएगा, नर ,नारी को पूजेगा ,और नैतिक उन्नति पायेगा।

चंद्र प्रत्युत्तर!२

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मन तेरा ये रोता है क्यूं?हे यशोधरा सिद्धार्थप्रिया। मर गया तेरा सिध्दार्थ कहीं ,और जिया तो बस ये बुद्ध जिया। ये संग तेरा न रोक सका,उस प्राणप्रिय सुकुवांरे को, जीवन सब अपना सौंप दिया ,उसने जग के अंधियारे को। अन्याय कहो या छल बोलो ,जो चाहे तुम इस पल बोलो, गर शब्दों से न भरता मन, तो शीश झुकाकर तुम रो लो। वे वर तेरे ,दिनकर तेरे,जो प्राण से तुझको प्यारे हैं, जग को उज्ज्वल करते वे अब,अंधेरों के उजियारे हैं। सौतन तेरा वैराग नही ,मन का तेरा संताप ही है, आभा तेरी छीनी जिसने,वह विष रंजित यह सांप ही है। इस गरल से मन दूषित न करो ,मन से इसका प्रस्थान करो, अपने उस आत्म तत्व का तुम ,अब जग हित में उत्थान करो। ये त्याग तेरा जग को हरदम ,वह उज्ज्वल पथ दिखलायेगा, सब स्वार्थ त्याग जग हित मे ही,जीना सबको सिखलायेगा।

गुरुदेव-सांड..१

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मैं बाजे-गाजे के साथ स्वयं के विवाह में जा रहा हूँ आपके घर लोग जश्न मना रहे हैं मैं भी मन्त्र-मुग्ध हूँ,शायद मेरी आखिरी ख्वाहिश पूरी हो रही है... इसी दिन का तो इंतजार था मुझे..सब कुछ बेहद हसीन। तुम्हे अपनी दुल्हन के रूप में देखना महसूस करना और फिर मुक्ति समस्त ख्वाहिशो से..इसमे मैं आपको भी खूब प्रसन्नचित्त देखता हूँ...विवाह सम्पन्न हुआ। सम्मानित लोग बधाइयाँ दे रहे है,प्रसन्न भी खूब हैं। अरे ये क्या? गुरुदेव कब आ गए कुछ तो गड़बड़ है गुरूदेव के दर्शन होना इस समय अनिष्ट का सूचक है। भड़ास भरी लाठी मेरे पिछवाड़े पर पड़ी पिता जी अपने पुलिसिया अंदाज में,उठ ये समय है सोने का। मैं तो अर्श से फ़र्श पर आ गया। गलती मेरी है जब गुरुदेव अपनी व्यवस्था नही कर सके तो मेरी व्यवस्था कैसे होगी! जय गुरुदेव!

चंद्र-प्रत्युत्तर१

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पल पल यूहीं अपने गर संकल्प सभी तुम तोड़ोगे, शीशे से टूटे सपनों को फिर कैसे तुम जोड़ोगे। फर्क नही पड़ता तुमको ,इनके जुड़ने या तुड़ने से, मिलेगी कैसे अपनी मंजिल ,गलत राह पर मुड़ने से। दायित्वों को करते पूरा ,तुम अपना तन मन देकर, करते रहे प्रकाशित प्रतिपल ,इस जग को तुम हे!दिनकर। पुष्पों की कोमलता ,मरुथानो में कहीं न लुट जाए, बंजर भूमि खोकर इनको, और अधिक न घुट जाए। व्यस्त नही हम साथ हैं तेरे ,खुशियां हों या दुख सारे, प्यारा कोई और नही,जितने लगते हो तुम प्यारे। तन्हाई और रुस्वाई की, कमर तोड़ने आएंगे, मित्र मेरे हम साथ वहां पर फिर हुड़दंग मचाएंगे।

संकल्प पुष्प!

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रह-रह कर संकल्प सध रहे रह-रह कर मैं तोड़ रहा हूँ। टूटा-टूटा सारा सपना पल-पल-क्षण-क्षण जोड़ रहा हूँ। जुड़ जाए या तुड़ जाए फर्क नही इसका मुझपर है.. मैं तो बस दायित्यों का अपने शत-प्रतिशत वहन कर रहा हूँ.. पुष्प बो रहा हूँ मैं बंजर-बंजर रेगिस्तानों में तुम सब से कुछ चाह नही है.. अपने-अपने काम करो,सब मैं मुकम्मल तन्हाई में... अंगड़ाई में रुस्वाई में।।

आखिर कब तक? और क्यों?

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तुम्हे तो छोड़ आया किन्तु आखिर कब मुझे मुक्ति मिलेगी तुमसे.. बोलो आखिर कब तक। नियति की प्रवृत्ति है जो हुआ मेरे और तेरे दरम्यान कुछ विशेष प्रयोजन होगा.. मैं मूकदर्शक बना देख रहा हूँ। न मेरे न आपके प्रेम में कमी हुई फिर भी आखिर क्यों हमे जुदाई नसीब हुई... नियति की प्रवृत्ति मैं चरित्रहीन और आप चरित्रवान... आखिर कब तक?ये दंश मुझे महसूस होते रहेंगे... जब-तक हों मुझे सर्वस्व स्वीकार है। ये तस्वीर विशेष है मेरे लिए... आपको आपके जन्मदिवस की अग्रिम शुभकामनाएं ये वर्ष आपकी समस्त जड़ता को नष्ट कर देगा!

यशोधरा

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सखी वो तुमसे कैसे कहकर जाते? तुम मायावी दिव्य-कांता..... बन्धन को चमकाकर-दमकाकर अपने वक्ष-पास में उनको बांध ही लेती... कैसे तुमसे कहकर जाते,वो एक पुत्र तुम माता थी,,,उनकी सत्ता की जननी भी... कैसे कहकर जाते; बोलो सखी कैसे कहकर जाते?

आधुनिक शरत चन्द्र चैटर्जी१

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हे मित्र मेरे अब चलता हूँ,सब भूल चूक मेरी क्षमा करो, जो भला बुरा सब कहा तुम्हे,उसको तुम दिल से विदा करो। कहते होगे तुम भी ये ही,क्यों मैं वापस आ जाता हूँ, मन के विचार प्रेषित करके,क्यों तुम्हे और उलझाता हूँ, मैं खुद बेबस,मुझ प्रेम विवश को यादों से ना जुदा करो, हे मित्र मेरे अब चलता हूँ,सब भूल चूक मेरी क्षमा करो। अपने कथनों की क्षमा हेतु, मैं पुनः यहां वापस आया, कड़वी बातें प्रतिपल कहकर ,सुकुमार हृदय को दुखलाया, बातें ये सब आभासी हैं, इनको मन से अब रिहा करो, हे मित्र मेरे अब चलता हूँ,सब भूल चूक मेरी क्षमा करो। यह जन्म दिया तुमने जग को ,पर पुनः यहां वापस आना, इस प्रेमसुधा के याचक को,आकर तुम गले लगा जाना, मैं विरह में अपने खो जाऊं, तुम कर्म में अपने रमा करो, हे मित्र मेरे अब चलता हूँ ,सब भूल चूक मेरी क्षमा करो। प्रिय ब्रह्मांड मित्र !ये मेरे अंतिम शब्द आपको अर्पित।आप से क्षमा याचना हेतु वापस आया था क्योंकि बहुत कुछ कह दिया था आपको।अब हमेशा के लिए जा रहा हूँ।आप की प्रतिक्रिया अपेक्षित है।तत्पश्चात मुझे आज्ञा दीजियेगा।ये चंद्र अब अपने आकाश में खोने जा रहा है।आप की प्रभा वि...

आधुनिक शरत चन्द्र

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हे दिनकर!तुम अंधेरों में अपनी ज्योति बिखरा देना, करके प्रभात उज्ज्वल-सा,सारे जग को तुम चमका देना। रात्रि पहर की निद्रा में ,तल्लीन तुम्हारा मित्र यहां, जग जाओ गर पहले तो ,इसको भी तुम साथ जगा देना।  तन मन का कल्मष सब धुलकर तुम प्रांजल गात बना देना, गर गहन नींद में सोया हूँ, जल की बूंदें बरसा देना। फिर साथ चलेंगे मैं और तुम,जीवन के पथ पर हंसते हंसते, इस पंथ को मेरे पुष्पयुक्त और शूलरहित करवा देना। विहगों संग हम कलरव करके,सुंदर उपवन फिर चहकायें, रोते रोते सदियाँ बीतीं,अब हमतुम फिर से मुस्कायें। हम सखा रहें हैं जन्मों के ,रहते थे प्रतिपल हमसाये, तुम ढूंढो अपनी रजनी को,मुझको प्रभात भी मिल जाए।

स्नेहा का स्नेह!

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प्रिय रजनीश, चुकि telecommuication का युग है,फिर भी मैंने पत्र लिखना चुना। आप एक यायावर फ़क़ीर हैं और स्वतंत्रता आपकी पहचान है। आपको एक दफा प्रेम-प्रस्ताव अर्पित किया किन्तु आपने स्पष्ट मना कर दिया,,, फिर भी मैं देर-अबेर आपसे मिल ही लेती थी। चुकि अब मुझे आपके समक्ष होने में लज़्ज़ा आ रही है, अब मैं अपने प्रेम के बांध को ज्यादा दिन तक नही रोक सकती... इसलिये प्रिय रजनीश जी मुझे आज्ञा दीजिये विश्व कल्याण हेतु.... आपकी स्नेहा..आई.ए. एस

व्यथित-व्यथा

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क्या तुम व्यथित हो? परेशान हो किसी भी बात को लेकर... तो निश्चिंत रहो मैं तुम्हारे निजी जीवन में कोई बाधा नही डालूंगा। हा मैं अपना कार्य प्रारंभ करता हूँ देखो प्रिय! व्यथा,क्रोध इत्यादि इस बात के सूचक हैं कि तुम्हारी इच्छाएं अनन्त है। तो सर्व प्रथम अपनी छोटी इच्छाओं को पूर्ण करो..... धीरे-धीरे तुम्हारे समस्त क्रोध विदा हो जाएंगे और आनन्द का प्रस्फुटन होगा...

प्रेम ज्योति एक सत्यकथा!

उस कॉलेज में सब मुझसे प्रभावित थे,सब-के-सब मुझे प्रेम भी करते थें किन्तु प्रकृति ने मुझे ज्यादा प्रेम देने की कोशिश की.. उस वक़्त हाथ मेरे कांपते थे तो मेरे सारे नोट्स प्रकृति ही लिखती थी..वो ज्यादा-से-ज्यादा मुझसे बात करने की फिराक में रहती। प्रतिभाशाली है वो प्रकृति का इस-कदर मुझसे बात करना...उस नगर में चर्चा का विषय बन गया...फलस्वरूप मुझे लोग एक विशेष प्रश्नवाचक दृष्टि से भी देखना प्रारंभ किये... किन्तु मुझे कोई फर्क नही पड़ता मैं चाहता था कि प्रकृति का चयन प्रशासनिक सेवाओं में हो इसलिए मेरी पुरजोर कोशिश थी उसे संवर्द्धित करने की। एक ही महीने बाद मुझे दूसरे कॉलेज जाना पड़ा,प्रकृति से फिर मेरी भेंट नही हुई...हा फ़ोन पर बात हो जाया करती थी।    मुझे स्मरण है एक बार प्रकृति किसी कार्यक्रम में सम्मिलित होने हेतु गोरखपुर आयी थी..तब उसने मुझसे फ़ोन पर कहा था "जानते हैं प्रभाकर जी,जिस वक़्त और जितने क्षण मेरी शरीर गोरखपुर में रही...बस वही उतना पल मेरे लिए स्वर्ग से भी ज्यादा दिव्य लगा....।मसलन एक घण्टे के गोरखपुर प्रवास के दौरान उसने मुझे ये बाते बताई।" जब प्रकृति अपना जीवन-साथी ...